राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)
Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras
स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि द्वारा
२२४ | राजयोग
जितने महान् मस्तिष्कशाली पुरुष हो गए हैं, वे सभी ब्रह्मचर्य्य-वान थे। इसके द्वारा मनुष्य-जाति पर आश्चर्यजनक क्षमता प्राप्त की जा सकती है। मानवसमाज के सभी आध्यात्मिक नेता-गण ब्रह्मचर्य्यवान थे—उन्हे सारी शक्ति इस ब्रह्मचर्य्य से ही प्राप्त हुई थी। अतएव योगी का ब्रह्मचर्य्यवान होना अनिवार्य्य है।
अपरिग्रहस्थैर्ये जन्मकथन्तासंबोधः ॥३९॥
सूत्रार्थ — अपरिग्रह के दृढ़प्रतिष्ठित हो जाने पर पूर्वजन्मो की बात स्मृति में उदित हो जाती है।
व्याख्या — जब योगी दूसरे के पास से कोई वस्तु स्वीकार नही करते, तब उन पर दूसरो का कोई असर नही पड़ता, वे किसी के द्वारा अनुगृहीत नही होते और इसलिए वे स्वाधीन एव मुक्त-स्वभाव हो जाते हैं। उनका मन शुद्ध हो जाता है। दान स्वीकार करने से दाता के पाप भी लेने की सम्भावना रहती है। इस परिग्रह को त्याग देने पर मन शुद्ध हो जाता है, और इससे जो सब फल प्राप्त होते हैं, उनमें पूर्वजन्म की स्मृति का उदय होना प्रथम है। तभी वे योगी सम्पूर्ण रूप से अपने लक्ष्य में दृढ होकर रह सकते हैं। वे देख लेते हैं कि इतने दिन तक वे केवल आवागमन कर रहे थे। तब वे दृढ प्रतिज्ञा कर लेते है कि अब की वार मै अवश्य मुक्त होऊँगा, मै अब और आवागमन नही करूँगा, प्रकृति का दास नही होऊँगा।
शौचात् स्वांगजुगुप्सा परैरसंसर्गः ॥४०॥
सूत्रार्थ — शौच के प्रतिष्ठित हो जाने पर अपने शरीर के प्रति घृणा का उद्रेक होता है, दूसरो के साथ संग करने की भी फिर प्रवृत्ति नहीं रहती।
व्याख्या — जब यथार्थ वाह्य और आभ्यन्तर दोनो प्रकार
पातंजल-योगसूत्र—२ २२५
पातंजल-योगसूत्र—२ २२५
के शौच सिद्ध हो जाते है, तब शरीर के प्रति उदासीनता आ जाती है—उसे कैसे अच्छा रखे, कैसे वह सुन्दर दिखेगा, ये सब भाव बिलकुल चले जाते है। सासारिक लोग जिसे अत्यन्त सुन्दर मुख कहेगे, उसमें यदि ज्ञान का कोई चिह्न न हो, तो वही योगी के निकट पशु के मुख के समान प्रतीत होगा। संसार के मनुष्य जिस मुख मे कोई विशेषता नही देखते, उसके पीछे यदि चैतन्य का प्रकाश हो, तो योगी उसे स्वर्गीय मुखश्री कहेगे। यह देह-तृष्णा मानव-जीवन के लिए एक अभिशापस्वरूप है। अत शौच-प्रतिष्ठा का पहला लक्षण यह दिखेगा कि तुम शरीर के प्रति उदासीन हो जाओगे—तुम्हारे मन में यह विचार तक न उठेगा कि तुम्हारे शरीर है भी। जब यह पवित्रता हममे आती है, तभी हम देह-भाव के ऊपर उठ सकते हैं।
सत्त्वशुद्धिसौमनस्यैकाग्र्येन्द्रियजयात्मदर्शनयोग्यत्वानि च ॥४१॥
सूत्रार्थ—इसके सिवा (इस शौच से) सत्त्वशुद्धि, सौमनस्य अर्थात् मन का प्रफुल्ल भाव, एकाग्रता, इन्द्रियजय और आत्मदर्शन की योग्यता—ये पाँचो भी होते है।
**व्याख्या—**इस शौच के अभ्यास द्वारा सत्त्व पदार्थ का प्राबल्य होता है और मन एकाग्र एव प्रफुल्ल हो जाता है। तुम धर्म-पथ में अपने अग्रसर होने का प्रथम लक्षण यह देखोगे कि तुम दिन-पर-दिन बड़े प्रफुल्ल होते जा रहे हो। यदि कोई व्यक्ति विषादयुक्त दिखे, तो वह अजीर्ण का फल भले ही हो, पर धर्म का लक्षण नही हो सकता। सुख का भाव ही सत्त्व का स्वाभाविक धर्म है, सात्त्विक मनुष्य के लिए सभी सुखमय प्रतीत होते हैं। अत. जब तुममें यह आनन्द का भाव आता रहे, तो समझना कि तुम योग मे उन्नति कर रहे हो। सारे दुःख-कष्ट तमोगुण से
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> स्वाध्यायादिष्टदेवतासम्प्रयोगः ॥४४॥
२२६ राजयोग
उत्पन्न होते हैं; अतएव तुम्हे उससे बचकर रहना होगा—उसको दूर कर देना होगा। विषादपूर्ण होकर चेहरा उतारे रहना तमोगुण का एक लक्षण है। सबल, दृढ़, स्वस्थ, युवक और साहसी मनुष्य ही योगी बनने के योग्य है। योगी के लिए सभी सुखमय प्रतीत होते हैं, वे जिस किसी मनुष्य को देखते हैं, उसी से उनको आनन्द होता है। यही धार्मिक मनुष्य का चिह्न है। पाप ही कष्ट का कारण है, अन्य किसी कारण से कष्ट नहीं आता। उतरा हुआ चेहरा लेकर क्या होगा? कैसा भयानक दृश्य है वह! ऐसी सूरत लेकर बाहर मत जाना। किसी दिन ऐसा होने पर दरवाजा बन्द करके समय बिता देना। संसार के भीतर इस बीमारी को संक्रामित करने का तुम्हें क्या अधिकार है? जब तुम्हारा मन संयत हो जायगा, तब तुम पूरे शरीर को वश में रख सकोगे। तब फिर तुम इस यन्त्र के दास नहीं बने रहोगे, यह देह-यन्त्र ही तुम्हारा दास होकर रहेगा। तब यह देह-यन्त्र आत्मा को खींचकर नीचे की ओर न ले जाकर उसकी मुक्ति में महान् सहायक हो जायगा।
सन्तोषादनुत्तमः सुखलाभः ॥४२॥
सूत्रार्थ— सन्तोष से परम सुख प्राप्त होता है।
कायेन्द्रियसिद्धिरशुद्धिक्षयात्तपसः ॥४३॥
सूत्रार्थ— तपस्या से जब अशुद्धि का नाश हो जाता है, तब शरीर और इन्द्रियों की सिद्धि हो जाती है अर्थात् उनमें नाना प्रकार की शक्तियां आती हैं।
व्याख्या— तपस्या का फल कभी-कभी अचानक दूरदर्शन, दूरश्रवण इत्यादि रूप से प्रकाशित होता है।
स्वाध्यायादिष्टदेवतासम्प्रयोगः ॥४४॥
सूत्रार्थ— मन्त्र के पुनः-पुनः उच्चारण या अभ्यास से इष्टदेवता के दर्शन होते हैं।
पातंजल-योगसूत्र—२ २२७
**व्याख्या—**जितने उच्च स्तर के जीव (देवता, ऋषि, सिद्ध) देखने की इच्छा करोगे, अभ्यास भी उतना ही अधिक करना पड़ेगा।
समाधिसिद्धिरीश्वरप्रणिधानात् ॥४५॥
**सूत्रार्थ—**ईश्वर में समस्त अर्पण करने से समाधि-लाभ होता है।
**व्याख्या—**ईश्वर पर निर्भरता से समाधि की पूर्णता होती है।
स्थिरसुखमासनम् ॥४६॥
**सूत्रार्थ—**स्थिर भाव से सुखपूर्वक बैठने का नाम आसन है।
**व्याख्या—**अब आसन की बात कही जायगी। जब तक तुम स्थिर भाव से बहुत समय तक बैठे रहने में समर्थ नही होते, तब तक प्राणायाम एव अन्यान्य साधनो मे किसी प्रकार सफल नही हो सकोगे। आसन के स्थिर होने का तात्पर्य है—शरीर के अस्तित्व का बिलकुल भान तक न होना। साधारणत यह देखा जाता है कि ज्योही तुम चन्द मिनट के लिए बैठते हो, त्योही शरीर में नाना प्रकार के विकार आने लगते है। पर जब तुम स्थूल देहभाव के परे चले जाओगे, तब तुम्हे शरीर का भान तक न रहेगा। फिर तुम सुख या दुख कुछ भी अनुभव नही करोगे। जब फिर से तुम्हे शरीर का ज्ञान आयगा, जब तुम आसन से उठोगे, तो ऐसा लगेगा कि तुमने बहुत समय तक विश्राम किया है। यदि शरीर को सम्पूर्ण विश्राम देना सम्भव हो, तो वह इसी प्रकार हो सकता है। जब तुम इस प्रकार शरीर को अपने अधीन करके उसे दृढ रख सकोगे, तब जानना कि तुम्हारा साधन भी दृढ हुआ है। किन्तु जब तक शारीरिक विघ्न-बाधाएँ आती रहेगी, तब तक तुम्हारे स्नायु चचल रहेगे और तुम किसी भी प्रकार मन को एकाग्र न कर सकोगे।
१२८ राजयोग
प्रयत्नशैथिल्यानन्तसमापत्तिभ्याम् ॥४७॥
**सूत्रार्थ—**शरीर में एक प्रकार का जो अभिमानात्मक प्रयत्न है (अर्थात् चंचलता की ओर शरीर की जो एक स्वाभाविक प्रवृत्ति है), उसे शिथिल कर देने से और अनन्त के चिन्तन से (आसन स्थिर और सुखकर होता है)।
**व्याख्या—**अनन्त के चिन्तन के द्वारा आसन अविचलित (स्थिर) हो सकता है। पर हाँ, हम उस सर्वद्वन्द्वातीत अनन्त (ब्रह्म) के बारे में (सरलता से) चिन्तन नहीं कर सकते, किन्तु हम अनन्त आकाश के बारे में सोच सकते हैं।
ततो द्वन्द्वानभिघातः ॥४८॥
**सूत्रार्थ—**इस प्रकार आसन सिद्ध हो जाने पर, तब द्वन्द्वपरम्परा और कुछ विघ्न उत्पन्न नहीं कर सकती।
**व्याख्या—**द्वन्द्व का अर्थ है शुभ-अशुभ, शीत-उष्ण, आलोक-अँधेरा, सुख-दुःख आदि विपरीत धर्मवाले दो-दो पदार्थ। ये सब फिर तुम्हें चंचल नहीं कर सकेंगे।
तस्मिन् सति श्वासप्रश्वासयोर्गतिविच्छेदः प्राणायामः ॥४९॥
**सूत्रार्थ—**उस आसन की सिद्धि होने के बाद श्वास और प्रश्वास दोनों की गति को संयत करना प्राणायाम कहलाता है।
**व्याख्या—**जब यह आसन सिद्ध हो जाता है, तब इस श्वास-प्रश्वास की गति को रोककर उस पर जय प्राप्त करना पड़ेगा। अत अब प्राणायाम का विषय आरम्भ होता है। प्राणायाम क्या है? शरीरस्थित जीवनी-शक्ति को वश में लाना। यद्यपि 'प्राण' शब्द बहुधा श्वास के अर्थ में प्रयुक्त होता है, तो भी वास्तव में वह श्वास नहीं है। प्राण का अर्थ है जागतिक समस्त शक्तियों की समष्टि। यह वह शक्ति है, जो प्रत्येक देह
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में अवस्थित है, और उसका ऊपरी प्रकाश है—फेफडे की यह गति। प्राण जब श्वास को भीतर की ओर खींचता है, तभी यह गति शुरू होती है, प्राणायाम करने के समय हम उसी को संयत करने का प्रयत्न करते हैं। इस प्राण पर अधिकार प्राप्त करने के लिए हम पहले श्वास-प्रश्वास को संयत करना शुरू करते हैं, क्योकि वही प्राण-जय का सबसे सरल मार्ग है।
बाह्याभ्यन्तरस्तम्भवृत्तिः देशकालसंख्याभिः परिदृष्टो दीर्घसूक्ष्मः ॥५०॥
सूत्रार्थ— बाह्यवृत्ति, आभ्यन्तरवृत्ति और स्तम्भवृत्ति के भेद से यह प्राणायाम तीन प्रकार का है, देश, काल और संख्या के द्वारा नियमित तथा दीर्घ या सूक्ष्म होने के कारण उनमें भी फिर नाना प्रकार के भेद हैं।
व्याख्या— यह प्राणायाम तीन प्रकार की क्रियाओ में विभक्त है। पहली—जब हम श्वास को अन्दर खींचते और धारण करते है, दूसरी—जब हम उसे बाहर निकालते और धारण करते है, तीसरी—जब श्वास और प्रश्वास को फेफडे के भीतर या उसके बाहर रोकते है। ये फिर देश, काल और संख्या के अनुसार भिन्न-भिन्न रूप धारण करते है। देश का अर्थ है—प्राण को शरीर के किसी अंगविशेष मे आबद्ध रखना। समय का अर्थ है—प्राण को किस स्थान में कितने समय तक रखना होगा, इस बात का ज्ञान, और संख्या का अर्थ है—यह जान लेना कि कितनी बार ऐसा करना होगा। इसीलिए कहाँ पर, कितने समय तक और कितनी बार रेचक आदि करना होगा, इत्यादि कहा जाता है। इस प्राणायाम का फल है उद्घात अर्थात् कुण्डलिनी का जागरण।
> धारणासु च योग्यता मनसः ॥५३॥
२३० राजयोग
वाह्याभ्यन्तरविषयाक्षेपी चतुर्थः ॥५१॥
सूत्रार्थ—चौथे प्रकार का प्राणायाम वह है, जिसमें प्राणायाम के समय बाह्य या आभ्यन्तर किसी विषय का चिन्तन किया जाता है।
व्याख्या—यह चौथे प्रकार का प्राणायाम है। इसमें चिन्तन के साथ दीर्घकाल तक अभ्यास करते रहने से कुम्भक होता है। दूसरे प्राणायामों में चिन्तन का सम्पर्क नहीं रहता।
ततः क्षीयते प्रकाशावरणम् ॥५२॥
सूत्रार्थ—उस (प्राणायाम के अभ्यास) से (चित्त के) प्रकाश का आवरण क्षीण हो जाता है।
व्याख्या—चित्त में स्वभावत समस्त ज्ञान भरा है, वह सत्त्व पदार्थ द्वारा निर्मित है, पर रज और तम पदार्थों से ढका हुआ है। प्राणायाम के द्वारा चित्त का यह आवरण चला जाता है।
धारणासु च योग्यता मनसः ॥५३॥
सूत्रार्थ—(उसी से) धारणा में मन की योग्यता भी (होती है)।
व्याख्या—यह आवरण चले जाने पर हम मन को एकाग्र करने में समर्थ होते हैं।
स्वविषयासम्प्रयोगे चित्तस्वरूपानुकार इवेन्द्रियाणां प्रत्याहारः ॥५४॥
सूत्रार्थ—जब इन्द्रियाँ अपने-अपने विषय को छोड़कर मानो चित्त का स्वरूप ग्रहण करती हैं, तब उसे प्रत्याहार कहते हैं।
व्याख्या—ये इन्द्रियाँ मन की ही विभिन्न अवस्थाएँ मात्र हैं। मैं एक पुस्तक देखता हूँ। वास्तव में, वह पुस्तक-आकृति बाहर में नहीं है। वह तो मन में है। बाहर की कोई चीज उस आकृति को केवल जगा भर देती है, वास्तव में तो वह चित्त में ही है।
पातंजल-योगसूत्र—२ २३१
पातंजल-योगसूत्र—२ २३१
इन इन्द्रियों के सामने जो कुछ आता है, उसके साथ ये मिश्रित होकर, उसी का आकार धारण कर लेती है। यदि तुम चित्त को ये सब विभिन्न आकृतियाँ धारण करने से रोक सको, तभी तुम्हारा मन शान्त होगा और इन्द्रियाँ भी मन के अनुरूप हो जायँगी। इसी को प्रत्याहार कहते है।
तत परमा वश्यतेन्द्रियाणाम् ॥५५॥
**सूत्रार्थ—**उस (प्रत्याहार) से इन्द्रियों पर सम्पूर्ण रूप से जय प्राप्त हो जाती है।
**व्याख्या—**जब योगी इन्द्रियो को इस प्रकार बाहरी वस्तु का आकार धारण करने से रोक सकते हैं और चित्त के साथ उन्हे एक करके रखने में सफल होते हैं, तभी इन्द्रियो पर पूर्ण रूप से जय प्राप्त होता है। और जब इन्द्रियाँ पूरी तरह विजित हो जाती हैं, तब एक-एक स्नायु, एक-एक मांसपेशी तक हमारे वश में आ जाती है, क्योकि इन्द्रियाँ ही सब प्रकार की संवेदना (अनुभूति) और कार्य की केन्द्रस्वरूप हैं। ये इन्द्रियाँ ज्ञानेन्द्रिय और कर्मेन्द्रिय, इन दो भागो में विभक्त हैं। अत जब इन्द्रियाँ संयत होगी, तब योगी सब प्रकार के भावो और कार्यों पर जय-लाभ कर सकेगे। सारा शरीर ही उनके अधीन हो जायगा। ऐसी अवस्था प्राप्त होने पर ही मनुष्य देह-धारण में आनन्द अनुभव करने लगता है। तभी वह सत्यतापूर्वक कह सकता है, “मै धन्य हूँ जो मेरा जन्म हुआ।” जब इन्द्रियो पर ऐसा अधिकार प्राप्त हो जाता है, तभी हम यह अनुभव कर सकते हैं कि यह शरीर भी कैसी अद्भुत चीज है!
तृतीय अध्याय
विभूतिपाद
अब हम विभूतिपाद मे आते है।
देशबन्धश्चित्तस्य धारणा ॥१॥
सूत्रार्थ—चित्त को किसी विशेष वस्तु में आबद्ध करके रखने का नाम है धारणा।
व्याख्या—जब मन शरीर के भीतर या उसके बाहर किसी वस्तु के साथ सलग्न होता है और कुछ समय तक उसी तरह रहता है, तो उसे धारणा कहते हैं।
तत्र प्रत्ययैकतानता ध्यानम् ॥२॥
सूत्रार्थ—वह वस्तुविषयक ज्ञान निरन्तर एक रूप से प्रवाहित होते रहने पर उसे ध्यान कहते हैं।
व्याख्या—मान लो, मन किसी एक विषय को सोचने का प्रयत्न कर रहा है, किसी एक विशेष स्थान में—जैसे, मस्तक के ऊपर अथवा हृदय आदि मे—अपने को पकड रखने का प्रयत्न कर रहा है। यदि मन शरीर के केवल उस अंश के द्वारा संवेदनाओ (अनुभूतियो) को ग्रहण करने मे समर्थ होता है, शरीर के शेष सब भागो को यदि विषय-ग्रहण से विवृत रख सकता है, तो उसका नाम धारणा है, और जब वह अपने को कुछ समय तक उसी अवस्था में रखने मे समर्थ होता है, तो उसका नाम है ध्यान।
तदेवार्थमात्रनिर्भासं स्वरूपशून्यमिव समाधि ॥३॥
सूत्रार्थ—वही (ध्यान) जब समस्त बाहरी उपाधियों को छोड़कर अर्थ मात्र को ही प्रकाशित करता है, तब उसे समाधि कहते हैं।
पातंजल-योगसूत्र-३ २३३
पातंजल-योगसूत्र-३ २३३
व्याख्या—जब ध्यान में वस्तु का रूप या बाहरी भाग परित्यक्त हो जाता है, तभी यह समाधि-अवस्था आती है। मान लो, में इस पुस्तक के बारे मे ध्यान कर रहा हूँ और सोचो, मैं उसमें चित्त-संयम करने मे सफल हो गया। तब केवल, बिना किसी रूप मे प्रकाशित, अर्थ नामक आभ्यन्तरिक सवेदनाएँ (अनुभूतियाँ) ही मेरे ज्ञान में आने लगती है। ध्यान की इस अवस्था को समाधि कहते है।
त्रयमेकत्र संयमः ॥४॥
सूत्रार्थ—इन तीनो का जब एक साथ अर्थात् एक ही वस्तु के सम्बन्ध में अभ्यास किया जाता है, तब उसे संयम कहते हैं।
व्याख्या—जब कोई व्यक्ति अपने मन को किसी निर्दिष्ट वस्तु की ओर ले जाकर उस वस्तु में कुछ समय तक के लिए धारण कर सकता है, और फिर उसके अन्तर्भाग को उसके बाहरी आकार से अलग करके बहुत समय तक रख सकता है, तभी समझना चाहिए कि संयम हुआ। अर्थात् धारणा, ध्यान और समाधि, ये तीनों क्रमशः एक के बाद एक, किसी एक वस्तु के ऊपर होने पर एक संयम हुआ। तब उस वस्तु का बाहरी आकार न जाने कहाँ चला जाता है, मन में केवल उसका अर्थ मात्र उद्भासित होता रहता है।
तज्जयात् प्रज्ञालोकः ॥५॥
सूत्रार्थ—उसको जीत लेने से ज्ञानालोक का प्रकाश होता है।
व्याख्या—जब कोई मनुष्य इस संयम के साधन में सफल हो जाता है, तब सारी शक्तियाँ उसके हाथ मे आ जाती हैं। यह संयम ही योगी के ज्ञानलाभ का प्रधान यन्त्रस्वरूप है। ज्ञान के विषय अनन्त हैं। वे स्थूल, स्थूलतर, स्थूलतम और सूक्ष्म,
> तस्य भूमिषु विनियोगः ॥६॥
२३४ | राजयोग
सूक्ष्मतर, सूक्ष्मतम आदि नाना विभागों में विभक्त हैं। इस संयम का प्रयोग पहले स्थूल वस्तु पर करना चाहिए, और जब स्थूल का ज्ञान प्राप्त होने लगे, तब थोड़ा-थोड़ा करके सोपान-क्रम से सूक्ष्मतर वस्तु पर उसका प्रयोग करना चाहिए।
तस्य भूमिषु विनियोगः ॥६॥
सूत्रार्थ—उस (संयम) का प्रयोग सोपान-क्रम से करना चाहिए।
व्याख्या—जल्दबाजी मत करना। यह सूत्र इस प्रकार हमें सावधान कर दे रहा है।
त्रयमन्तरंगं पूर्वेभ्यः ॥७॥
सूत्रार्थ—पहले कहे गए (साधनों) की अपेक्षा ये तीनों (साधन अधिक) अन्तरंग हैं।
व्याख्या—इनके पहले यम, नियम, आसन, प्राणायाम और प्रत्याहार की बात कही गई है। वे धारणा, ध्यान और समाधि की अपेक्षा बहिरंग हैं। इन धारणा आदि अवस्थाओं को प्राप्त करने पर मनुष्य सर्वज्ञ और सर्वशक्तिमान अवश्य हो सकता है, पर सर्वज्ञता अथवा सर्वशक्तिमत्ता तो मुक्ति नहीं है। केवल इन तीन प्रकार के साधनों द्वारा मन निर्विकल्प अर्थात् परिणामशून्य नहीं हो सकता, इन त्रिविध साधनों का अभ्यास होने पर भी देह-धारण का बीज रह जाता है। जब वह बीज, जैसा कि योगीगण कहते हैं, भून दिया जाता है, तभी उसकी पुन वृक्ष उत्पन्न करने की शक्ति जाती रहती है। ये शक्तियाँ उस बीज को कभी भून नहीं सकतीं।
तदपि बहिरंगं निर्बीजस्य ॥८॥
सूत्रार्थ—पर वे (धारणा आदि तीनों) भी निर्बीज (समाधि) की तुलना में बहिरंग (साधन) हैं।
पातंजल-योगसूत्र—३ २३५.
पातंजल-योगसूत्र—३ २३५.
व्याख्या—इसी कारण निर्बीज समाधि के साथ तुलना करने पर इनको भी बहिरंग कहना पडेगा । सयम-लाभ होने पर हम वस्तुत सर्वोच्च समाधि-अवस्था की प्राप्ति नही कर लेते, वरन् एक निम्नतर भूमि मे अवस्थित रहते है । उस अवस्था में यह परिदृश्यमान जगत् विद्यमान रहता है, और सब सिद्धियाँ इस जगत् के ही अन्तर्गत हैं ।
व्युत्थाननिरोधसंस्कारयोरभिभवप्रादुर्भावौ
निरोधक्षणचित्तान्वयो निरोधपरिणामः ॥९॥
सूत्रार्थ—जब व्युत्थान अर्थात् मन की चंचलता का अभिभव (नाश) और निरोध-सस्कार का आविर्भाव हो जाता है, उस समय चित्त निरोध नामक सस्कार के अनुगत होता है, उसे निरोध-परिणाम कहते हैं ।
व्याख्या—इसका तात्पर्य यह है कि समाधि की पहली अवस्था मे मन की समस्त वृत्तियाँ निरुद्ध अवश्य होती हैं, किन्तु सम्पूर्ण रूप से नही, क्योकि वैसा होने पर तो किसी प्रकार की वृत्ति ही न रह जाती । मान लो, मन मे एक ऐसी वृत्ति उठी है, जो मन को इन्द्रिय की ओर ले जा रही है, और योगी उस वृत्ति को सयत करने का प्रयत्न कर रहे है । इस अवस्था मे उस सयम को भी एक वृत्ति कहना पडेगा । एक लहर मानो दूसरी लहर द्वारा रोकी गई है, अतः वह समस्त लहरो की निवृत्तिरूप समाधि नही है, क्योकि वह संयम भी एक लहर है । फिर भी, जिस अवस्था में मन में तरंग के बाद तरंग उठती रहती है, उसकी अपेक्षा यह् निम्नतर समाधि उस उच्चतर समाधि के अधिक समीपवर्ती है ।
तस्य प्रशान्तवाहिता संस्कारात् ॥१०॥
सूत्रार्थ—अभ्यास के द्वारा इसकी स्थिरता होती है ।
~२३६ राजयोग
व्याख्या—प्रतिदिन नियमित रूप से अभ्यास करने पर मन का यह नियत संयम प्रवाहाकार में चलता रहता है एव उसकी स्थिरता होती है, और तब मन सदैव एकाग्रशील रह सकता है।
सर्वार्थतैकाग्रतयोः क्षयोदयौ चित्तस्य समाधिपरिणामः ॥११॥
सूत्रार्थ—सब प्रकार के विषयो का चिन्तन करने की वृत्ति का क्षय हो जाना और किसी एक ही ध्येयविषय का चिन्तन करनेवाली एकाग्रता-शक्ति का उदय हो जाना—यह चित्त का समाधि-परिणाम है।
व्याख्या—मन सर्वदा ही नाना प्रकार के विषय ग्रहण कर रहा है, सदैव सब प्रकार की वस्तुओ में जा रहा है। फिर मन की ऐसी भी एक उच्चतर अवस्था है, जब वह केवल एक ही वस्तु को ग्रहण करके अन्य सब वस्तुओ को छोड दे सकता है। इस एक वस्तु को ग्रहण करने का फल है समाधि।
शान्तोदितौ तुल्यप्रत्ययौ चित्तस्यैकाग्रतापरिणाम ॥१२॥
सूत्रार्थ—जब मन शान्त और उदित अर्थात् अतीत और वर्तमान दोनों अवस्थाओ में ही तुल्य-प्रत्यय हो जाता है, अर्थात् दोनो को ही एक साथ ग्रहण कर सकता है, तब उसे चित्त का एकाग्रता-परिणाम कहते हैं।
व्याख्या—मन एकाग्र हुआ है, यह कैसे जाना जाय? मन के एकाग्र हो जाने पर समय का कोई ज्ञान न रहेगा। जितना ही समय का ज्ञान जाने लगता है, हम उतने ही एकाग्र होते जाते हैं। हम अपने दैनिक जीवन में भी देख पाते हैं कि जब हम कोई पुस्तक पढ़ने में तल्लीन रहते हैं, तब समय की ओर हमारा बिलकुल ध्यान नहीं रहता। जब हम पढ़कर उठते हैं, तो आश्चर्य करने लगते हैं कि इतना समय बीत गया! सारा समय मानो एकत्र होकर वर्तमान में एकीभूत हो जाता है। इसी-
पातञ्जल-योगसूत्र-३ २३७
लिए कहा गया है कि अतीत, वर्तमान और भविष्य आकर जितना ही एकीभूत होते जाते हैं, मन उतना ही एकाग्र होता जाता है ।
एतेन भूतेन्द्रियेषु धर्मलक्षणावस्थापरिणामा व्याख्याताः ॥१३॥
**सूत्रार्थ—**इसी से भूतो में और इन्द्रियों में होनेवाले धर्म-परिणाम, लक्षण-परिणाम और अवस्था-परिणाम—(ये तीनों) कहे जा चुके ।
**व्याख्या—**पीछे के तीन सूत्रो में चित्त के निरोध आदि परिणामो की जो बात कही गई है, उसके द्वारा भूतो और इन्द्रियो के धर्म, लक्षण और अवस्थारूप तीन प्रकार के परिणामो की भी व्याख्या कर दी गई । मन लगातार वृत्ति के रूप में परिणत हो रहा है, यह मन का धर्मरूप परिणाम है । वह अतीत, वर्तमान और भविष्य इन तीन कालो के भीतर से होकर चल रहा है, यह मन का लक्षणरूप परिणाम है । कभी निरोधसस्कार प्रबल और व्युत्थानसस्कार दुर्बल हो जाता है, तो कभी ठीक इसका उलटा होता है, यह मन का अवस्थारूप परिणाम है । मन के इन तीन परिणामो के समान भूतो और इन्द्रियो के भी त्रिविध परिणाम समझना चाहिए । जैसे, मिट्टी का पिण्ड जब अपना पिण्डरूप धर्म छोडकर घटरूप धर्म में परिणत हो जाता है, तब उसे धर्म-परिणाम कहते हैं । जब इसी घटना को हम समय की दृष्टि से देखते हैं अर्थात् उसके वर्तमान, अतीत और भविष्य अवस्थारूप परिणामो को देखते हैं, तब उसे लक्षण-परिणाम कहते हैं । फिर उसके नवीनत्व, पुरातनत्व आदि अवस्थारूप परिणामो को अवस्था-परिणाम कहते हैं ।
पहले के सूत्रो में जिन सब समाधियो की बात कही गई है, उनका उद्देश्य यह है कि योगी मन के परिणामो पर इच्छापूर्वक क्षमता प्राप्त कर सके । उससे पूर्वोक्त सयमीशक्ति प्राप्त होती है ।
२३८ राजयोग
शान्तोदिताव्यपदेश्यधर्मानुपाती धर्मी ॥१४॥
सूत्रार्थ— शान्त (अतीत), उदित (वर्तमान) और अव्यपदेश्य (आनेवाले) धर्म जिसमें अवस्थित हैं, वह धर्मी है।
व्याख्या— धर्मी उसे कहते हैं, जिस पर काल और संस्कार कार्य कर रहे हैं, जिसमें सतत परिणाम हो रहा है और जो हरदम व्यक्त भाव धारण कर रहा है।
क्रमान्यत्वं परिणामान्यत्वे हेतुः ॥१५॥
सूत्रार्थ— भिन्न-भिन्न परिणाम होने का कारण है क्रम की भिन्नता (पूर्वापर पार्थक्य)।
परिणामत्रयसंयमादतीतानागतज्ञानम् ॥१६॥
सूत्रार्थ— पूर्वोक्त तीन परिणामों में चित्त-संयम करने से अतीत और अनागत (भविष्य) का ज्ञान उत्पन्न होता है।
व्याख्या— पहले संयम की जो परिभाषा दी गई है, हम उसे न भूलें। जब मन वस्तु के बाहरी भाग को छोड़कर उसके आभ्यन्तरिक भावों के साथ अपने को एकरूप करने की उपयुक्त अवस्था में पहुँच जाता है, जब दीर्घ अभ्यास के द्वारा मन केवल उसी की धारणा करके क्षण भर में उस अवस्था में पहुँच जाने की शक्ति प्राप्त कर लेता है, तब उसे संयम कहते हैं। इस अवस्था को प्राप्त करके यदि योगी भूत और भविष्य जानने की इच्छा करे, तो उन्हें केवल संस्कार के परिणामों में संयम का प्रयोग करना होगा। कुछ संस्कार वर्तमान अवस्था में कार्य कर रहे हैं, कुछ का भोग समाप्त हो चुका है और कुछ अभी भी फल प्रदान करने के लिए संचित हैं। इन सबों में संयम का प्रयोग करके वे भूत और भविष्य सब जान लेते हैं।
पातंजल-योगसूत्र-३ २३९
पातंजल-योगसूत्र-३ २३९
शब्दार्थप्रत्ययानामितरेतराध्यासात् संकरस्तत्प्रविभाग- संयमात् सर्वभूतरुतज्ञानम् ॥१७॥
सूत्रार्थ—शब्द, अर्थ और प्रत्यय (ज्ञान)—इनको, आपस में अध्यास हो जाने के कारण, जो संकरावस्था हो रही है, उसके विभाग में संयम करने से समस्त प्राणियों की वाणी का ज्ञान (हो जाता है)।
व्याख्या—शब्द से उस बाह्य विषय का बोध होता है, जो मन में किसी वृत्ति को जागरित कर देता है। अर्थ कहने से शरीर मे का वह प्रवाह समझना चाहिए, जो इन्द्रिय-द्वार से प्राप्त विषयो के अभिघात से उत्पन्न हुई संवेदना को ले जाकर मस्तिष्क में पहुँचा देता है। और ज्ञान कहने से मन की उस प्रतिक्रिया को समझना चाहिए, जिससे विषयानुभूति होती है। इन तीनों के मिश्रित होने से ही हमारे इन्द्रियग्राह्य विषय उत्पन्न होते हैं। मान लो, मैने एक शब्द सुना, पहले बाहर में एक कम्पन हुआ, तत्पश्चात् श्रवणेन्द्रिय द्वारा मन में एक बोध-प्रवाह गया, उसके बाद मन ने प्रतिक्रिया की, और मैं उस शब्द को जान सका। मैंने यह जो उस शब्द को जाना है, वह तीन पदार्थों का मिश्रण है—पहला, कम्पन, दूसरा, अनुभूतिप्रवाह, और तीसरा, प्रतिक्रिया। साधारणत, ये तीन व्यापार पृथक् नही किए जा सकते, पर अभ्यास के द्वारा योगी उनको पृथक् कर सकते हैं। जब मनुष्य इनको अलग करने की शक्ति प्राप्त कर लेता है, तब वह फिर जिस किसी शब्द में सयम का प्रयोग करे, वह उसी क्षण उस अर्थ को समझ सकता है, जिसको प्रकाशित करने के लिए वह शब्द उच्चारित हुआ है, फिर वह शब्द चाहे मनुष्य द्वारा किया गया हो, चाहे अन्य किसी प्राणी द्वारा।
२४० राजयोग
संस्कारसाक्षात्करणात् पूर्वजातिज्ञानम् ॥१८॥
सूत्रार्थ—सस्कारो को प्रत्यक्ष कर लेने से पूर्वजन्म का ज्ञान (हो जाता है)।
व्याख्या—हम जो कुछ अनुभव करते है, वह समस्त हमारे चित्त मे तरग के रूप में आया करता है। वह फिर चित्तरूपी सरोवर की तली मे चला जाता है और क्रमश ' सूक्ष्म से सूक्ष्मतर होता जाता है। वह बिलकुल नष्ट नही हो जाता। वह वहाँ जाकर अत्यन्त सूक्ष्मभाव से रहता है। यदि हम उस तरग को फिर से ऊपर ला सके, तो वही स्मृति कहलाती है। अतएव योगी यदि मन से इन सब पूर्वसस्कारो में सयम कर सके, तो वे पूर्वजन्म की बाते स्मरण करना आरम्भ कर देंगे।
प्रत्ययस्य परचित्तज्ञानम् ॥१९॥
सूत्रार्थ—दूसरे के शरीर में जो सब चिह्न हैं, उनमें संयम करने से उस व्यक्ति के मन का ज्ञान (हो जाता है)।
व्याख्या—प्रत्येक व्यक्ति के शरीर मे कुछ विशिष्ट चिह्न रहते हैं, जिनके द्वारा उसको दूसरे व्यक्तियो से पृथक् करके पहचाना जाता है। जब योगी किसी मनुष्य के इन विशेष चिन्हो में सयम करते हैं, तब वे उस मनुष्य के मन का स्वभाव जान लेते है।
न च तत् सालम्बनं तस्याविषयीभूतत्वात् ॥२०॥
सूत्रार्थ—किन्तु उस चित्त का अवलम्बन क्या है, यह वे नहीं जान सकते, क्योंकि वह उनके सयम का विषय नहीं है।
व्याख्या—ऊपर के सूत्र मे शरीर के चिन्हो मे सयम की जो बात कही गई है, उसके द्वारा उस व्यक्ति के मन में उस.
पातंजल-योगसूत्र-३ २४१
पातंजल-योगसूत्र-३ २४१
समय क्या चल रहा है, यह नही जाना जा सकता। उसको जानने के लिए तो दो बार संयम करने की आवश्यकता होगी, पहले, शरीर के लक्षणों में, और उसके बाद मन में। तब योगी उस व्यक्ति के मन के समस्त भाव जान लेंगे।
कायरूपसंयमात् तद्ग्राह्यशक्तिस्तम्भे
चक्षुःप्रकाशासंयोगेऽन्तर्धानम् ॥२१॥
सूत्रार्थ—शरीर के रूप में संयम कर लेने से जब उस रूप को अनुभव करने की शक्ति रोक ली जाती है, तब आंख की प्रकाश-शक्ति के साथ उसका संयोग न रहने के कारण योगी अन्तर्धान हो जाते हैं।
व्याख्या—मान लो, कोई योगी इस कमरे में खड़े हैं। वे आपातदृष्टि से सबके सामने से अन्तर्धान हो सकते हैं। वे वास्तव में अन्तर्धान हो जाते हों, सो बात नही, पर हाँ, कोई उन्हें देख न सकेगा, बस इतना ही। शरीर का रूप और शरीर—इन दोनों को मानो वे अलग-अलग कर डालते हैं। जब योगी ऐसी एकाग्रता-शक्ति प्राप्त कर लेते हैं कि वे वस्तु के रूप और उस वस्तु को एक-दूसरे से अलग कर डालते हैं, तभी इस प्रकार की अन्तर्धान-शक्ति उन्हें प्राप्त होती है। उसमें अर्थात् रूप और उस रूपवान् वस्तु के पार्थक्य में संयम का प्रयोग करने से उस रूप को अनुभव करने की शक्ति में मानो एक बाधा पड़ती है; क्योंकि रूप और उस रूपविशिष्ट वस्तु के परस्पर संयुक्त होने पर ही हमें उस वस्तु का ज्ञान होता है।
एतेन शब्दाद्यन्तर्धानमुक्तम् ॥२२॥
सूत्रार्थ—इसके द्वारा ही शब्द आदि के अन्तर्धान होने की अर्थात् शब्द आदि को दूसरों की इन्द्रियगोचर न होने देने की भी व्याख्या कर दी गई।
१६
२४२ राजयोग
सोपक्रमं निरुपक्रमं च कर्म तत्संयमादपरान्त- ज्ञानमरिष्टेभ्यो वा ॥२३॥
सूत्रार्थ—शीघ्र फल उत्पन्न करनेवाला और देर से फल देनेवाला—ऐसे दो प्रकार के कर्म होते हैं। इनमें संयम करने से, अथवा अरिष्ट-नामक मृत्युलक्षणों से भी, योगीगण देहत्याग का ठीक समय जान लेते हैं।
व्याख्या—जब योगी अपने कर्म मे—अर्थात् अपने मन के उन सस्कारो में, जिनका कार्य आरम्भ हो गया है तथा उनमें, जिनका कार्य अभी आरम्भ नही हुआ है—सयम का प्रयोग करते हैं, तब वे उन सस्कारो के द्वारा, जिनका कार्य अभी आरम्भ नही हुआ है, यह ठीक जान लेते हैं कि उनकी मृत्यु कब होगी। किस समय, किस दिन, कितने बजे, यहाँ तक कि कितने मिनट पर उनकी मृत्यु होगी—यह सब उन्हें ज्ञात हो जाता है। हिन्दू लोग मृत्यु की इस निकटता को जान लेना विशेष आवश्यक समझते हैं, क्योकि गीता मे यह उपदेश है कि मृत्यु-समय के विचार आनेवाले जीवन को नियमित करने के लिए विशेष प्रयोजनीय कारणस्वरूप है।
मैत्र्यादिषु बलानि ॥२४॥
सूत्रार्थ—मैत्री आदि गुणों (१।३३) में संयम करने से वे सब गुण अत्यन्त प्रबल भाव धारण करते हैं।
बलेषु हस्तिबलादीनि ॥२५॥
सूत्रार्थ—हाथी आदि के बल में सयम का प्रयोग करने से योगी के शरीर में उस-उस प्राणी के सदृश बल आ जाता है।
व्याख्या—जब योगी यह सयम-शक्ति प्राप्त कर लेते हैं, तब यदि वे बल की इच्छा करे, तो हाथी के बल मे सयम का प्रयोग करके वे हाथी के समान बल प्राप्त कर लेते हैं।
पातंजल-योगसूत्र-३ २४३
पातंजल-योगसूत्र-३ २४३
प्रत्येक मनुष्य में अनन्त शक्ति निहित है। यदि वह उपाय जानता हो, तो वह उस शक्ति का इच्छानुसार व्यवहार कर सकता है। योगी ने उसे प्राप्त करने की विद्या खोज निकाली है।
प्रवृत्त्यालोकन्यासात् सूक्ष्मव्यवहितविप्रकृष्टज्ञानम् ॥२६॥
सूत्रार्थ— (पहले कही गई, १।३६,) महाज्योति में संयम करने से सूक्ष्म, व्यवधान-युक्त और दूरवर्ती वस्तुओ का ज्ञान हो जाता है।
व्याख्या— हृदय मे जो महाज्योति है, उसमें संयम करने से योगी अत्यन्त दूरवर्ती वस्तु को भी देख सकते हैं। यदि कोई वस्तु पहाड़ के अन्तराल में रहे, तो उसे भी वे देख लेते हैं, और अत्यन्त सूक्ष्म वस्तुओ का. भी उन्हे ज्ञान हो जाता है।
भुवनज्ञानं सूर्ये सयमात्॥२७'।
सूत्रार्थ— सूर्य में संयम करने से सम्पूर्ण जगत् का ज्ञान (प्राप्त हो जाता है)।
चन्द्रे ताराव्यूहज्ञानम् ॥२८॥
सूत्रार्थ— चन्द्रमा में (सयम करने से) तारासमूह का ज्ञान (हो जाता है)।
ध्रुवे तद्गतिज्ञानम् ॥२९॥
सूत्रार्थ— ध्रुव तारे में (सयम करने से) ताराओं की गति का ज्ञान (हो जाता है)।
नाभिचक्रे कायव्यूहज्ञानम् ॥३०॥
सूत्रार्थ— नाभिचक्र में (सयम करने से) शरीर की बनावट ज्ञात हो जाती है।
कण्ठकूपे क्षुत्पिपासानिवृत्तिः ॥३१॥
सूत्रार्थ— कण्ठकूप में (सयम करने से) भूख और प्यास की निवृत्ति हो जाती हैं।