राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६ राजतरंगिणी बद्धा द्वादशभिर्ग्रन्थसहस्रैः पार्थिवावलिः । प्राङ्महाव्रतिना येन हेलाराजद्विजन्मना ॥ १७ ॥ १७ पाशुपतव्रती ब्राह्मण हेलाराज' ने पूर्वकाल में बारह हजार श्लोको की पुस्तक 'पार्थिवावलि' की रचना की थी । तन्मतं पद्ममिहिरे दृष्ट्वाऽशोकादिपूर्वगान् । अष्टौ लवादीन् नृपतीन् स्वस्मिन् ग्रन्थे न्यदर्शयत् ॥ १८ ॥ १८ पद्ममिहिर ने हेलाराज की कृति का अध्ययन कर अपनी रचना में अशोक के पूर्ववर्ती आठ राजाओं का और वर्णन अंकित किया है। वे लव तथा उसके क्रमशः उत्तराधिकारी थे । पाठभेद : श्लोक संख्या १७ मे 'पार्थिवाद' का पाठभेद 'या नृपाव' मिलता है । श्लोक संख्या १८ 'पद्ममि' का 'पूर्वमि', पूर्वगा' का 'पूर्वजा तथा 'युगलकम्' का 'युग्मम्' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : १७ (१) हेलाराज काश्मीरी ब्राह्मण थे। उनका काल ९वी तथा १०वी शताब्दी के मध्य माना जाता है। उन्होंने 'वाक्यपदीय' पर एक भाष्य लिखा है। राजा लव से शचीनर तक के राजाओं का उल्लेख कल्हण ने राजतरंगिणी के प्रथम तरंग की श्लोक संख्या ८४ से १०० तक में किया है। हेलाराज पाशुपत पंथ के अनुयायी थे । शैव सिद्धान्त के आधार आधारित एक पंथ था। यह शिव रूप में ईश्वर की कल्पना करता है। शिव को जगत् का सर्जक तथा चलाने वाला मानते हैं। परन्तु जगत् उत्पत्ति का उन्हे भौतिक कारण नही बताते । सांख्य दर्शन के 'प्रधान' सिद्धान्त को मानते हुए वे इस सिद्धान्त में विश्वास करते हैं कि ईश्वर का अस्तित्व है। पशुपति किंवा पशुपतिनाथ का मंदिर बागमती नदी के तट पर काठमाण्डू नेपाल मे स्थित है। में यहाँ का दर्शन तथा भ्रमण कर चुका हूँ। पशुपति मूर्ति के विषय में अपनी पुस्तक 'जापान् नेपाल' में प्रकाश डाल चुका हूँ। (२) द्विजन्मना :-कल्हण ने हेलाराज को द्विज कहा है। हेला शब्द नाम के लिये सुसंस्कृत और परिष्कृत नहीं कहा जा सकता। वह शब्द स्त्रीलिंग है। राज शब्द अन्त में लगा देने से हेलाराज होकर इसे पुंलिंग रूप प्राप्त हो गया है। हेला का अर्थ होता है, तिरस्कार, अपमान, आसानी, सौलभ्य, सरवरी एवं उत्कट मैथुनेच्छा । हिन्दी भाषा में हेला शब्द मल उठाने वाले भंगियों के लिये आता है। यह निसन्देह शूद्र जाति मानी जाती थी । द्विजन्मना विशेषण हेला शब्द में लगाकर हेला शब्द को उच्चस्तरीय बनाने का सुन्दर प्रयास कल्हण ने किया है। कश्मीर मे डोम गायक होते थे। कुछ तो राज परिवार की शोभा तक बढा चुके है। काशी में प्रसिद्ध शहनाई- वादकों का कुटुम्ब हेला था । इस पीढ़ी में कुछ मुसलमान हो गये हैं। हेला शब्द का काश्मीर की लौकिक भाषा में उस समय क्या अर्थ था। गवेषणा का विषय है। हेलाराज शुद्ध ब्राह्मण थे इसमें किसी प्रकार का सन्देह नही है। इसी बात को पाठको के मन पर जमाने के लिये कल्हण ने द्विज शब्द का प्रयोग हेलाराज के नाम के साथ बलवती भाषा में किया है। द्विज के लिये कहा गया है-'द्वाभ्यां जन्मसंस्का- राभ्या जायते' दो बार उत्पन्न किंवा जन्म धारण करने वाले को द्विज कहते हैं। ब्राह्मण, क्षत्रो और वैश्य द्विज कहे गये हैं। संस्कार के कारण उनका द्वितीय जन्म माना जाता है। धारणा है। यज्ञोपवीत