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राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

पृष्ठ 120, कुल 534 में से

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महारावत बाघसिंह ७७ परास्त कर उक्त राज्य को अपनी सलतनत में मिला लिया, जिससे गुजरात का मुसलमानी राज्य अधिक शक्तिशाली हो गया। महाराणा रत्नसिंह का देहांत होने पर उसके उत्तराधिकारी विक्रमादित्य ने, सुलतान बहादुरशाह की रायसेन पर वि० सं० १५८६ (ई० स० १५३२) में चढ़ाई होने पर उस- (बहादुरशाह)के विरुद्ध रायसेन (मालवा) के स्वामी सलहदी का पक्ष लिया। महाराणा को सलहदी के पुत्र भूपतराय-सहित आते देख, बहादुरशाह ने भी मेवाड़ पर चढ़ाई करने के लिए शीघ्र अपनी सेना रवाना की और स्वयं भी अपनी सेना में जा मिला। यह देख महाराणा बिना लड़े ही चित्तोड़ लौट गया। तब सुलतान भी पहले रायसेन को परास्त करने का विचार- कर पीछा मालवे को चला गया १। अपने पड़ोस में एक प्रबल हिंदू-राज्य का होना सुलतान को खटकता था। विक्रमादित्य के भूतपराय की सहायतार्थ जाने से सुलतान बहादुरशाह और भी चिढ़ गया। रायसेन पर विजय प्राप्त करने के पश्चात् उसी वर्ष (वि० सं० १५८६ = ई० स० १५३२ में) बड़ी तैयारी कर उसने चित्तौड़ पर आक्रमण करने के लिए अपनी सेना रवाना की। मुसलमानी सेना के मन्दसोर पहुंचने पर महाराणा के वकील संधि का संदेश लेकर पहुंचे। महाराणा के कुछ सरदार सुलतान से जा मिले थे, जिससे उसको महाराणा की कमज़ोरियों का भेद मिलता रहा, अतएव संधि की बात स्वीकार न हुई। तब महाराणा भी अपनी सेना के साथ शत्रुओं के मुक़ा- बले के लिए नीमच तक आगे बढ़ गया२, पर पहले ही आक्रमण में उस- (महाराणा) को अपनी सेना-सहित पीछे हट जाना पड़ा। गुजराती सेना आगे बढ़ने लगी और स्वयं सुलतान भी मांडू से चलकर अपनी सेना में सम्मिलित हो गया। फिर उसने चारों तरफ़ से चित्तोड़ के क़िले को (१) बेले; हिस्ट्री ऑव् गुजरात; पृ० ३६१-६२। आत्माराम मोतीराम दीवा- नजी; मिरात-इ-सिकंदरी ( गुजराती अनुवाद ); पृ० २६२ । मेरा उदयपुर राज्य का इतिहास; जि० १, पृ० ३६५ । (२) वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० २७ ।