राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
पृष्ठ 95, कुल 984 में से
संदर्भ में पढ़ें[Page Header] १८ राजतरङ्गिणी
[Shloka 21] इयं नृपाणामुल्लासे ह्रासे वा देशकालयोः । भेषज्यभूतसंवादिकथा युक्तोपयुज्यते ॥ २१ ॥
[Hindi Translation 21] २१ राजाओं के विकास एवं ह्रास के समय मेरी कथा¹ देशकाल के अनुसार उनके लिये उत्साह किंवा शांतिवर्धक तुल्य उपयोगी सिद्ध होगी ।
[Shloka 22] संक्रान्तप्राक्तनानन्त्यव्यवहारः सुचेतसः । कस्येदृशो न संदर्भों यदि वा हृदयङ्गमः ॥ २२ ॥
[Hindi Translation 22] २२ कौन ऐसा चेतन हृदय व्यक्ति होगा जो अनंत व्यवहारों से परिपूर्ण मेरे इस ग्रन्थ को हृदयंगम नहीं कर सकेगा ?
[Column 1] मुल्तान विजय करता मुहम्मद बिन कासिम उत्तरी पंजाब तक पहुँच गया था। सन् ९३३ ई० में समानी बादशाह अलप्तगीन ने हिन्दुओं के राज गजनी पर अधिकार कर लिया था। सन् ९७७ ई० में अलप्तगीन के पिता के गुलाम ने गजनी पर अधिकार कर लिया। सन् ९९७ ई० में महमूद गजनवी राज्य सिंहासन पर बैठा । भारत पर सन् १००१ ई० में आक्रमण किया। उसका आक्रमण होता रहा । उत्तरी भारत में अव्यवस्था फैल गई। यद्यपि कल्हण के रचना-काल में मुसलमानों का अधिकार भारत पर नहीं स्थापित हुआ था, तथापि उनका आक्रमण होता रहता था। अतएव कल्हण ने काश्मीर से बाहर जाकर इतिहास सामग्री एकत्र करने का सम्भवतः प्रयास नहीं किया। पाठभेद : श्लोक संख्या २२ में 'प्राक्तना' का 'प्रार्थना' और 'सुचेतसः' का 'सचेतसः' पाठभेद मिलता है। पादटिप्पणियाँ : २१ (१) कथा—कथा का शाब्दिक अर्थ होता है कहानी, किस्सा, कल्पित कहानी, वृत्तान्त, वर्णन, वार्तालाप-कथोपकथन, आख्यायिका शैली का गद्यमय निबन्ध । कथा पद्य और गद्य दोनों प्रकार का काव्य होता है। कथा साहित्य का मूल स्रोत ऋग्वेद है। ऋग्वेद में ३५ कथाएँ हैं। उन्हें कथा का रूप बृहद्देवता में देने का प्रयास किया गया है। वेद की कथाएँ अत्यन्त
[Column 2] संक्षिप्त हैं। पुराणों तथा रामायण, महाभारत में उन्हें विस्तृत कर, लिखा गया है। व्यक्ति विशेष अथवा किसी घटना के आदि और अंत से युक्त वर्णन को कथा कहा गया है। कथाएँ ऐतिहासिक तथा कल्पित होती हैं। भारत में कथा साहित्य विकसित था। रामायण और महाभारत में वर्णित कथाओं की शैली पर कथा साहित्य भारत में प्रचलित हुआ । 'बृहत्कथा', 'जातक कथा', 'पंचतंत्र' आदि उनके उदाहरण हैं। 'कुमार'- सम्भव', 'कादम्बरी', 'दश कुमार चरित', 'प्रबन्ध चिन्तामणि' 'भविष्यत कहा' 'लोतावई कहा' आदि कथा काव्य हैं। 'हितोपदेश', 'कुवलयमाला', 'मलय सुन्दरी कथा', 'भोज प्रबन्ध' कथा साहित्य के अन्तर्गत आते हैं। मैंने भी 'रामायण कथा', 'योग वासिष्ठ कथा' और 'वेद कथा' लिखा है। मैं कथा साहित्य का प्राचीन चाहे जो रूप रहा हो, आज कथा शब्द से प्राचीन धार्मिक ग्रन्थों में निहित जीवन चरित्रों, घटना विशेषों के वर्णनों से लिया जाता है। उन्हें पढ़ना तथा सुनना पुण्य कार्य माना जाता है। कालान्तर में कथा का सम्बन्ध पौराणिक महाभारत तथा रामायण कथाओं से हो गया। उन्हें धार्मिक रूप दे दिया गया। एकादशी, पूर्णिमाओं तथा अनेक पर्वों पर मन्दिरों, जलाशयों, नदी तटों, अथवा घरों में कथा कहने की परिपाटी चल निकली । सत्यनारायण की कथा का आयोजन प्रायः पूर्णिमासी को सम्पन्न घरों में होता है। मन्दिरों में प्रातः