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राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

पृष्ठ 111, कुल 534 में से

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६८ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास लगा। कुंवर पृथ्वीराज को सूरजमल और सारंगदेव का मेवाड़ में रहना खटकता सूरजमल का मेवाड़ छोड़ना था। एक दिन जब सूरजमल, सारंगदेव के पास बाठरड़े गया हुआ था, कुंवर पृथ्वीराज अपने एक हज़ार सवारों-सहित रात्रि के समय, जब वे लोग आग जलाकर निश्चिन्तता- पूर्वक ताप रहे थे, वहां पहुंचा और गांव का फलसा (फाटक) तोड़कर भीतर घुस गया। उधर के राजपूतों ने भी तलवारें संभालीं और युद्ध होने लगा; किंतु पृथ्वीराज को देखते ही सूरजमल ने कहा-"कुंवर हम तुम्हें मारना नहीं चाहते, क्योंकि तुम्हारे मारे जाने से राज्य डूबता है, मुझपर तुम शस्त्र चलाओ।" इतना सुनते ही पृथ्वीराज लड़ाई बंदकर घोड़े से उतरा और उसने पूछा-"काकाजी, आप क्या कर रहे थे ?" सूरजमल ने उत्तर दिया-"हम तो यहां निश्चिन्त होकर ताप रहे थे।" पृथ्वीराज ने कहा-"मेरे जैसे शत्रु के होते हुए भी क्या आप निश्चिन्त रहते हैं ?" उसने उत्तर दिया-"हां ।" उपर्युक्त 'हरिभूषण महाकाव्य' की हस्तलिखित प्रति मेरे संग्रह में थी, जिसकी प्रतिलिपि मैंने प्रतापगढ़ के भूतपूर्व महारावत रघुनाथसिंह के पास भिजवाई । इसपर उक्त महारावत ने उसका सम्पादन-भार प्रतापगढ़ के आमेटा जातीय पंडित जगन्नाथ शास्त्री, संस्कृताध्यापक रघुनाथ संस्कृत पाठशाला और पिन्हे हाई स्कूल, प्रतापगढ़, को सौंपा जिसने भाषानुवाद-सहित उसका संपादन किया, जो वर्तमान महारावत सर रामसिंहजी की आज्ञानुसार रघुनाथ यंत्रालय (प्रतापगढ़) में मुद्रित होकर प्रकाशित हुआ है । (१) कर्नल टॉड ने भी लिखा है कि सूरजमल एक बार अपने साथियों-सहित 'बाठरड़े के जंगल में ठहरा हुआ था और अपनी रक्षा के लिए चारों तरफ़ लकड़ी की मज़- बूत वाड़ (घेरा) बनाकर रात्रि के समय वह अपने साथी राजपूतों-सहित आग जलाकर ताप रहा था कि घोड़ों के टापों की आवाज़ सुनाई पड़ी। उसके साथी राजपूत चौंक उठे। सूरजमल ने कहा कि और कोई नहीं, यह मेरा भतीजा है। इतने में पृथ्वीराज अपने सवारों-सहित फलसा (फाटक) तोड़कर भीतर घुस गया। तब सूरजमल के साथी भी तलवारें निकाल उनसे भिड़ गये । पृथ्वीराज ने सूरजमल पर प्रहार किया, जिसकी चोट लगते ही वह गिरनेवाला था, परंतु सारंगदेव की सहायता से बच गया । सारंगदेव ने

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