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राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

पृष्ठ 116, कुल 534 में से

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जग्गा का सांखली अंतरदे के उदर से उत्पन्न होना बतलाया है१। ऐसी स्थिति में बड़वे भाटों की ख्यातें इतिहास के लिए कहां तक उपयोगी हैं इसका निर्णय स्वयं इतिहास के पाठक कर सकते हैं। : महारावत सूरजमल वीर प्रकृति का पुरुष था। क्षत्रियोचित स्वभाव के अनुसार वह युद्ध के अवसर पर सदा आगे बढ़कर वीरता प्रदर्शित करता था। शत्रु सिर पर मंडराते रहने पर भी वह : सूरजमल का व्यक्तित्व : कभी नहीं घबराता था, वरन् उसका सम्मान कर उसको प्रसन्न कर देता, जिससे शत्रु भी उसका मित्र बन जाता था। कपट और विश्वासघात करना तो उसने सीखा ही न था। शत्रु को अकेला पाकर मारना वह सदैव नीच कार्य समझता था। इसका उसने अपने जीवन में पूर्णतः पालन किया। महाराणा रायमल के कुंवर पृथ्वीराज-द्वारा सदा अपना अनिष्ट होने पर भी उसने कपट-भाव से उसको मारने की चेष्टा न की। उसने अपनी पैतृक भूमि त्याग दी, जिसकी प्राप्ति में अनेक बार रक्त की धारें वही थीं। अपनी राणी के पृथ्वीराज को विष देकर मारने के प्रयत्न से उसको इतना दुःख हुआ कि वह जीवन भर पीछा मेवाड़ में नहीं गया। राजपूत जाति के इतिहास में राज्य-प्राप्ति के लिए छल-कपट आदि अधर्म-युक्त कार्यों के भी उदाहरण मिलते हैं, परन्तु सूरजमल इन बुराइयों से सर्वथा मुक्त था। वह युद्ध की अपेक्षा शांति को अधिक पसंद करता, किंतु जब आ पड़ती तब अपने प्राणों की भी बाज़ी लगा देता था। वह उदार राजा था। मेवाड़ में भीमल, धारता आदि गांव उसने चारणों और ब्राह्मणों को दे दिये, जो उसकी दानशीलता का परिचय देते हैं। 'हरिभूषण महाकाव्य से पाया जाता है कि वह चतुर और नीति निपुण था२। बड़ी सादड़ी में सूरसागर (१) प्रतापगढ़ राज्य के बड़वे की ख्यात; पृ० १। (२) बभूवाथ महावीरः सूर्यमल्लस्तदात्मजः। कर्णेपिमेयो दानेन मानेनापि सुयोधनः ॥ १ ॥ वर्णाश्चत्वार एवैते नाप्नुवन्नन्यवाच्यताम् । वर्णा इव महीपाले तस्मिन् शासति मेदिनीम् ॥ २ ॥ १०