भारतकोश
राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)

राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)

Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras

स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि द्वारा

DevanagariHindipublished307 पृष्ठ

पृष्ठ 274, कुल 307 में से

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पातंजल-योगसूत्र—४ २५७

रहे, तो उससे उस चरम लक्ष्य पर पहुँचने मे काफी अधिक समय लग जायगा। मान लो, कोई मनुष्य योगाभ्यास करने का या आध्यात्मिक भावसम्पन्न होने का इच्छुक है। अधिक दूर उन्नति करने के पहले ही, मान लो, उसकी मृत्यु हो गई। तब उसने और एक देह लेकर फिर से साधना करना शुरू किया। कुछ समय बाद फिर उसकी मृत्यु हो गई। इस प्रकार वारम्बार मरने और जन्म लेने से तो उसका काफी समय नष्ट हो गया। अब यदि शरीर को इतना सबल और निर्दोष बनाया जा सके कि उसके जन्म और मृत्यु बिलकुल बन्द हो जायें, तो आध्यात्मिक उन्नति के लिए उतना ही अधिक समय मिल सकेगा। इसीलिए ये 'रसायन'-सम्प्रदायवाले कहते हैं कि पहले शरीर को सबल बनाओ। उनका दावा है कि शरीर को अमर बनाया जा सकता है। उनका अभिप्राय यह है कि यदि मन ही शरीर का गठन करनेवाला हो, और यह यदि सत्य हो कि प्रत्येक व्यक्ति का मन उस अनन्त शक्ति के प्रकाश की एक-एक विशेष प्रणाली मात्र हो, तो ऐसी प्रत्येक प्रणाली के लिए बाहर से इच्छानुसार शक्ति सग्रह करने की कोई निर्दिष्ट सीमा नही हो सकती। अतः हम सदा के लिए इस शरीर को क्यो न रख सकेंगे ? हम जितने शरीर धारण करते है, उन सबका गठन हमें ही करना पडता है। ज्योही इस शरीर का पतन होगा, त्योही फिर से हमे एक और शरीर गढना पड़ेगा। जब हममे यह शक्ति है, तो इस शरीर से बाहर न जाकर, हम यही और अभी वह गठन-कार्य क्यो न कर सकेंगे ? यह मत पूर्ण रूप से सत्य है। यदि यह सम्भव हो कि हम मृत्यु के पश्चात् भी जीवित रहकर अपना शरीर पुन. गढ़ ले, तो फिर शरीर को पूरा ध्वंस किए

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