राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथम तरङ्ग १९
तथा सायं प्रति दिन नियमित रूप से कथा कहने की रीति है। कथावाचक पण्डित या तो नौकर रख लिए जाते हैं, अथवा कथा-सुनने वाले श्रोतागण उन्हें कुछ दे दिया करते हैं। कथा शब्द से सम्बोधन होता है—कहना अथवा वह जो कहा जाय। कल्हण ने राजतरंगिणी इस लिए लिखी थी कि लोग उससे लाभ उठायें। उसे सुना जाय। उसके पात्रों तथा उसमें वर्णित चरित्रों को लोग सुनें। उन्हें स्मरण रख कर लाभ उठायें ! यह धार्मिक नहीं राजनीतिक किंवा ऐतिहासिक कथा है। कल्हण सम्भवतः इसे श्रव्य ग्रन्थ बनाने की कल्पना कर रहा था। किन्तु वह अपने इस उद्देश्य में सफल नहीं हुआ। राजतरंगिणी धार्मिक ग्रन्थ नहीं बन सकी। उसका श्रवण पुराण, रामायण तथा महाभारत के समान धार्मिक रूप नहीं ले सका। उसे वह पवित्रता तथा आध्यात्मिक महत्त्व नहीं प्राप्त हो सका, जो धार्मिक ग्रन्थों की श्रेणी में रख दिये गया काव्यों को मिला था। निःसन्देह धार्मिक कथाओं में चरित्र, उससे सम्बन्धी घटनाओं, उनका उतार चढ़ाव, आदि, अन्त सब कुछ देकर उसे पूर्ण बनाया जाता है। राजतरं- गिणी में राजाओं आदि के चरित्र का सुन्दर वर्णन दिया गया है। परन्तु राजा देवत्व भाव नहीं प्राप्त कर सके। इसलिए राजतरंगिणी की कथा धार्मिक कथाओं के समान महत्त्व नहीं प्राप्त कर सकी। वह जनसाधारण में घर नहीं कर पायी। यद्यपि राजाओं ने अपने नाम पर विष्णु तथा शिव की मूर्तियाँ स्थापित करवाईं। मन्दिर बनवाये। नगर बनवाये। अपने नाम जीवित रखने के लिए उनपर दान चढ़ाये। अग्रहार दिये। तथापि यह स्वीकार करना पड़ेगा कि कल्हण की भावना उदात्त थी। धार्मिक कथा के कारण जैसे चरित्र सुधरता है, उसी प्रकार इस राजनीतिक कथा के कारण राजाओं तथा देश का चरित्र सुधार होगा, यही कल्हण की उदात्त कल्पना थी। इसी लिए यहाँ पर कथा शब्द का उसने प्रयोग किया है। किन्तु उसकी यह आशा सफल न हो सकी कि राजतरंगिणी को कथा रूप में स्वीकार कर उसका पाठ किया जाय। (२) भेषज—कल्हण यहाँ अपने इतिहास लिखने का उद्देश्य उपस्थित करता है। उसका एकमात्र लक्ष्य काश्मीर के राजाओं तथा काश्मीर राज्य की राजनैतिक व्याधियों के लिये देशकाल- पात्र के अनुसार औषध प्रस्तुत करना था। उसका उद्देश्य अर्वाचीन ऐतिहासिकों के समान वैज्ञानिक इतिहास नहीं लिखना था। उसने इतिहास को 'काव्य की क्रांति' के अंग्रेजी लेखक तुल्य इतिहास को गप्पों का परिणाम नहीं माना है। रोम साम्राज्य के ह्रास और पतन के प्रसिद्ध लेखक श्री गिबन की तरह इतिहास को मूर्खताओं, दुर्दशाओं के कथानक के रूप में नहीं देखा है। महान् सेनानी नेपोलियन कहा करता था—'इतिहास कथानकों के अतिरिक्त और है क्या?' कल्हण कथानक को इतिहास का एकमात्र हेतु नहीं मानता। उसने इतिहास को दार्शनिक श्री इमरसन के शब्दों में प्रसिद्ध व्यक्तियों के जीवनचरित्रों का संग्रह नहीं माना है। जर्मन दार्शनिक श्री हेगल ने इतिहास रचनाकारों की तुलना उन मनीषियों से की है, जो भूतकाल की ओर आँखें फेरकर देखते हैं। कल्हण ने राजाओं का इतिहास लिखा है। उसने पीछे फिरकर झाँका है। उसमें फँस नहीं गया है। श्री एच. जी. वेल्स ने इतिहास को मानव के विचारों का इतिहास माना है। आधुनिक इतिहास लेखक श्री टायनबो ने इतिहास से तात्पर्य माना है कि सभ्यताओं के अन्दर एक प्रक्रिया चलती रहती है। यह उसकी उत्पत्ति, विकास, ह्रास और विघटन को उपस्थित करता है। उसके अनुसार 'इण्डिक' सभ्यता काल ईसापूर्व १७०० से ईसा पश्चात् ५०० वर्ष रही है। विकास का समय वह वेद से बुद्ध काल तक मानता है। उसका मत जहाँ तक काश्मीर के इतिहास का सम्बन्ध है, काश्मीर 'इण्डिक' तथा 'हिन्दू' दोनों सभ्यता काल में