राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२० राजतरङ्गिणी क्षणभङ्गिनि जन्तूनां स्फुरिते परिनिन्दिते । मूर्धाभिषेकः शान्तस्य रसस्याऽत्र विचार्यताम् ॥ २३ ॥ २३ क्षणभंगुर प्राणियों के स्फुरण के विषय में जब परिनिन्दा करता हूँ तब यही परिणाम निकलता है कि रसों में शांत रस१ श्रेष्ठ है । अतएव ग्रंथ में शांत रस की प्रमुखता है। आ जाता है। यहाँ पर घोर अहिंसा लिखना अप्रासं- गिक होगा। यह विषय विवादास्पद है। कल्हण इतिहास को निष्प्राण नहीं मानता। उसका उद्देश्य उन पाश्चात्य लेखकों की अपेक्षा अधिक व्यापक है, जिनके विचारों से जगत् प्रायः प्रभावित होता है। वह इतिहास की श्रृंखला जोड़कर उन्हें तरङ्गिणी रूप में प्रस्तुत करता है। नदियाँ ऋतु परिवर्तन के अनुसार विभिन्न रूप धारण करती हैं। उनसे मनुष्य तृप्त होता है। प्यास बुझाता है। उसमें डूबकर मर भी सकता है। नदी बाढ़ लाकर विप्लव उपस्थित कर सकती है, परन्तु उसके बँधे जल से सिंचकर हरी भरी भूमि और लहलहाते खेत प्राणियों को जीवन-दान देते हैं। कल्हण की दृष्टि में इतिहास विषम परिस्थितियों में राजाओं के लिये ओषधि प्रस्तुत करता है। उसने राजाओं के प्रशस्तिवाचन के लिये लेखनी नहीं उठाई थी। इसमें रोचक कथाओं का वर्णन है। विचारों का वर्णन है। राजाओं तथा उनके अधिकारियों की मूर्खताओं, दुष्टताओं तथा उनमें उत्पन्न होने वाली दुर्दशाओं का वर्णन है। उत्तम चरित्रांकन है। जीवन के अंधकारमय पहलू के साथ प्रकाश का उल्लेख है। आशा के साथ निराशा की झलक मिलती है। 'वाक्यं रसात्मकं काव्यं' साहित्य दर्पण कहता है। शांत रस आन्तरिक शांति प्रदान करता है। यद्यपि राजतरंगिणी में सभी रसों का रसास्वादन पाठक कर सकते हैं, परंतु कल्हण ने शांत रस को प्रधान माना है। संस्कृत साहित्य का किंचित् मात्र ज्ञान होगा, उसे कल्हण के काव्य में शांत रस की अविच्छिन्न धारा प्रवाहित मिलेगी। ऐतिहासिक लेखक के लिए शांत रस ही उत्तम माध्यम है। राज्यों के उत्थान-पतन, राजनीतिक प्रवाह, घटनाओं का वर्णन में यदि कवि शांत रस का आश्रय न ले तो भावावेश में भटक सकता है। भावाविष्ट होने पर निर्णय उचित नहीं हो सकेगा। अतः घटनावलियों, गुण-दोष, पुण्य-पाप, उत्थान-पतन, गौरव-निंदा आदि का यथास्थिति सच्चाई से वर्णन करने के लिये मन को संतुलित रखना आवश्यक है। शांत होने पर मन संतुलित होता है। अतएव शांत रस काव्य का प्रधान रस रखकर कल्हण ने इतिहास रचना की शैली के साथ न्याय किया है। काव्य की अनेक परिभाषाएँ की गयी हैं। अलंकारशास्त्र के पंडित किसी एक परिभाषा पर सहमत नहीं होते। तथापि स्वीकार करते हैं कि रमणीय अर्थ के प्रतिपादक शब्द को काव्य कहते हैं। सामान्य, सूक्ष्म तथा सूक्ष्मतम लक्षणों की दृष्टि से काव्य देखा जा सकता है। काव्य कवि की प्रतिभा का द्योतक है। वह प्रतिभा कहीं वरदान, आशीर्वाद अथवा जन्मजात गुण और कहीं व्युत्पत्ति तथा अभ्यास द्वारा परिलक्षित होती है। कल्हण का यह काव्य सूक्ष्म है। उसके पिता कुलीन तथा सुगठित थे। उसमें काव्य-कारण जन्म- पाठभेद : श्लोक संख्या २३ में 'चिन्तिते' का पाठभेद 'चिन्तिनि' मिलता है। पादटिप्पणियाँ : २३ (१) शांत रस—अलंकार ग्रंथों के नव रसों में शांत एक रस है। काश्मीरी विद्वान् द्वारा लिखित काव्यप्रकाश के अनुसार आठ रस होते हैं।