राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७६ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास गया तथा सूरजमल की भी वहीं मृत्यु हुई। इसपर उसका छोटा भाई विक्रमादित्य मेवाड़ का स्वामी हुआ। वह (विक्रमादित्य) अपने राजपूत सरदारों का अपमान कर पहलवानों की नवीन सेना अपने पास रखता था, जिससे प्रायः सब बड़े-बड़े सरदार उससे असंतुष्ट थे और जब वह अकारण ही सरदारों की प्रतिष्ठा पर आघात करने लगा, तो अधिकांश बड़े-बड़े सरदार अपने-अपने ठिकानों में जा बैठे। यही नहीं, महाराणा संग्रामसिंह का भतीजा नरसिंहदेव और राजा मेदिनीराय (चंदेरीवाला) आदि वि० सं० १५८६ (ई० स० १५३२) में सुलतान के पास चले गये¹ और उसको उसका भेद बताने लगे। प्रतापगढ़ राज्य की ख्यातों से पाया जाता है कि रावत बाघसिंह भी महाराणा विक्रमादित्य के अनुचित व्यवहार से अप्रसन्न होकर मांडू के सुलतान के पास चला गया था², जहां उसको जागीर प्राप्त हुई। वहां रहते समय उस (बाघसिंह) ने अपनी जागीर में 'बाघवाड़ा' गांव बसाया; जिसका इस समय धार राज्य के अन्तर्गत होना बतलाया जाता है। महाराणा कुंभकर्ण और संग्रामसिंह के समय गुजरात और मालवे की सेना कई बार पराजित हुई थी, जिसको वहां के सुलतान भूले न थे, परन्तु उक्त महाराणाओं के प्रबल प्रताप के आगे वे बहादुरशाह की चित्तौड़ पर मेवाड़ राज्य की शक्ति को क्षीण न कर सके थे। चढ़ाइयां वि० सं० १५८४ (ई० स० १५२७) के पीछे मालवे (मांडू) का मुसलमानी राज्य निर्बल हो गया और गुजरात के सुलतान बहादुरशाह ने, जो अपनी शाहज़ादगी के समय क्रमशः डूंगरपुर और चित्तौड़ के राजाओं के आश्रय में रहा था, वहां के सुलतान महमूद को (१) वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० २७ । (२) ख्यातों के इस कथन की पुष्टि मुंशी देवीप्रसाद-रचित 'महाराणा रतन- सिंह और विक्रमादित्य के जीवनचरित्र' (पृ० ७०-१) से होती है। उसमें बाघसिंह के मांडू के सुलतान के पास जाने का उल्लेख है, जिसका अभिप्राय बहादुरशाह से हो, क्योंकि उन दिनों मांडू (मालवा) पर उसका अधिकार हो गया था।