राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
पृष्ठ 122, कुल 534 में से
संदर्भ में पढ़ेंमहारावत बाघसिंह ७६ पर कुछ भी प्रभाव न पड़ा । तब शेष बचे हुए सरदारों में से भी कई चित्तौड़ की रक्षार्थ बहादुर- सुलतान से जा मिले, तथा वे उसको वहां का शाह से लड़कर बाघसिंह भेद बताते रहे। पहली चढ़ाई में सुलतान को क़िले का मारा जाना. पर अधिकार करना कुछ कठिन जान पड़ता था, किन्तु महाराणा के सरदारों के जा मिलने से उसको चित्तौड़ पर अधिकार करना सरल जान पड़ा । निदान वि० सं० १५६१ (ई० स० १५३४) में उसने पुनः चित्तौड़ पर अधिकार करने के लिए चढ़ाई की¹ । राजमाता हाड़ी कर्मवती को यह जानकर बड़ी चिंता हुई । उसने सरदारों को इस आशय के पत्र भिजवाये-“अब तक तो चित्तौड़ राजपूतों के हाथ में रहा, पर अब उनके हाथ से निकलने का समय आ गया है । मैं क़िला तुम्हें सौंपती हूं, चाहे तुम रखो, चाहे शत्रु को दे दो । मान लो, तुम्हारा स्वामी अयोग्य ही है, तो भी जो राज्य वंश-परंपरा से तुम्हारा है, उसके शत्रु के हाथ में चले जाने से तुम्हारी बड़ी अपकीर्ति होगी ।” राजमाता का यह पत्र पाते ही सरदारों में, जो महाराणा के व्यवहार से असंतुष्ट हो रहे थे, देश-प्रेम की लहर उमड़ पड़ी और इन उत्तेजनात्मक वाक्यों से वे चित्तौड़ की रक्षार्थ जान देने का संकल्प कर अपनी-अपनी सेनाओं के साथ राजधानी में जाने लगे । उपर्युक्त आशय का एक पत्र राजमाता ने देवलिया के स्वामी बाघसिंह के पास भी भेजा, जिसको पाते ही उसने विक्रमादित्य-द्वारा होनेवाले अनुचित कार्यों का विस्मरण कर चित्तौड़ की रक्षा के लिए अपने प्राणों को उत्सर्ग करने का दृढ़ संकल्प कर लिया एवं सुलतान की दी हुई जागीर का परित्याग कर वह तत्काल अपने राजपूतों-सहित चित्तौड़ जा पहुंचा । शीघ्र ही चित्तौड़गढ़ वीर क्षत्रियों से भर गया, परंतु दुर्ग में खाने-पीने का सामान दो महीनों से अधिक चलने लायक़ न था तथा सुलतान की सेना में रसद, तोप, बारूद, गोले आदि प्रचुरता से थे । इसलिए सब सरदारों ने उभय पक्ष के बलाबल पर विचार ( १ ) वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० २८ । मेरा उदयपुर राज्य का इतिहास ; जि० १, पृ० ३६७ ।