राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)
Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras
स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि द्वारा
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द्वाभ्यामपि तथैव ॥१०॥
अर्थ—दो मनुष्यो के एक साथ रहने पर भी ऐसा ही है।
निराश सुखी पिंगलावत् ॥११॥
अर्थ—आशा को त्याग देनेवाला सुखी होता है; दृष्टान्त—पिंगला नाम की वेश्या।
बहुशास्त्रगुरूपासनेऽपि सारादानं षट्पदवत् ॥१३॥
अर्थ—जिस प्रकार मधुकर बहुत से फूलो से मधु सग्रह करता है, उसी प्रकार यद्यपि बहुत से शास्त्रो और गुरुओ की उपासना की जाती है, तो भी उनमें से केवल सार को लेना चाहिए।
इषुकारवन्नैकचित्तस्य समाधिहानिः ॥१४॥
अर्थ—बाण बनानेवाले के समान एकाग्रचित्त रहने पर समाधि भग नही होती।
कृतनियमलंघनादानर्थक्यं लोकवत् ॥१५॥
अर्थ—जैसे लौकिक विषय में कृतनियमो का उल्लंघन करने पर महा अनर्थ होता है, वैसे ही इसमे भी।
प्रणतितद्ब्रह्मचर्योपसर्पणानि कृत्वा सिद्धिर्बहुकालात्तद्वत् ॥१९॥
अर्थ—प्रणति, ब्रह्मचर्य और गुरुसेवा के द्वारा, इन्द्र के समान, बहुत समय के बाद सिद्धि प्राप्त होती है।
न कालनियमो वामदेववत् ॥२०॥
अर्थ—ज्ञानोत्पत्ति का कोई कालनियम नही है। जैसे, वामदेव मुनि को (गर्भावस्था मे ज्ञान का उदय) हुआ था।
लब्धातिशययोगाद्वा तद्वत् ॥२४॥
अर्थ—जिस मनुष्य ने अतिशय यानी ज्ञान की पराकाष्ठा