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राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)

Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras

स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि द्वारा

DevanagariHindipublished307 पृष्ठ

२८६ राजयोग

द्वाभ्यामपि तथैव ॥१०॥

अर्थ—दो मनुष्यो के एक साथ रहने पर भी ऐसा ही है।

निराश सुखी पिंगलावत् ॥११॥

अर्थ—आशा को त्याग देनेवाला सुखी होता है; दृष्टान्त—पिंगला नाम की वेश्या।

बहुशास्त्रगुरूपासनेऽपि सारादानं षट्पदवत् ॥१३॥

अर्थ—जिस प्रकार मधुकर बहुत से फूलो से मधु सग्रह करता है, उसी प्रकार यद्यपि बहुत से शास्त्रो और गुरुओ की उपासना की जाती है, तो भी उनमें से केवल सार को लेना चाहिए।

इषुकारवन्नैकचित्तस्य समाधिहानिः ॥१४॥

अर्थ—बाण बनानेवाले के समान एकाग्रचित्त रहने पर समाधि भग नही होती।

कृतनियमलंघनादानर्थक्यं लोकवत् ॥१५॥

अर्थ—जैसे लौकिक विषय में कृतनियमो का उल्लंघन करने पर महा अनर्थ होता है, वैसे ही इसमे भी।

प्रणतितद्ब्रह्मचर्योपसर्पणानि कृत्वा सिद्धिर्बहुकालात्तद्वत् ॥१९॥

अर्थ—प्रणति, ब्रह्मचर्य और गुरुसेवा के द्वारा, इन्द्र के समान, बहुत समय के बाद सिद्धि प्राप्त होती है।

न कालनियमो वामदेववत् ॥२०॥

अर्थ—ज्ञानोत्पत्ति का कोई कालनियम नही है। जैसे, वामदेव मुनि को (गर्भावस्था मे ज्ञान का उदय) हुआ था।

लब्धातिशययोगाद्वा तद्वत् ॥२४॥

अर्थ—जिस मनुष्य ने अतिशय यानी ज्ञान की पराकाष्ठा

चतुर्थ अध्याय—प्रथम पाद

परिशिष्ट २८७

को प्राप्त कर लिया है, उसके संग के द्वारा भी विवेक प्राप्त होता है ।

न भोगात् रागशान्तिर्मुनिवत् ॥२७॥

अर्थ—जिस प्रकार भोग से सौभरि मुनि की आसक्ति दूर नही हुई थी, उसी प्रकार दूसरो की भी भोग के द्वारा आसक्ति नष्ट नही होती ।

पंचम अध्याय

योगसिद्धयोऽप्यौषधादिसिद्धिवन्नापलपनीयाः ॥१२८॥

अर्थ—ओषधि आदि के द्वारा आरोग्यसिद्धि होने के कारण जिस प्रकार मनुष्य ओषधि आदि की शक्ति को अस्वीकार नहीं करते, उसी प्रकार योगज सिद्धि को भी अस्वीकार नही किया जा सकता ।

षष्ठ अध्याय

स्थिरसुखमासनमिति न नियम. ॥२४॥

अर्थ—स्वस्तिक आदि आसन का अभ्यास करना ही पड़ेगा, ऐसा कोई नियम नही है । जिस प्रकार बैठना सुखकर हो और जिससे शरीर और मन विचलित न हो, वही आसन है ।

व्याससूत्र

चतुर्थ अध्याय—प्रथम पाद

आसीनः सम्भवात् ॥७॥

अर्थ—उपासना बैठकर ही सम्भव है, अतः बैठकर उपासना करनी चाहिए ।

ध्यानाच्च ॥८॥

अर्थ—ध्यान के कारण भी (बैठे हुए, अग-संचालन-क्रिया से रहित इत्यादि लक्षणयुक्त पुरुष को देखकर लोग कहते हैं,

२८८राजयोग

'ये ध्यान कर रहे हैं', अतएव ध्यान बैठे हुए पुरुष में ही सम्भव है)।

अचलत्वं चापेक्ष्य ॥९॥

अर्थ—क्योंकि ध्यानी पुरुष की तुलना निश्चल पृथ्वी के साथ की गई है।

स्मरन्ति च ॥१०॥

अर्थ—क्योंकि स्मृति में भी यही बात कही गई है।

यत्रैकाग्रता तत्राविशेषात् ॥११॥

अर्थ—जहाँ एकाग्रता होती हो, उसी स्थान में बैठकर ध्यान करना चाहिए, कारण, किस स्थान में बैठकर ध्यान करना होगा इसका कोई विशेष विधान नहीं है।

इन कुछ उद्धृत अंशों को देखने से यह ज्ञात हो जायगा कि अन्यान्य भारतीय दर्शन योग के बारे में क्या कहते हैं।

१३. भारत में विवेकानन्द—भारतीय व्याख्यान (द्वि स) ५.००

हमारे अन्य प्रकाशन

१-२ श्रीरामकृष्णलीलामृत— (विस्तृत जीवनी)—(चतुर्थ सस्करण) दो भागो में, प्रत्येक भाग का मूल्य रु. ५.००

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११. परमार्थ-प्रसग—स्वामी विरजानन्द, (आर्ट पेपर पर छपी हुई) सजिल्द, मूल्य रु ३.२५

स्वामी विवेकानन्दकृत पुस्तके

१२. देववाणी (अमरीकी शिष्यो को दिए गये उपदेश) (द्वि स.) २.७५ १३. भारत में विवेकानन्द—भारतीय व्याख्यान (द्वि स) ५.००

१४ पत्रावली (प्रथम भाग)<br>द्वितीय सस्करण, ५.२५२१ धर्मविज्ञान (द्वि स) १.६२
१५. पत्रावली (द्वितीय भाग)<br>द्वितीय सस्करण, ४.२५२२ हिन्दू धर्म (तृ स) १.५०
१६. ज्ञानयोग (द्वि स) ३.००२३ स्वामी विवेकानन्दजी से<br>वार्तालाप (द्वि स.) १.३७
१७. कर्मयोग (च स.) १.४०२४ आत्मानुभूति तथा उसके मार्ग<br>(च. स) १.२५
१८. प्रेमयोग (च स) १.३७२५ परिव्राजक (च स) १.२५
१९. भक्तियोग (च स.) १.३७२६ प्राच्य और पाश्चात्य<br>(पचम म) १.२५
२०. सरल राजयोग<br>(तृ. स) ०.५०२७. महापुरुषो की जीवनगाथायें<br>(अष्टम स) १.२५

(२)

२८ व्यावहारिक जीवन में वेदान्त (द्वि. म) १.१५४६. भारतीय नारी (च स) ०.७५.
२९ विविध प्रसङ्ग १.१२४७ पवहारी बाबा (द्वि स) ० ५०
३० धर्मरहस्य (तृ स) १ २५४८. ईशदूत ईसा (द्वि स.) ०.४०
३१ जाति, संस्कृति और समाजवाद (द्वि म) १ २५४९. विवेकानन्दजी के सान्निध्य में,- ० ९०
३२ स्वाधीन भारत! जय हो! (तृ स) १ ५०पॉकेट साइज पुस्तकें
३३ विवेकानन्दजी की कथाएं (तृ स) १ ६०५० शक्तिदायी विचार (तृ. म.) ० ६२
३४ चिन्तनीय बातें १.००५१ मेरी समरनीति (द्वि स) ० ६५.
३५ भगवान् रामकृष्ण, उनका सङ्घ (द्वि स) ०.६२५२ विवेकानन्दजी के उद्गार (द्वि स.) ० ६५.
३६ शिक्षा (तृ स) ०.६२५३ श्रीरामकृष्ण-उपदेश-स्वामी ब्रह्मानन्द द्वारा संकलित,- (च. स) ० ७५.
३७ कवितावली (द्वि स) ०.६२५४. रामकृष्ण संघ— आदर्श और इतिहास— (द्वि. स.) स्वामी तेजसानन्द, ० ७५
३८ हमारा भारत (द्वि स) ० ६५५५ साधु नागमहाशय (भगवान् श्रीरामकृष्ण के अन्तरंग गृही शिष्य का जीवन-चरित) १ ५०
३९ मेरे गुरुदेव (प स) ० ६२५६ गीतातत्त्व-स्वामी सारदानन्द,- २ ३७
४०. वर्तमान भारत (प स) ० ५०५७ भारत में शक्ति-पूजा— स्वामी सारदानन्द, १ २५.
४१ शिकागो वक्तृता (सप्तम स) ०.६२५८ वेदान्त—सिद्धान्त और व्यवहार, (द्वि स) स्वामी सारदानन्द ० ५०
४२ हिन्दू धर्म के पक्ष में (तृ स) ० ७५
४३ मरणोत्तर जीवन (तृ स) ० ५०
४४. मेरा जीवन तथा ध्येय (तृ स) ०.५०
४५ मन की शक्तियाँ तथा जीवन-गठन की साधनायें (तृ. स.) ० ४०

श्रीरामकृष्ण आश्रम, धन्तोली, नागपुर-१