भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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प्रथम तरङ्ग १७ येऽप्यशोकादयः पञ्च श्रोच्छविल्लाकरोऽब्रवीत् । तान् द्वापञ्चाशतो मध्याच्छ्लोकस्तस्य तथा ह्ययम् ॥ १९ ॥ १९ श्रीच्छविल्लाकर¹ ने अशोक के पश्चात् के जिन पाँच राजाओं का वर्णन किया है। वे लुप्त बावन राजाओं में से हैं, क्योंकि उसका निम्नलिखित श्लोक वह बात स्वतः स्पष्ट कर देता है। “आऽशोकादभिमन्योर्ये प्रोक्ताः पञ्च महीभुजः । ते द्वापञ्चाशतो मध्यादेव लब्धाः पुरातनैः ॥” २० ॥ २० प्राचीन रचनाकारों ने अशोक से आरम्भ कर अभिमन्यु तक जिन पांच महीभुजों का वर्णन किया है, उसे उन्होंने बावन राजाओं की तालिका मे से ही लिया है। के पश्चात् ब्राह्मण, क्षत्री तथा वैश्य द्विज कहे जाते हैं। प्रथम जन्म माता देती है। दूसरा जन्म उन्हें संस्कार देता है। अंडज प्राणी द्विज कहे जाते हैं। पहला जन्म अंड रूप में माता देती है। दूसरा जन्म अंडा फूटने पर होता है। पक्षी, सर्प, मछली आदि अंडज द्विजन्मा होने के कारण द्विज कहे जाते हैं। दांत को भी द्विज कहते हैं। मनुष्य का दांत दोबार मुख में पैदा होता है। पहला दाँत बाल्यावस्था के पश्चात् टूट जाता है। तत्पश्चात् दूसरा दाँत मुख में पुनः उत्पन्न होता है। आज कल भारतवर्ष में द्विज शब्द केवल ब्राह्मणों के लिए प्रयुक्त होता है। राजतरंगिणी के सभी अनुवादकर्ताओं ने द्विज का अर्थ यहाँ पर ब्राह्मण दिया है। श्री स्टीन तथा श्री आर एस. पण्डित दोनों ने यहाँपर द्विज का अनुवाद ब्राह्मण किया है। मैंने द्विज शब्द को ही रख दिया है। द्विज शब्द प्रचलित है। साधारण है। उसका अर्थ सभी समझते हैं। द्विजन्म प्रथा इसाइयों में भी प्रचलित है। बपतिस्मा के पश्चात् दूसरा जन्म होना माना जाता है। यहूदी और मुसलमान जबतक खतना नहीं हो हो जाता, वे यहूदी तथा मुसलमान नहीं माने जा सकते। प्राचीन यूनान में डस्टनाइ डिमो नेमम पन्थ में द्विज प्रथा प्रचलित थी। पाठभेद : श्लोक संख्या १९ में 'तान्द्राप' का पाठभेद 'तान् स्वाप' मिलता है। श्लोक संख्या २० में 'आशोका' का 'अशोका' और 'शतो' का 'शतौ' पाठभेद मिलता है। पादटिप्पणियां : १९ (१) श्रीच्छविल्लाकर के विषय में अभी तक कुछ भी साधिकार बातें नही जाना जा सकी है। कल्हण ने अशोक के पश्चात् के ५ राजाओ का उल्लेख राजतरंगिणी में छविल्लाकार के आधार पर किया है। अतएव ऐतिहासिक दृष्टि से कालगणना में अंतर पड जाता है। इसके लिये कल्हण की अपेक्षा पूर्वलेखक अधिक उत्तरदायी हैं, जिनके आधार पर कल्हण ने लिखा है। इस प्रकार ५२ राजाओं में कल्हण ने १७ राजाओं का पता तत्कालीन ग्रन्थों के आधार पर लगाया है। उनका उल्लेख और वर्णन इन्हीं के आधार पर किया है। इससे यह भी प्रकट होता है। कल्हण ने उन्ही सामग्रियों का उपयोग किया है, जो काश्मीर में उपलब्ध थी। कल्हण का लेखन काल सन् ११४८-११५० ई० है। सन् ७१२ में मुहम्मद बिन कासिम ने सिंध पर आक्रमण किया था। सिंधराज दाहिर पराजित हो चुका था। उन दिनों सिंध के ब्राह्मणों तथा बौद्धों के मतभेद के कारण अरबों को सफलता मिली थी।