राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमहारावत बाघसिंह ७५ मुग़लों को दिल्ली से निकाल वहां अपना अधिकार जमाने का यह अच्छा अवसर जानकर, उसने एक विशाल सेना के साथ बाबर पर चढ़ाई की। महाराणा को अपनी विजय का दृढ़ निश्चय था, परन्तु खानवे के वि० सं० १५८४ चैत्र सुदि १४ (ई० स० १५२७ ता० १७ मार्च) के युद्ध में उसके सिर में शत्रु का एक तीर लगा, जिससे वह मूर्च्छित हो गया। तत्काल कुछ सरदार उसको युद्ध से हटाकर अन्यत्र ले गये और उसके स्थान में झाला अज्जा को उसका प्रतिनिधि बनाकर लड़ने लगे। मुग़लों के साथ तोपखाना था। राजपूत तोपों और बन्दूकों से अपरिचित थे, अतएव उनकी मार से. राजपूतों की बड़ी क्षति हुई और बाबर विजयी हुआ। झाला अज्जा, रावत रत्नसिंह आदि महाराणा के कई बड़े-बड़े सरदार और कई सहायक राजाओं में से डूंगरपुर का स्वामी महारावल उदयसिंह वीरगति को प्राप्त हुआ¹। 'वीरविनोद' में लिखा है कि इस युद्ध में रावत बाघसिंह ने बड़ी वीरता दिखलाई थी²। प्रतापगढ़ राज्य की ख्यातों में रावत सूरजमल की मृत्यु वि० सं० १५८७ (ई० स० १५३०) में होने का उल्लेख है। ऐसी दशा में खानवे के युद्ध के समय बाघसिंह रावत नहीं हो सकता। यदि ख्यातों में उल्लिखित सूरजमल का देहांत वि० सं० १५८७ (ई० स० १५३०) में होना ठीक हो तो यही मानना पड़ेगा कि खानवे के युद्ध में बाघसिंह ने पिता की विद्यमानता में भाग लिया होगा। खानवे के युद्ध में हारने के पीछे महाराणा संग्रामसिंह (सांगा) केवल कुछ मास तक जीवित रहा और वि० सं० १५८४ के माघ (ई० स० १५२८ जन- बाघसिंह का मालवे में जाना | वरी) मास में परलोक सिधारा। तब उसका कुंवर रत्नसिंह राजगद्दी पर बैठा, किन्तु उस (रत्नसिंह)- ने चार वर्ष ही राज्य किया और वि० सं० १५८८ (ई० स० १५३१) में वह पारस्परिक द्वेष के कारण बूंदी के हाड़ा राव सूरजमल से लड़कर मारा (१) मेरा उदयपुर राज्य का इतिहास; जि० १, पृ० ३७६ । (२) वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० २६, टिप्पण १ ।