राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)
Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras
स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि द्वारा
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भावो के द्रष्टा, अर्थात् जो उन सब भावो का साक्षात्कार कर चुके है। उनके मत से, शास्त्रो का प्रामाण्य केवल यह है कि वे विश्वस्त मनुष्यो के वचन है। शास्त्र विश्वस्त मनुष्यो के वचन होने पर भी, वे कहते हैं कि केवल शास्त्र हमे सत्य का अनुभव कराने में कभी समर्थ नही है। हम भले ही सारे वेदो को पढ डाले, पर तो भी हो सकता है कि हमे किसी तत्त्व की अनुभूति न हो। पर जब हम उनमें वर्णित उपदेशो को अपने जीवन में उतारते है--उनके अनुसार कार्य करते है, तब हम ऐसी एक अवस्था में पहुँच जाते है, जिसमे शास्त्रोक्त बातो की प्रत्यक्ष उपलब्धि होती है। जहाँ युक्ति, प्रत्यक्ष या अनुमान किसी की भी पहुँच नही, यह अवस्था वहाँ भी ले जाने मे समर्थ है; वहाँ आप्तवाक्य की भी कोई उपयोगिता नही। यही इस सूत्र का तात्पर्य है। प्रत्यक्ष उपलब्धि करना ही यथार्थ धर्म है, वही धर्म का सार है, और शेष सब--उदाहरणार्थ, धर्म सम्बन्धी भाषण सुनना, धार्मिक ग्रन्थो का पाठ करना, या विचार करना--उस रास्ते के लिए तैयारी मात्र है। वह यथार्थ धर्म नही है। केवल किसी मत के साथ बौद्धिक सहमति अथवा असहमति धर्म नही है। योगियो का मूल भाव यह है कि जैसे इन्द्रियो के विषयो के साथ हम लोगो का साक्षात् सम्बन्ध होता है, उसी प्रकार धर्म भी प्रत्यक्ष किया जा सकता है, और इतना ही नही, बल्कि वह तो और भी उज्ज्वलतर रूप से अनुभूत हो सकता है। ईश्वर, आत्मा आदि जो सब धर्म के प्रतिपाद्य सत्य है, वे बहिरिन्द्रियो से प्रत्यक्ष नही हो सकते। मै आँखो से ईश्वर को नही देख सकता, या हाथ से उनका स्पर्श नही कर सकता। हम यह भी जानते हैं कि युक्ति-विचार हमें इन्द्रियो के अतीत नही ले जा सकता,