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राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

पृष्ठ 123, कुल 534 में से

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पृष्ठ 123

८० प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास कर महाराणा विक्रमादित्य एवं उसके छोटे भाई उदयसिंह को, जब तक युद्ध समाप्त न हो तब तक के लिए, उनके ननिहाल बूंदी भेजने और महाराणा के स्थान में रावत बाघसिंह को महाराणा का प्रतिनिधि बना उसकी आज्ञानुसार दुर्ग के द्वार खोलकर शत्रु सैन्य से लड़ने का निश्चय किया । फिर उन्होंने सुलतान से लड़ने के लिए क़िले के चारों तरफ़ उचित स्थानों पर मोर्चे लगाकर वहां बड़े-बड़े सरदारों को नियत कर दिया¹ । मुंहणोत नैणसी का कथन है कि इस अवसर पर रावत बाघसिंह ने अपने पिता सूरजमल-द्वारा सादड़ी पर अधिकार रहते समय चारणों आदि को दिये हुए १७ गांवों के², उनके वंशधरों के अधिकार में बराबर बने रहने की राजमाता से प्रतिज्ञा कराली थी । जब सरदारों ने बाघसिंह को महाराणा का प्रतिनिधि नियत किया तो उसने उनसे कहा कि आप लोगों ने मुझको महाराणा का प्रतिनिधि बनाया है तो मेरा कर्त्तव्य है कि मैं आगे बढ़कर क़िले के मुख्य द्वार पर लड़ूं । निदान वह रावत नरबदै-सहित दुर्ग के प्रथम द्वार पाडलपोल पर जा डटा । इसी प्रकार अन्य सरदार भी अपने-अपने मोर्चों पर जा जमे । वीका- खोह पर हाड़ा अर्जुन, भैरवपोल पर सोलंकी भैरवदास, हनुमानपोल पर झाला सज्जा तथा सिंहा और गणेशपोल पर डोडिया भाण सुलतान से लड़ने के लिए प्रस्तुत थे⁴ । इधर तो राजमाता ने चित्तौड़ की रक्षा का यह उपाय किया और उधर राखी भेज उसने बादशाह हुमायूं से फिर सहायता की याचना की । ( १ ) वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० २६-३० । मेरा उदयपुर राज्य का इतिहास; जि० १, पृ० ३६७-६ । ( २ ) देखो ऊपर पृ० ७० टि० ३ । ( ३ ) यह रावत अज्जा के पुत्र सारंगदेव का पौत्र और जोगा का बेटा था । इसके वंशधरों में मेवाड़ में कानोड़ के सरदार प्रथम वर्ग के उमराव हैं और सारंगदेवोत कहलाते हैं। ( ४ ) वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० ३० । मेरा उदयपुर राज्य का इतिहास; जि० १, पृ० ३६६ ।