राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)
Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras
स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि द्वारा
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की ध्वनि बहती हुई चली आ रही है और वह उसे सुन रहा है। उस स्वप्नावस्था मे वह आनन्द में मस्त रहता है। जब वह जागता है, तब स्वप्न की वे घटनाएँ उसके मन पर एक गहरी छाप छोड़ जाती हैं। उस स्वप्न को सत्य मानकर उसका ध्यान करो। यदि तुम इसमें भी समर्थ न होओ, तो जो कोई पवित्र वस्तु तुम्हे अच्छी लगे, उसी का ध्यान करो।
यथाभिमतध्यानाद्वा ॥३९॥
सूत्रार्थ— अथवा जिसे जो कोई चीज अच्छी लगे, उसी के ध्यान से (समाधि प्राप्त होती है)।
व्याख्या— इससे यह न समझ लेना चाहिए कि किसी असत् वस्तु का भी ध्यान करने से बनेगा। जो कोई सत् वस्तु तुम्हे अच्छी लगे, जो स्थान तुम्हे बहुत पसन्द हो, जो दृश्य या जो भाव तुम्हे बहुत अच्छा लगता हो, जिससे तुम्हारा चित्त एकाग्र हो जाता हो, उसी का चिन्तन करो।
परमाणुपरममहत्त्वान्तोऽस्य वशीकारः ॥४०॥
सूत्रार्थ— इस प्रकार ध्यान करते-करते परमाणु से लेकर परम बृहत् पदार्थ तक सभी में उनके मन की गति अव्याहत हो जाती है।
व्याख्या— मन इस अभ्यास के द्वारा अत्यन्त सूक्ष्म से लेकर बृहत्तम वस्तु तक सभी पर सुगमता से ध्यान कर सकता है। ऐसा होने पर ये मनोवृत्ति-प्रवाह भी धीरे-धीरे क्षीण होने लगते हैं।
क्षीणवृत्तेरभिजातस्येव मणेर्ग्रहीतृग्रहणग्राह्येषु तत्स्थतदंजनता समापत्तिः ॥४१॥
सूत्रार्थ— जिन योगी की चित्तवृत्तियां इस प्रकार क्षीण हो चुकी है (वश में आ चुकी है) उनका चित्त उस समय ग्रहीता (आत्मा) ग्रहण (अन्त करण और इन्द्रियाँ) और ग्राह्य (पञ्चभूत और विषयो) में उसी