राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७८ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास घेर लिया और दुर्ग की सुदृढ़ दीवारों को तोपों से उड़ा देने का प्रयत्न किया । दुर्गस्थ सैनिक भी अपनी रक्षा के लिए थोड़ा-बहुत मुक़ाबला कर रहे थे, पर गुजरात की प्रबल सेना के आगे उनका कुछ बस न चला और गुजराती सेना चित्तौड़ के नीचे के दो दरवाज़ों तक पहुंच गई१ । राजमाता हाड़ी कर्मवती (महाराणा संग्रामसिंह की राणी) ने उस समय दिल्ली के बादशाह हुमायूं से सहायता चाही, परंतु वहां से सहायता न मिली और जब दुर्ग बचने की आशा न दीख पड़ी तब राजमाता ने सुलतान बहादुरशाह के पास संधि की बात-चीत के लिए अपने वकीलों को भेजकर कहलाया कि महमूद खिलजी से लिये हुए मालवे के ज़िले लौटा दिये जावेंगे और महमूद का महाराणा संग्रामसिंह को दिया हुआ जड़ाऊ मुकुट तथा सोने की कमरपेटी भी दे दी जायगी । इनके अतिरिक्त दस हाथी, सौ घोड़े और नक़द रुपये भी दिये जायेंगे । राजमाता की इन शर्तों को मानकर वि० सं० १५८९ चैत्र वदि १४ (ई० स० १५३३ ता० २४ मार्च) को सुलतान वहां से लौट गया । बहादुरशाह की चित्तौड़ पर की इस चढ़ाई का महाराणा विक्रमादित्य ( १ ) बेले; हिस्ट्री ऑव् गुजरात; पृ० ३६६-७० । आत्माराम मोतीराम दीवा- नजी; मिरात-इ-सिकंदरी ( गुजराती अनुवाद ); पृ० २६६ । वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० २७ । मेरा उदयपुर राज्य का इतिहास; जि० १, पृ० ३६२-६ । कर्नल टॉड ने बहादुरशाह की चित्तौड़ पर एक ही बार चढ़ाई होने का उल्लेख कर वि० सं० १५८९ ( ई० स० १५३३ ) में बाघसिंह का युद्ध में काम आना और वहां पर सुलतान का अधिकार हो जाना लिखा है; किंतु इसके विरुद्ध 'मिरात-इ-सिकंदरी' आदि से वि० सं० १५९१ ( ई० स० १५३४-५ ) में बहादुरशाह का दूसरी बार चढ़ाई करना स्पष्ट है और 'तारीख़ फिरिश्ता' (ब्रिग़्ज़; जि० ४, पृ० १२६) से भी बहादुर- शाह का चित्तौड़ पर दूसरी बार चढ़कर जाना पाया जाता है। इसलिए टॉड ने बाघसिंह का वि० सं० १५८९ ( ई० स० १५३३ ) में बहादुरशाह की चढ़ाई के समय चित्तौड़ में काम आना लिखा, वह स्वीकार करने योग्य नहीं है, क्योंकि उदयपुर और प्रतापगढ़ राज्य से मिलनेवाली प्रायः सब ख्यातों में बाघसिंह का वि० सं० १५९१ ( ई० स० १५३४-५ ) में बहादुरशाह के आक्रमण के समय मारा जाना लिखा है ।