भारतकोश
राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

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७४ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास तालाब उस( सूरजमल )का ही बनवाया हुआ माना जाता है। वाघसिंह सूरजमल का ज्येष्ठ पुत्र रणधीर पिता की विद्यमानता में ही युद्ध में वीरगति को प्राप्त हो चुका था¹, इसलिए उस( सूरजमल )का देहांत होने पर उसका दूसरा पुत्र वाघसिंह वि० सं० १५८७ राज्य-प्राप्ति (ई० स० १५३०) के लगभग उसका उत्तराधिकारी हुआ। मेवाड़ का स्वामी महाराणा संग्रामसिंह ( सांगा ) बड़ा वीर था। उसने मेवाड़-राज्य के गौरव में बहुत वृद्धि की। भारतवर्ष के हिंदू-राज्यों में मेवाड़ ही उस समय एक प्रधान राज्य था, वाघसिंह का खानवे के युद्ध में जिसकी धाक दिल्ली, गुजरात और मालवे के महाराणा के साथ रहना मुसलमानी राज्यों पर थी। उन दिनों दिल्ली पर लोदी सुलतानों का अधिकार था। उनकी कमज़ोरी का लाभ उठाकर भारत पर मुग़ल-राज्य स्थापित करने की दृष्टि से चग़ताई खान्दान के बाबर- शाह ने तुर्किस्तान की तरफ़ से बढ़कर कंधार के मार्ग से हिंदुस्तान में आकर वि० सं० १५८३ (ई० स० १५२६) में दिल्ली के सुलतान इब्राहीम लोदी पर आक्रमण किया । पानीपत के मैदान में बड़ी लड़ाई हुई, जिसमें इब्राहीम मारा गया एवं दिल्ली पर मुग़लों (बाबर) का अधिकार हो गया । इब्राहीम का एक शाहज़ादा और उसका सेनापति हसनखां महाराणा से सहायता लेने के लिए चित्तौड़ पहुंचे। महाराणा भी भारत में पुनः हिन्दू- साम्राज्य स्थापित करना चाहता था और अवसर की बाट देख रहा था। द्विजपूजापरो धीमान्धर्मज्ञो लोकवत्सलः । कामानपूरयत्तस्य नित्यं कामदुघेव भूः ॥ ३ ॥ हरिभूषण महाकाव्य; सर्ग २। ( १ ) देखो ऊपर पृ० ७१, टि० २।