राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)
Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras
स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपातंजल-योगसूत्र १७५
प्रकार एकाग्रता और एकीभाव को प्राप्त होता है, जिस प्रकार शुद्ध स्फटिक (भिन्न-भिन्न रंगवाली वस्तुओ के सामने भिन्न-भिन्न रग धारण करता है)।
व्याख्या—इस प्रकार लगातार ध्यान करते-करते कौनसा फल प्राप्त होता है ? हमे यह स्मरण होगा कि पूर्वोक्त एक सूत्र मे पतंजलि ने विभिन्न प्रकार की समाधियो का वर्णन किया है। पहली समाधि है स्थूल विषय को लेकर, और दूसरी है सूक्ष्म विषय को लेकर। आगे चलकर, क्रमश और भी सूक्ष्मतर वस्तुएँ हमारी समाधि का विषय होती जाती है, यह भी पहले कहा जा चुका है। इन सब समाधियो के अभ्यास का फल यह है कि हम जितनी सुगमता से स्थूल विषयो का ध्यान कर सकते है, उतनी ही सुगमता से सूक्ष्म विषयो का भी। इस अवस्था में योगी तीन वस्तुएँ देखते है—ग्रहीता, ग्राह्य और ग्रहण, अर्थात् आत्मा, विषय और मन। हमे ध्यान के लिए तीन प्रकार के विषय दिए गये है। पहला है स्थूल, जैसे—शरीर या भौतिक पदार्थ, दूसरा है सूक्ष्म, जैसे—मन या चित्त, और तीसरा है गुणविशिष्ट पुरुष अर्थात् अस्मिता या अहकार। यहाँ आत्मा का अर्थ उसके यथार्थ स्वरूप से नही है। अभ्यास के द्वारा योगी इन सब ध्यानो मे दृढप्रतिष्ठ होकर रहते हैं। तब उन्हें ऐसी एकाग्रता-शक्ति प्राप्त हो जाती है कि ज्योही वे ध्यान करने बैठते हैं, त्योही अन्य सभी वस्तुओं को मन से हटा दे सकते है। वे जिस विषय का ध्यान करते है, उस विषय के साथ एक हो जाते हैं, जब वे ध्यान करते हैं, तब वे मानो स्फटिक के एक टुकड़े के समान हो जाते हैं। यह स्फटिक यदि फूल के पास रहे, तो वह फूल के साथ मानो एकरूप हो जाता है। यदि वह फूल लाल हो, तो स्फटिक भी लाल दिखाई