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राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)

राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)

Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras

स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि द्वारा

DevanagariHindipublished307 पृष्ठ

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पातंजल-योगसूत्र १०७

वह तो हमें सर्वथा एक अनिश्चित स्थल में छोड आता है। हम भले ही जीवन भर विचार करते रहे, जैसा कि दुनिया हजारों वर्षों से करती आ रही है, पर आखिर उसका फल क्या होता है? यही कि धर्म के सत्यो को प्रमाणित या अप्रमाणित करने में हम अपने को असमर्थ पाते हैं। हम जिसका इन्द्रियो से अनुभव करते हैं, उसी के आधार पर हम युक्ति, विचार आदि किया करते हैं। अत यह स्पष्ट है कि युक्ति को इन्द्रिय-अनुभव की इस चारदीवारी के भीतर ही चक्कर काटना पडता है; वह उसके बाहर कभी नही जा सकती। अतएव जो भी आध्यात्मिक तत्त्व हम अनुभव करेगे, वह सभी हमारी इन्द्रियो के अतीत प्रदेश में होगा। योगीगण कहते है कि मनुष्य इन्द्रिय-अनुभूति और विचार-शक्ति दोनों का ही अतिक्रमण कर सकता है। मनुष्य मे अपनी बुद्धि को भी लांघ जाने की शक्ति है, और यह शक्ति प्रत्येक प्राणी मे, प्रत्येक जन्तु मे निहित है। योग के अभ्यास से यह शक्ति जागरित हो जाती है। और तब मनुष्य विचार का घेरा पार कर तर्क के अगम्य विषयों का साक्षात्कार करता है।

तज्जः संस्कारोऽन्यसंस्कारप्रतिबन्धी ॥५०॥

सूत्रार्थ—यह समाधिजात सस्कार दूसरे सब सस्कारो का प्रतिबन्धी होता है, अर्थात् दूसरे संस्कारों को फिर आने नहीं देता।

व्याख्या—हमने पहले के सूत्र में देखा है कि उस ज्ञानातीत भूमि पर जाने का एकमात्र उपाय है—एकाग्रता। हमने यह भी देखा है कि पूर्व सस्कार ही उस प्रकार की एकाग्रता पाने में हमारे प्रतिबन्धक हैं। तुम सबो ने गौर किया होगा कि ज्योही तुम लोग मन को एकाग्र करने का प्रयत्न करते हो, त्योंही तुम्हारे अन्दर नाना प्रकार के विचार आने लगते हैं। ज्योही

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