राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
७४ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास तालाब उस( सूरजमल )का ही बनवाया हुआ माना जाता है। वाघसिंह सूरजमल का ज्येष्ठ पुत्र रणधीर पिता की विद्यमानता में ही युद्ध में वीरगति को प्राप्त हो चुका था¹, इसलिए उस( सूरजमल )का देहांत होने पर उसका दूसरा पुत्र वाघसिंह वि० सं० १५८७ राज्य-प्राप्ति (ई० स० १५३०) के लगभग उसका उत्तराधिकारी हुआ। मेवाड़ का स्वामी महाराणा संग्रामसिंह ( सांगा ) बड़ा वीर था। उसने मेवाड़-राज्य के गौरव में बहुत वृद्धि की। भारतवर्ष के हिंदू-राज्यों में मेवाड़ ही उस समय एक प्रधान राज्य था, वाघसिंह का खानवे के युद्ध में जिसकी धाक दिल्ली, गुजरात और मालवे के महाराणा के साथ रहना मुसलमानी राज्यों पर थी। उन दिनों दिल्ली पर लोदी सुलतानों का अधिकार था। उनकी कमज़ोरी का लाभ उठाकर भारत पर मुग़ल-राज्य स्थापित करने की दृष्टि से चग़ताई खान्दान के बाबर- शाह ने तुर्किस्तान की तरफ़ से बढ़कर कंधार के मार्ग से हिंदुस्तान में आकर वि० सं० १५८३ (ई० स० १५२६) में दिल्ली के सुलतान इब्राहीम लोदी पर आक्रमण किया । पानीपत के मैदान में बड़ी लड़ाई हुई, जिसमें इब्राहीम मारा गया एवं दिल्ली पर मुग़लों (बाबर) का अधिकार हो गया । इब्राहीम का एक शाहज़ादा और उसका सेनापति हसनखां महाराणा से सहायता लेने के लिए चित्तौड़ पहुंचे। महाराणा भी भारत में पुनः हिन्दू- साम्राज्य स्थापित करना चाहता था और अवसर की बाट देख रहा था। द्विजपूजापरो धीमान्धर्मज्ञो लोकवत्सलः । कामानपूरयत्तस्य नित्यं कामदुघेव भूः ॥ ३ ॥ हरिभूषण महाकाव्य; सर्ग २। ( १ ) देखो ऊपर पृ० ७१, टि० २।
महारावत बाघसिंह ७५ मुग़लों को दिल्ली से निकाल वहां अपना अधिकार जमाने का यह अच्छा अवसर जानकर, उसने एक विशाल सेना के साथ बाबर पर चढ़ाई की। महाराणा को अपनी विजय का दृढ़ निश्चय था, परन्तु खानवे के वि० सं० १५८४ चैत्र सुदि १४ (ई० स० १५२७ ता० १७ मार्च) के युद्ध में उसके सिर में शत्रु का एक तीर लगा, जिससे वह मूर्च्छित हो गया। तत्काल कुछ सरदार उसको युद्ध से हटाकर अन्यत्र ले गये और उसके स्थान में झाला अज्जा को उसका प्रतिनिधि बनाकर लड़ने लगे। मुग़लों के साथ तोपखाना था। राजपूत तोपों और बन्दूकों से अपरिचित थे, अतएव उनकी मार से. राजपूतों की बड़ी क्षति हुई और बाबर विजयी हुआ। झाला अज्जा, रावत रत्नसिंह आदि महाराणा के कई बड़े-बड़े सरदार और कई सहायक राजाओं में से डूंगरपुर का स्वामी महारावल उदयसिंह वीरगति को प्राप्त हुआ¹। 'वीरविनोद' में लिखा है कि इस युद्ध में रावत बाघसिंह ने बड़ी वीरता दिखलाई थी²। प्रतापगढ़ राज्य की ख्यातों में रावत सूरजमल की मृत्यु वि० सं० १५८७ (ई० स० १५३०) में होने का उल्लेख है। ऐसी दशा में खानवे के युद्ध के समय बाघसिंह रावत नहीं हो सकता। यदि ख्यातों में उल्लिखित सूरजमल का देहांत वि० सं० १५८७ (ई० स० १५३०) में होना ठीक हो तो यही मानना पड़ेगा कि खानवे के युद्ध में बाघसिंह ने पिता की विद्यमानता में भाग लिया होगा। खानवे के युद्ध में हारने के पीछे महाराणा संग्रामसिंह (सांगा) केवल कुछ मास तक जीवित रहा और वि० सं० १५८४ के माघ (ई० स० १५२८ जन- बाघसिंह का मालवे में जाना | वरी) मास में परलोक सिधारा। तब उसका कुंवर रत्नसिंह राजगद्दी पर बैठा, किन्तु उस (रत्नसिंह)- ने चार वर्ष ही राज्य किया और वि० सं० १५८८ (ई० स० १५३१) में वह पारस्परिक द्वेष के कारण बूंदी के हाड़ा राव सूरजमल से लड़कर मारा (१) मेरा उदयपुर राज्य का इतिहास; जि० १, पृ० ३७६ । (२) वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० २६, टिप्पण १ ।
७६ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास गया तथा सूरजमल की भी वहीं मृत्यु हुई। इसपर उसका छोटा भाई विक्रमादित्य मेवाड़ का स्वामी हुआ। वह (विक्रमादित्य) अपने राजपूत सरदारों का अपमान कर पहलवानों की नवीन सेना अपने पास रखता था, जिससे प्रायः सब बड़े-बड़े सरदार उससे असंतुष्ट थे और जब वह अकारण ही सरदारों की प्रतिष्ठा पर आघात करने लगा, तो अधिकांश बड़े-बड़े सरदार अपने-अपने ठिकानों में जा बैठे। यही नहीं, महाराणा संग्रामसिंह का भतीजा नरसिंहदेव और राजा मेदिनीराय (चंदेरीवाला) आदि वि० सं० १५८६ (ई० स० १५३२) में सुलतान के पास चले गये¹ और उसको उसका भेद बताने लगे। प्रतापगढ़ राज्य की ख्यातों से पाया जाता है कि रावत बाघसिंह भी महाराणा विक्रमादित्य के अनुचित व्यवहार से अप्रसन्न होकर मांडू के सुलतान के पास चला गया था², जहां उसको जागीर प्राप्त हुई। वहां रहते समय उस (बाघसिंह) ने अपनी जागीर में 'बाघवाड़ा' गांव बसाया; जिसका इस समय धार राज्य के अन्तर्गत होना बतलाया जाता है। महाराणा कुंभकर्ण और संग्रामसिंह के समय गुजरात और मालवे की सेना कई बार पराजित हुई थी, जिसको वहां के सुलतान भूले न थे, परन्तु उक्त महाराणाओं के प्रबल प्रताप के आगे वे बहादुरशाह की चित्तौड़ पर मेवाड़ राज्य की शक्ति को क्षीण न कर सके थे। चढ़ाइयां वि० सं० १५८४ (ई० स० १५२७) के पीछे मालवे (मांडू) का मुसलमानी राज्य निर्बल हो गया और गुजरात के सुलतान बहादुरशाह ने, जो अपनी शाहज़ादगी के समय क्रमशः डूंगरपुर और चित्तौड़ के राजाओं के आश्रय में रहा था, वहां के सुलतान महमूद को (१) वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० २७ । (२) ख्यातों के इस कथन की पुष्टि मुंशी देवीप्रसाद-रचित 'महाराणा रतन- सिंह और विक्रमादित्य के जीवनचरित्र' (पृ० ७०-१) से होती है। उसमें बाघसिंह के मांडू के सुलतान के पास जाने का उल्लेख है, जिसका अभिप्राय बहादुरशाह से हो, क्योंकि उन दिनों मांडू (मालवा) पर उसका अधिकार हो गया था।
महारावत बाघसिंह ७७ परास्त कर उक्त राज्य को अपनी सलतनत में मिला लिया, जिससे गुजरात का मुसलमानी राज्य अधिक शक्तिशाली हो गया। महाराणा रत्नसिंह का देहांत होने पर उसके उत्तराधिकारी विक्रमादित्य ने, सुलतान बहादुरशाह की रायसेन पर वि० सं० १५८६ (ई० स० १५३२) में चढ़ाई होने पर उस- (बहादुरशाह)के विरुद्ध रायसेन (मालवा) के स्वामी सलहदी का पक्ष लिया। महाराणा को सलहदी के पुत्र भूपतराय-सहित आते देख, बहादुरशाह ने भी मेवाड़ पर चढ़ाई करने के लिए शीघ्र अपनी सेना रवाना की और स्वयं भी अपनी सेना में जा मिला। यह देख महाराणा बिना लड़े ही चित्तोड़ लौट गया। तब सुलतान भी पहले रायसेन को परास्त करने का विचार- कर पीछा मालवे को चला गया १। अपने पड़ोस में एक प्रबल हिंदू-राज्य का होना सुलतान को खटकता था। विक्रमादित्य के भूतपराय की सहायतार्थ जाने से सुलतान बहादुरशाह और भी चिढ़ गया। रायसेन पर विजय प्राप्त करने के पश्चात् उसी वर्ष (वि० सं० १५८६ = ई० स० १५३२ में) बड़ी तैयारी कर उसने चित्तौड़ पर आक्रमण करने के लिए अपनी सेना रवाना की। मुसलमानी सेना के मन्दसोर पहुंचने पर महाराणा के वकील संधि का संदेश लेकर पहुंचे। महाराणा के कुछ सरदार सुलतान से जा मिले थे, जिससे उसको महाराणा की कमज़ोरियों का भेद मिलता रहा, अतएव संधि की बात स्वीकार न हुई। तब महाराणा भी अपनी सेना के साथ शत्रुओं के मुक़ा- बले के लिए नीमच तक आगे बढ़ गया२, पर पहले ही आक्रमण में उस- (महाराणा) को अपनी सेना-सहित पीछे हट जाना पड़ा। गुजराती सेना आगे बढ़ने लगी और स्वयं सुलतान भी मांडू से चलकर अपनी सेना में सम्मिलित हो गया। फिर उसने चारों तरफ़ से चित्तोड़ के क़िले को (१) बेले; हिस्ट्री ऑव् गुजरात; पृ० ३६१-६२। आत्माराम मोतीराम दीवा- नजी; मिरात-इ-सिकंदरी ( गुजराती अनुवाद ); पृ० २६२ । मेरा उदयपुर राज्य का इतिहास; जि० १, पृ० ३६५ । (२) वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० २७ ।
७८ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास घेर लिया और दुर्ग की सुदृढ़ दीवारों को तोपों से उड़ा देने का प्रयत्न किया । दुर्गस्थ सैनिक भी अपनी रक्षा के लिए थोड़ा-बहुत मुक़ाबला कर रहे थे, पर गुजरात की प्रबल सेना के आगे उनका कुछ बस न चला और गुजराती सेना चित्तौड़ के नीचे के दो दरवाज़ों तक पहुंच गई१ । राजमाता हाड़ी कर्मवती (महाराणा संग्रामसिंह की राणी) ने उस समय दिल्ली के बादशाह हुमायूं से सहायता चाही, परंतु वहां से सहायता न मिली और जब दुर्ग बचने की आशा न दीख पड़ी तब राजमाता ने सुलतान बहादुरशाह के पास संधि की बात-चीत के लिए अपने वकीलों को भेजकर कहलाया कि महमूद खिलजी से लिये हुए मालवे के ज़िले लौटा दिये जावेंगे और महमूद का महाराणा संग्रामसिंह को दिया हुआ जड़ाऊ मुकुट तथा सोने की कमरपेटी भी दे दी जायगी । इनके अतिरिक्त दस हाथी, सौ घोड़े और नक़द रुपये भी दिये जायेंगे । राजमाता की इन शर्तों को मानकर वि० सं० १५८९ चैत्र वदि १४ (ई० स० १५३३ ता० २४ मार्च) को सुलतान वहां से लौट गया । बहादुरशाह की चित्तौड़ पर की इस चढ़ाई का महाराणा विक्रमादित्य ( १ ) बेले; हिस्ट्री ऑव् गुजरात; पृ० ३६६-७० । आत्माराम मोतीराम दीवा- नजी; मिरात-इ-सिकंदरी ( गुजराती अनुवाद ); पृ० २६६ । वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० २७ । मेरा उदयपुर राज्य का इतिहास; जि० १, पृ० ३६२-६ । कर्नल टॉड ने बहादुरशाह की चित्तौड़ पर एक ही बार चढ़ाई होने का उल्लेख कर वि० सं० १५८९ ( ई० स० १५३३ ) में बाघसिंह का युद्ध में काम आना और वहां पर सुलतान का अधिकार हो जाना लिखा है; किंतु इसके विरुद्ध 'मिरात-इ-सिकंदरी' आदि से वि० सं० १५९१ ( ई० स० १५३४-५ ) में बहादुरशाह का दूसरी बार चढ़ाई करना स्पष्ट है और 'तारीख़ फिरिश्ता' (ब्रिग़्ज़; जि० ४, पृ० १२६) से भी बहादुर- शाह का चित्तौड़ पर दूसरी बार चढ़कर जाना पाया जाता है। इसलिए टॉड ने बाघसिंह का वि० सं० १५८९ ( ई० स० १५३३ ) में बहादुरशाह की चढ़ाई के समय चित्तौड़ में काम आना लिखा, वह स्वीकार करने योग्य नहीं है, क्योंकि उदयपुर और प्रतापगढ़ राज्य से मिलनेवाली प्रायः सब ख्यातों में बाघसिंह का वि० सं० १५९१ ( ई० स० १५३४-५ ) में बहादुरशाह के आक्रमण के समय मारा जाना लिखा है ।
महारावत बाघसिंह ७६ पर कुछ भी प्रभाव न पड़ा । तब शेष बचे हुए सरदारों में से भी कई चित्तौड़ की रक्षार्थ बहादुर- सुलतान से जा मिले, तथा वे उसको वहां का शाह से लड़कर बाघसिंह भेद बताते रहे। पहली चढ़ाई में सुलतान को क़िले का मारा जाना. पर अधिकार करना कुछ कठिन जान पड़ता था, किन्तु महाराणा के सरदारों के जा मिलने से उसको चित्तौड़ पर अधिकार करना सरल जान पड़ा । निदान वि० सं० १५६१ (ई० स० १५३४) में उसने पुनः चित्तौड़ पर अधिकार करने के लिए चढ़ाई की¹ । राजमाता हाड़ी कर्मवती को यह जानकर बड़ी चिंता हुई । उसने सरदारों को इस आशय के पत्र भिजवाये-“अब तक तो चित्तौड़ राजपूतों के हाथ में रहा, पर अब उनके हाथ से निकलने का समय आ गया है । मैं क़िला तुम्हें सौंपती हूं, चाहे तुम रखो, चाहे शत्रु को दे दो । मान लो, तुम्हारा स्वामी अयोग्य ही है, तो भी जो राज्य वंश-परंपरा से तुम्हारा है, उसके शत्रु के हाथ में चले जाने से तुम्हारी बड़ी अपकीर्ति होगी ।” राजमाता का यह पत्र पाते ही सरदारों में, जो महाराणा के व्यवहार से असंतुष्ट हो रहे थे, देश-प्रेम की लहर उमड़ पड़ी और इन उत्तेजनात्मक वाक्यों से वे चित्तौड़ की रक्षार्थ जान देने का संकल्प कर अपनी-अपनी सेनाओं के साथ राजधानी में जाने लगे । उपर्युक्त आशय का एक पत्र राजमाता ने देवलिया के स्वामी बाघसिंह के पास भी भेजा, जिसको पाते ही उसने विक्रमादित्य-द्वारा होनेवाले अनुचित कार्यों का विस्मरण कर चित्तौड़ की रक्षा के लिए अपने प्राणों को उत्सर्ग करने का दृढ़ संकल्प कर लिया एवं सुलतान की दी हुई जागीर का परित्याग कर वह तत्काल अपने राजपूतों-सहित चित्तौड़ जा पहुंचा । शीघ्र ही चित्तौड़गढ़ वीर क्षत्रियों से भर गया, परंतु दुर्ग में खाने-पीने का सामान दो महीनों से अधिक चलने लायक़ न था तथा सुलतान की सेना में रसद, तोप, बारूद, गोले आदि प्रचुरता से थे । इसलिए सब सरदारों ने उभय पक्ष के बलाबल पर विचार ( १ ) वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० २८ । मेरा उदयपुर राज्य का इतिहास ; जि० १, पृ० ३६७ ।
८० प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास कर महाराणा विक्रमादित्य एवं उसके छोटे भाई उदयसिंह को, जब तक युद्ध समाप्त न हो तब तक के लिए, उनके ननिहाल बूंदी भेजने और महाराणा के स्थान में रावत बाघसिंह को महाराणा का प्रतिनिधि बना उसकी आज्ञानुसार दुर्ग के द्वार खोलकर शत्रु सैन्य से लड़ने का निश्चय किया । फिर उन्होंने सुलतान से लड़ने के लिए क़िले के चारों तरफ़ उचित स्थानों पर मोर्चे लगाकर वहां बड़े-बड़े सरदारों को नियत कर दिया¹ । मुंहणोत नैणसी का कथन है कि इस अवसर पर रावत बाघसिंह ने अपने पिता सूरजमल-द्वारा सादड़ी पर अधिकार रहते समय चारणों आदि को दिये हुए १७ गांवों के², उनके वंशधरों के अधिकार में बराबर बने रहने की राजमाता से प्रतिज्ञा कराली थी । जब सरदारों ने बाघसिंह को महाराणा का प्रतिनिधि नियत किया तो उसने उनसे कहा कि आप लोगों ने मुझको महाराणा का प्रतिनिधि बनाया है तो मेरा कर्त्तव्य है कि मैं आगे बढ़कर क़िले के मुख्य द्वार पर लड़ूं । निदान वह रावत नरबदै-सहित दुर्ग के प्रथम द्वार पाडलपोल पर जा डटा । इसी प्रकार अन्य सरदार भी अपने-अपने मोर्चों पर जा जमे । वीका- खोह पर हाड़ा अर्जुन, भैरवपोल पर सोलंकी भैरवदास, हनुमानपोल पर झाला सज्जा तथा सिंहा और गणेशपोल पर डोडिया भाण सुलतान से लड़ने के लिए प्रस्तुत थे⁴ । इधर तो राजमाता ने चित्तौड़ की रक्षा का यह उपाय किया और उधर राखी भेज उसने बादशाह हुमायूं से फिर सहायता की याचना की । ( १ ) वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० २६-३० । मेरा उदयपुर राज्य का इतिहास; जि० १, पृ० ३६७-६ । ( २ ) देखो ऊपर पृ० ७० टि० ३ । ( ३ ) यह रावत अज्जा के पुत्र सारंगदेव का पौत्र और जोगा का बेटा था । इसके वंशधरों में मेवाड़ में कानोड़ के सरदार प्रथम वर्ग के उमराव हैं और सारंगदेवोत कहलाते हैं। ( ४ ) वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० ३० । मेरा उदयपुर राज्य का इतिहास; जि० १, पृ० ३६६ ।
महारावत बाघसिंह ८१
सुलताने बहादुरशाह और बादशाह हुमायूं के बीच अनबन थी, जिससे हुमायूं उसे नष्ट करना चाहता था । राजमाता कर्मवती का संदेश पाकर उसने उसको नष्ट करने का यह उपयुक्त अवसर समझा । वह अपनी सेना-सहित बहादुरशाह से लड़ने के लिए रवाना हुआ । ग्वालियर के पास पहुंचने पर उसको बहादुरशाह का पत्र मिला कि मैं इस समय जिहाद (धर्म-युद्ध) पर हूं, यदि तुम हिन्दुओं की सहायता करोगे तो खुदा के सामने क्या जवाब दोगे ? यह पत्र पाकर हुमायूं ग्वालियर में ही ठहर गया और चित्तौड़ के युद्ध के परिणाम की प्रतीक्षा करने लगा । इस प्रकार हुमायूं के मार्ग में रुक जाने से बहादुरशाह को चित्तौड़ पर आक्रमण करने में सुभीता हो गया और उसने चारों तरफ़ से क़िले पर घेरा डालकर युद्ध आरंभ कर दिया । उसके साथ के तोपखाने में यूरोपियन (पोर्चुगीज़) गोलंदाज़ भी थे, जिन्होंने वेगपूर्वक गोलंदाज़ी शुरू कर दी । उसी समय वीका खोह की तरफ़ से सुरंग के द्वारा दुर्ग की पैंतालीस हाथ दीवार उड़ गई, जिससे हाड़ा अर्जुन अपने साथियों-सहित मारा गया । गिरी हुई दीवार के मार्ग से दुर्ग में प्रवेश करने के लिए गुजराती सेना ने प्रबल आक्रमण किया, जिसको राजपूतों ने बड़ी वीरता से रोका । बहादुर- शाह ने तोपों को आगे कर पाडलपोल, सूरजपोल और लाखोटा की बारी की तरफ़ से हमला किया । तब दुर्ग का द्वार खोलकर बड़ी वीरता से राजपूतों का समूह उनपर टूट पड़ा । उस समय महारावत बाघसिंह ने शत्रु- सेना से घोर युद्ध किया और अंत में वह पाडलपोल के बाहर शत्रु-सैन्य से लड़ता हुआ मारा गया¹ । वहां उसका स्मारक आज भी बना हुआ है और उसकी पूजा होती है । बाघसिंह के मारे जाने पर राजपूत-सेना का व्यूह भंग हो गया और गुजराती सेना आगे बढ़ने लगी । राजपूतों ने मुसलमान सेना का मुक़ाबला करने में कसर न रखी । उनके अनेक वीर हताहत हुए और जब राजपूतों के प्रसिद्ध-प्रसिद्ध सरदार काम आ गये तो सुलतान की
(१) वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० ३०-३१ । मेरा उदयपुर राज्य का इतिहास; जि० १, पृ० ३६७-६ । ११
८२ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास. सेना ने दुर्ग में प्रवेश किया। राजमाता कर्मवती ने जब दुर्ग बचने की आशा न देखी तो बहुतसी स्त्रियों के साथ जौहर किया। इस युद्ध में सुलतान बहादुरशाह विजयी हुआ और उसने चित्तौड़ पर अधिकार कर लिया। यह युद्ध चित्तौड़ का 'दूसरा शाका' कहलाता है१। बहादुरशाह का थोड़े समय तक ही चित्तौड़ पर अधिकार रहा। वह अपना अधिकार स्थिर भी न करने पाया था कि बादशाह हुमायूं ने उसपर चढ़ाई कर दी। मन्दसोर के निकट दोनों में लड़ाई हुई, जिसमें बहादुरशाह हारकर मांडू की तरफ़ भाग गया। फिर तो हुमायूं ने उसका पीछाकर (१) मुंहणोत नैणसी की ख्यात; प्रथम भाग, पृ० ५४-५। टॉड; राजस्थान; जि० १, पृ० ३०३। वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० ३१। मेरा उदयपुर राज्य का इतिहास; जि० १, पृ० ३६६ । मुंशी देवीप्रसाद; महाराणा रतनसिंह और विक्रमादित्य का जीवनचरित्र; पृ० ६६-७३ । मुंहणोत नैणसी ने अपनी ख्यात में वि० सं० १५८६ (ई० स० १५३३) में बहादुरशाह की चित्तौड़ पर चढ़ाई होने और दुर्ग पर सुलतान का अधिकार होने का उल्लेख किया है (भाग १, पृ० ५५), परन्तु उसका वि० सं० १५८६ में सुलतान का चित्तौड़ पर अधिकार होने का कथन ठीक नहीं जान पड़ता, क्योंकि वहीं पहली बार की चढ़ाई में सुलतान के चित्तौड़ को घेर लेने और फिर संधि होकर लौट जाने तथा दूसरी बार की चढ़ाई में सरदारों के काम आने एवं जौहर होने के पीछे सुलतान का अधिकार होने का वर्णन है। ऐसी स्थिति में पहली चढ़ाई वि० सं० १५८६ में और दूसरी वि० सं० १५६१ में होकर उस समय जौहर होना एवं चित्तौड़ पर सुलतान का अधिकार होना मानना पड़ेगा। फ़ारसी तवारीखों में बहादुरशाह की चित्तौड़ की दोनों चढ़ाइयों की घटना आस-पास की होने से उनका वर्णन एक ही स्थल पर किया है और वर्णन भी कुछ अस्पष्ट है। इसलिए यह संभव है कि कर्नल टॉड ने भी ये दोनों घटनाएं एक ही समझ उनका संवत् १५८६ में घटित होना लिख दिया हो। प्रतापगढ़ राज्य की ख्यातों में एक स्थान पर माघ सुदि ४ शुक्रवार को बाघसिंह की मृत्यु होना लिखा है, परन्तु वि० सं० १५६१ माघ सुदि ४ को शुक्रवार नहीं, अपितु मंगलवार था। इसलिए ख्यात के लेखानुसार माघ सुदि ४ को मृत्यु होना माना नहीं जा सकता। 'वीरविनोद' में वि० सं० १५६२ चैत्र सुदि ५ को अंतिम युद्ध होना लिखा है, जो फ़ारसी तवारीखों से भी ठीक जान पड़ता है।
महारावत बाघसिंह ८३ मालवा और गुजरात के विशाल राज्यों को अपने अधीन कर लिया। अभागा बहादुरशाह अपना राज्य गंवाकर दीव बंदर के पास पोर्चुगीज़ों के हाथ से मारा गया। हुमायूं के मुक़ाबले में बहादुरशाह के परास्त होने का समाचार सुनकर चित्तौड़ में रही-सही गुजराती सेना भी भागने लगी। ऐसा सुअवसर देख मेवाड़ के बचे हुए सरदारों ने थोड़े-बहुत राजपूतों को एकत्र कर गुजराती सेना पर (जो चित्तौड़ में नियत थी) आक्रमण कर दिया, जिससे सुलतान की बची हुई सेना भाग गई और बिना अधिक रक्तपात के ही मेवाड़वालों का पुनः चित्तौड़ पर अधिकार हो गया¹। कर्नल टॉड ने इस युद्ध में महारावत बाघसिंह के काम आने की बड़ी प्रशंसा की है। उसका कथन है कि जिस दिन मेवाड़ का राज्य-चिह्न 'छांगी' सूरजमल के पुत्र (बाघसिंह) के शीश पर उठाई गई, उस दिन उसका जैसा प्रकाश हुआ, वैसा कभी न हुआ²। सचमुच अपने देश की रक्षा के लिए तो वीरों के युद्ध में मारे जाने के इतिहास में अनेक उदाहरण हैं, परन्तु निःस्वार्थ भाव से इस प्रकार आगे बढ़कर काम आने के उदाहरण बहुत कम मिलेंगे। बाघसिंह के पिता सूरजमल और पितामह क्षेमकर्ण से मेवाड़ के महाराणाओं का विरोध रहा था, पर चित्तौड़ पर आपत्ति के समय उन सब बातों को भूलकर अपने प्राणों की बाज़ी लगा देना अवश्य ही बाघसिंह के सद्गुणों का परिचायक है। महाराणा का प्रतिनिधि बन- कर चित्तौड़ की रक्षा में वीरगति प्राप्त करने के कारण उस (बाघसिंह) के वंशजों की उपाधि 'दीवान' हुई और वे देवलिया के दीवान कहलाते हैं³। प्रतापगढ़ राज्य के बड़वे की ख्यात में लिखा है कि उस (बाघसिंह) के (१) वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० ३२-३३। मेरा उदयपुर राज्य का इतिहास; जि० १, पृ० ४००। मुंशी देवीप्रसाद; महाराणा रतनसिंह और विक्रमादित्य का जीवन- चरित्र; पृ० ७४-६। (२) टॉड; राजस्थान; जि० १, पृ० ३६३। (३) वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० ३० टिप्पण १ तथा पृ० १०५४। मेरा उदयपुर राज्य का इतिहास; जि० १, पृ० ३६८, टिप्पण २।
६४ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास [बाघसिंह की राणियां और संतति] पांच राणियां थीं, जिनसे छः पुत्र—रायसिंह, जेतमाल भारमल, कान्हा, खानजी¹, मानजी—तथा दो पुत्रियां रामकुंवरी और शामकुंवरी उत्पन्न हुईं² । रावत बाघसिंह युद्ध-वीर, धर्मप्रिय और दानी नरेश था । स्वदेश- प्रेम और कुलाभिमान उसकी नसों में कूट-कूट कर भरा हुआ था । [रावत बाघसिंह का व्यक्तित्व] उसने निःस्वार्थ भाव से चित्तौड़ की रक्षा के लिए अपने प्राण उत्सर्गकर संसार के सामने एक बड़ा आदर्श उपस्थित किया । उसमें एक विशेष गुण यह भी था कि अपने पूर्वजों-द्वारा दान में दी हुई भूमि उसने पीछी नहीं ली; अपितु जब वह युद्ध क्षेत्र में महाराणा का प्रतिनिधि बन कर लड़ने गया, उस समय उसने राजमाता कर्मवती हाड़ी से अपने पिता सूरजमल-द्वारा मेवाड़ में दान किये हुए गांव सदा के लिए बहाल रहने की प्रतिज्ञा करा ली। इस उदाहरण से उसके चरित्र की महत्ता सिद्ध होती है। यदि उस अवसर पर वह राजमाता से नया पट्टा तथा अधिक सम्मान मांगता तो वह भी मिल सकता था; परन्तु उस वीर ने अपने वंशजों के लिए राजपूती स्वभाव के विरुद्ध कुछ भी याचना न कर केवल उपरिलिखित याचना की, जो उसके निर्मल चरित्र का परिचय देती है । 'हरिभूषण महाकाव्य' का कर्त्ता कवि गंगाराम महारावत बाघसिंह की प्रशंसा करता हुआ, उसको विलासप्रिय नरेश बतलाता है³; किंतु गंगाराम का यह मत ग्राह्य नहीं हो सकता, क्योंकि यदि वह विलासप्रिय व्यक्ति होता तो युद्ध-क्षेत्र में मरने को कभी सन्नध नहीं होता । गंगाराम, बहादुरशाह से युद्ध होना तो लिखता है; किंतु बाघसिंह के धराशायी होने का कुछ भी वर्णन नहीं करता । गुजराती सैन्य का भाग जाना और
( १ ) खानजी के वंशज आंवीरामा और बोड़ी सालथली के प्रथम वर्ग के सर- दार हैं और वे खानावत कहलाते हैं । ( २ ) प्रतापगढ़ राज्य के बड़वे की ख्यात; पृ० २ । ( ३ ) गंगाराम; हरिभूषण महाकाव्य; सर्ग ४, श्लोक ३-३१ ।
महारावत रायसिंह ८५ महाराणा की विजय होना आदि कथन¹ भी उसका ज्यों का त्यों स्वीकार करने योग्य नहीं है, क्योंकि अनेक प्रमाणों से उपर्युक्त युद्ध में बाघसिंह की मृत्यु होना और बहादुरशाह की विजय होकर थोड़े दिनों तक उसका चित्तौड़ पर अधिकार रहना सिद्ध है, जैसा कि हम ऊपर बतला चुके हैं। बाघसिंह का कोई शिलालेख तथा ताम्रपत्र नहीं मिला है, जिससे उसके जीवन पर अधिक प्रकाश पड़ना कठिन है, तो भी उसका जो-कुछ इतिहास प्राप्त है, उसके आधार पर कहा जा सकता है कि वह देशभक्त और वीर क्षत्री था ! रायसिंह बाघसिंह के वि० सं० १५६१ (ई० स० १५३५) में मालवे की जागीर छोड़ने पर मेवाड़-राज्य ने सादड़ी आदि की पैतृक जागीर पुनः उसको [राज्य-प्राप्ति] बहाल कर दी, अतएव उसका कुटुंब सादड़ी में ही रहने लगा और जब बाघसिंह का बहादुरशाह की चढ़ाई के समय युद्ध में परलोकवास हो गया, तब उसका पुत्र रायसिंह अपने पिता की संपत्ति का अधिकारी हुआ। चित्तौड़ पर उसके पिता के वीरतापूर्वक काम आने से उसको मेवाड़-राज्य की तरफ़ से धरियावद की जागीर भी प्रदान की गई²। चित्तौड़ से गुजरात की सेना को भगाकर राजपूतों ने वहां पर पीछा अधिकार कर लिया और फिर विक्रमादित्य को बूंदी से बुलाकर उसको [धाय पन्ना का बनवीर के डर] चित्तौड़ का राज्य सौंप दिया; किन्तु उसका [से उदयसिंह को रायसिंह के] आचरण न सुधरा । उसने बात-बात पर सरदारों [पास ले जाना] का अपमान करना जारी रखा, यहां तक कि अपने पिता संग्रामसिंह (सांगा) को कुंवरपदे में भ्रातृ-विरोध के समय आश्रय देनेवाले पंवार कर्मचंद्र का भी उसने अपमान किया। यह देख सरदारों ( १ ) वही; सर्ग ५, श्लोक १-२० । ( २ ) अर्शकिंन; राजपूताना गैज़ेटियर (मेवार रेज़िडेंसी); जि० २ ए, पृ० १६७ (ई० स० १६०८)। एक ख्यात में साटोला भी जागीर में मिलने का उल्लेख है।
८६ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास को उस (विक्रमादित्य) से पूर्ण घृणा हो गई और वे उसको राज्यच्युत करने का उद्योग करने लगे। इस षड्यंत्र में महाराणा संग्रामसिंह के परलोकवासी कुंवर पृथ्वीराज के दासी-पुत्र वनवीर को भी (जो विक्रमादित्य का कृपापात्र था) सरदारों ने शामिल कर लिया। कुछ समय बाद ही अपना प्रभुत्व स्थापित हो जाने पर विक्रमादित्य तथा उदयसिंह को मार निष्कंटक राज्य करने का विचारकर वनवीर ने वि० सं० १५६३ (ई० स० १५३६) में एक दिन रात्रि के समय विक्रमादित्य को मार डाला १। विद्युत्-वेग की भांति यह समाचार राज-महलों में फैल गया और अन्तःपुर में कुहराम मच गया। मध्य रात्रि में; राज-महलों में रोना-पीटना शुरू हो जाने से लोग आश्चर्यान्वित हो गये और एक बारी (पत्तल आदि बनानेवाले) ने उदयसिंह की धाय पन्ना खींची से भी यह बात कह सुनाई। बारी के मुख से वनवीर-द्वारा विक्रमादित्य के मारे जाने की बात सुनकर धाय को बड़ी चिंता हुई और उसे भय हुआ कि वह अब उदयसिंह को भी अवश्य मारेगा। अतएव उसने बड़ी फुर्ती से उदयसिंह को बारी के साथ बाहर निकाल दिय और उसके स्थान पर अपने पुत्र को सुला दिया, जो उदयसिंह की अवस्था का था। धाय ने यह परिवर्त्तन इतनी शीघ्रता से किया कि दूसरा कोई इस भेद को न जान सका। इतने में हाथ में नंगी तलवार लिए वनवीर वहां पहुंचा और उसने धाय से पूछा कि उदयसिंह कहां है। तब पन्ना ने पलंग पर सोये हुए बालक की तरफ़ संकेत किया। बनवीर, उदयसिंह को मारकर निष्कंटक राज्य करना चाहता था; इसलिए पूरी-पूरी जांच किये बिना ही उसने शीघ्रतापूर्वक उस सोये हुए बालक पर तलवार का प्रहार किया, जिससे उसकी मृत्यु हो गई २। (१) टॉड; राजस्थान; जि०-१, पृ० ३६७ । वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० ३३। मुंशी देवीप्रसाद; महाराणा रतनसिंह और विक्रमाजीत का जीवनचरित्र; पृ० ७८-७६ । मेरा उदयपुर राज्य का इतिहास; जि० १, पृ० ४०१ । (२) टॉड; राजस्थान; जि० १, पृ० ३६७-८ । वीरविनोद; द्वितीयं भाग, पृ० ३३ । मेरा उदयपुर राज्य का इतिहास; जि० १, पृ० ४०१ ।
महारावत रायसिंह ८७ कठोर हृदय करके धाय पन्ना ने वनवीर द्वारा अपने पुत्र का मारा जाना देखा और जब वह वहां से चला गया तो वह अपने मृतक पुत्र का अग्नि संस्कार कर वहां से चल दी। लुक-छिपकर क़िले के बाहर निकल वह पूर्व संकेत के अनुसार जहां बारी उदयसिंह को लेकर ठहरा हुआ था वहां गई। फिर वह उदयसिंह को लेकर रावत रायसिंह के पास सादड़ी पहुंची। रावत रायसिंह ने धाय पन्ना के मुख से विक्रमादित्य के मारे जाने की बात सुनकर खेद प्रकट किया और उसको आश्वासन देकर अपने यहां ठहराया; किन्तु स्थायी- रूप से उन्हें अपने यहां रख बनवीर का विरोधी बनने की उसमें शक्ति न थी, इसलिए उसने उस (उदयसिंह) को सुरक्षित रूप से डूंगरपुर भिजवा दिया¹। डूंगरपुर पहुंचने पर वहां के महारावल पृथ्वीराज ने उसका सम्मान तो किया; परन्तु वनवीर से विरोध होने में हानि समझ उसको अपने यहां [हाशिया: वनवीर को चित्तौड़ से निका- / लने के लिए रावत रायसिंह / का महाराणा की सहायतार्थ / जाना] थोड़े ही समय तक रखा और उदयसिंह के लिए सबसे सुरक्षित स्थान कुंभलगढ़ समझ सवारी आदि का यथोचित प्रबंध कर उसने उस (उदयसिंह) को वहां पहुंचा दिया। वहां के दुर्गाध्यक्ष आशाशाह नामक देपुरा (माहेश्वरी) महाजन ने अपनी माता के आग्रह करने पर उदयसिंह को अपने पास रक्खा²। धीरे-धीरे यह बात प्रकाश में आने लगी कि उदयसिंह मारा नहीं गया है और धाय-सहित कुंभलगढ़ पहुंच गया है, जहां वह सही-सलामत है। तब चौहान खान (कोठारिये के रावत का पूर्वज) आदि बड़े-बड़े सरदार कुंभलगढ़ पहुंचे और उन्होंने दूसरे सरदारों को भी वहां बुलाया। फिर (१) टॉड; राजस्थान; जि० १, पृ० ३६८। वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० ६१। मेरा उदयपुर राज्य का इतिहास; जि० १, पृ० ४०३। कर्नल टॉड और 'वीरविनोद' के इस कथन से कि धाय पन्ना उदयसिंह को लेकर देवलिया के स्वामी रायसिंह के पास देवलिया पहुंची थी, पाया जाता है कि उस समय रायसिंह देवलिया में रहता होगा। (२) टॉड; राजस्थान; जि० १, पृ० ३६८-६। वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० ६२। मेरा उदयपुर राज्य का इतिहास; जि० १, पृ० ४०३।
८८ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास सब सरदारों ने मिलकर कुंभलगढ़ में ही वि० सं० १५६४ (ई० स० १५३७) में उदयसिंह को गद्दी पर बिठालाने का दस्तूर किया। उस समय उदयसिंह की आयु लगभग पंद्रह-सोलह वर्ष की हो चुकी थी, इसलिए सरदारों ने पाली के सोनगरे अखैराज की पुत्री के साथ उसका विवाह भी कर दिया। तदनंतर चित्तौड़ से वनवीर को निकालने के लिए सलाह कर सेना एकत्रित करने की आयोजना की गई। महाराणा के इस विचार की ख़बर फैलते ही चारों तरफ़ से सैनिक आने लगे और उसके कुटुंबियों के अतिरिक्त प्रजा भी उसको देखने के लिए आतुर हो उठी। कुछ ही समय में ईडर का राव भारमल, बूंदी का हाड़ा राव सुलतान, डूंगरपुर का कुंवर आसकरण, बांसवाड़े का महारावल जगमाल एवं महारावत रायसिंह आदि अपने राजपूतों को लेकर उदयसिंह की सहायतार्थ जा पहुंचे¹। उधर वनवीर भी यह समाचार पाकर अपनी सेना-सहित मुक़ाबले के लिए गया। माहोली (मावली) के पास दोनों सेनाओं में युद्ध हुआ जिसमें महाराणा की विजय हुई। अनन्तर ताणा-नामक स्थान पर अधिकार कर महाराणा चालीस हज़ार सेना के साथ चित्तौड़ पहुंचा, परंतु साथ में, तोपखाना न था। इसलिए घेरा डालने पर भी क़िले पर अधिकार करने में कठिनाइयां होने लगीं। तब महाराणा के प्रधान आशाशाह देपुरा ने वनवीर के प्रधान चील मेहता को मिलाकर रात्रि में दुर्ग के द्वार खुलवा दिये, जिससे महाराणा की सेना ने भीतर प्रवेश कर वि० सं० १५६७ (ई० स० १५४०) में वहां अधिकार कर लिया। महारावत रायसिंह के समय का शेष इतिहास भी उसके पूर्वजों के इतिहास के समान अंधकार में विलीन है। प्रतापगढ़ राज्य के बड़वे की रायसिंह का देहांत और ख्यात तथा अन्य ख्यातों में लिखा है कि रायसिंह उसकी संतति का वि० सं० १६०६ (ई० स० १५५२) में देहांत हुआ²। उसके चार कुंवर-विक्रमसिंह (वीका), (१) वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० ६३ । (२) एक ख्यात में रायसिंह का साटोले के खेड़े में देहांत होने का उल्लेख
महारावत रायसिंह ८६ उदयकरण, आसकरण और पूरणमल तथा एक पुत्री किशनकुंवरी हुई१ । 'हरिभूषण महाकाव्य' से पाया जाता है कि रायसिंह अपने पूर्वजों के समान वीर, नीतिनिपुण और कवियों का सम्मान करनेवाला था । उसकी प्रजा सम्पन्न थी । उसने कई तालाब और उद्यान बनवाये थे । चारण कवियों का उसके यहां बड़ा प्रभाव था और वह उनको दान देने में न अघाता था२ । उस ( रायसिंह )का कोई शिलालेख अथवा दानपत्र नहीं मिला है, अतएव उसके इतिहास पर अधिक प्रकाश डालना कठिन ही नहीं एक प्रकार से असंभव है । मिलता है और यह भी लिखा है कि वि० सं० १६०७ (ई० स० १५५०) में महाराणा उदयसिंह के समय सादड़ी की जागीर छूट गई थी, परंतु अधिकांश स्थलों पर सादड़ी की जागीर रायसिंह के पुत्र विक्रमसिंह( बीका ) के समय छूटना लिखा मिलता है, जिससे उस ( विक्रमसिंह )के प्रसङ्ग में इस घटना को विस्तृत रूप से लिखा जायगा । ( १ ) प्रतापगढ़ राज्य के बड़वे की ख्यात; पृ० . २ । ( २ ) वैरीवीरवनिताकुचान्तरे स्वेददुर्धनपटीरकर्दमम् । साध्वसानलशिखाप्रतापिते यन्निशम्य मिलितारिसूदनम्॥ २४॥ येन भूतलमियं महीभृता सर्वतो गतदरिद्रलेशकम् । पूरितं सकलद्रव्यसम्पदा स्वर्गपत्तनमिव व्यशोभत ॥ २५ ॥ वाटिकाः कति महीभृता स्वयं कारिताः कति सरोवराण्यपि । धर्मराज इव भूतले बभौ याचमानजनदानतत्परः ॥ २६ ॥ यः कवीश्वरप्रभावशुम्वदो लोकलोचनसुखाकरो बभौ । न्यूनदानमपि लक्षसंख्यया येन दत्तमिह भूतले सदा ॥२७॥ चारणैरतितरां निषेवितः संस्तुतः कविजनैः समन्ततः । रञ्जयन्निजगुणैः कवीश्वरान् भासमान इह भानुवद्वभौ ॥२८॥ सर्ग ५ । १२
६०. प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास विक्रमसिंह (बीका) रायसिंह का परलोकवास होने पर वि० सं० १६०६ (ई० स० १५५२) के लगभग उसका ज्येष्ठ कुंवर विक्रमसिंह, जिसको बीका भी कहते हैं, [राज्य-प्राप्ति] कांठल एवं मेवाड़ में अपने पिता की संपत्ति सादड़ी आदि का अधिकारी हुआ१ । उसका जन्म वि० सं० १५८२ ( ई० स० १५२५ ) में होना माना जाता है२ । ऊपर महारावत रायसिंह के प्रसङ्ग में बतलाया गया है कि धाय पन्ना- द्वारा बाल्यावस्था में महाराणा उदयसिंह, विक्रमादित्य की मृत्यु हो जाने पर, [सादड़ी की जागीर छूट जाने पर विक्रमसिंह का कांठल में जाना] रायसिंह के पास पहुंचाया गया था; परंतु उसने बनवीर के भय से उस समय विशेष सहायता न दी और उसको डूंगरपुर पहुंचा दिया । इसके पीछे कुंभलगढ़ में सरदारों के जा मिलने पर महाराणा, बनवीर को निकालने में समर्थ हुआ और वि० सं० १५९७ ( ई० स० १५४० ) में चित्तौड़ की तरफ़ बढ़ा । उस समय रायसिंह भी उक्त महाराणा की सहायतार्थ अपनी सेना- सहित सम्मिलित हुआ था । चित्तौड़गढ़ पर अपनी सत्ता दृढ़ हो जाने के उपरांत महाराणा ने रायसिंह की इस सेवा को विस्मरण कर दिया और ( १ ) प्रतापगढ़ राज्य की एक पुरानी ख्यात; पृ० २ । प्रतापगढ़ राज्य के बड़वे की ख्यात; पृ० २ । ( २ ) प्रतापगढ़ के पहले के राजाओं के जन्म-संवत् अब तक नहीं मिले हैं । ऊपर विक्रमसिंह का जो जन्म-संवत् दिया गया है, वह पंडित जगन्नाथ शास्त्री की भेजी हुई एक याददाश्त के आधार पर है । उसमें तिथि और वार नहीं दिया है और न उस- ( विक्रमसिंह ) की कोई जन्म-कुंडली देखने में आई है । ऐसी दशा में उसका जन्म-संवत् १५८२ ठीक है अथवा नहीं, यह निश्चयपूर्वक नहीं कहा जा सकता । इसकी पुष्टि में जब तक कोई दूसरा प्रमाण न मिले, तब तक इसे आनुमानिक ही मानना पड़ेगा । विक्रमसिंह प्रतापगढ़ के राजवंश के मूलपुरुष क्षेमकर्ण का पांचवां वंशधर था । क्षेमकर्ण और रायसिंह ( विक्रमसिंह के पिता ) तक के समयक्रम पर विचार करने से तो विक्रमसिंह का जन्म-संवत् १५८२ होना संभव जान पड़ता है ।
महारावत विक्रमसिंह ६१ अपनी बाल्यावस्था के समय उस ( रायसिंह ) के द्वारा सहायता न मिलने की बात को स्मरण कर वह उससे अप्रसन्न रहने लगा। संयोगवश रायसिंह का देहांत हो गया। तब विक्रमसिंह के सादड़ी आदि का स्वामी होने पर महाराणा उससे छेड़-छाड़ करने लगा और सादड़ी आदि की जागीर उसने राज्य- में मिला ली। महाराणा उदयसिंह अपने भाई विक्रमादित्य की अपेक्षा अच्छा शासक था। राजपूताना के कई नरेश उसको अपना नेता मानते थे एवं उसने मेवाड़ के अतीत गौरव को थोड़ा-बहुत चमका दिया था। ऐसी अवस्था में उदयसिंह से मुक़ाबला करने में विक्रमसिंह को हानि की ही संभावना थी, अतएव उसने बलपूर्वक सादड़ी की जागीर अपने अधिकार में रखना श्रेयस्कर न समझा और महाराणा के सादड़ी की जागीर ले लेने पर वह वि० सं० १६१० ( ई० स० १५५३ ) के लगभग मेवाड़ का सदा के लिए परित्याग कर¹, स्वाधीनतापूर्वक जीवन व्यतीत- करने की भावना से अपने पितामह सूरजमल-द्वारा जीते हुए कांठल प्रदेश में चला गया तथा वहां की स्थिति को सुदृढ़ कर रायासपुर में रहने लगा² । दिल्ली के मुग़ल बादशाह हुमायूं ने गुजरात के सुलतान बहादुरशाह को हराकर मालवा तथा गुजरात विजय कर लिया, परंतु उन्हीं दिनों उस- [हाशिया: हाजीख़ां की सहायतार्थ महाराणा के साथ कुंवर तेजसिंह को भेजना] ( हुमायूं ) के सरदार शेरखां ने बंगाल में विद्रोह कर दिया। इसपर हुमायूं ने मालवे की ओर से उधर प्रस्थान किया। वहां उसने विद्रोह को दबाने की चेष्टा की, पर उसमें सफलता नहीं हुई और शेरखां ने हुमायूं को परास्त कर दिल्ली की सलतनत पर अधिकार कर लिया तथा शेरशाह नाम से अपने को दिल्ली का स्वामी घोषित किया। वह केवल छः वर्ष ही राज्य करने पाया था कि उसका देहांत हो गया। उसके पीछे उसके वंशजों ( १ ) कैप्टेन सी० ई० येट; गैज़ेटियर ऑव् प्रतापगढ़; पृ० ७६ । मेजर के० डी० अर्सकिन; गैज़ेटियर ऑव् प्रतापगढ़ स्टेट; पृ० १६७ । ( २ ) कैप्टेन सी० ई० येट; गैज़ेटियर ऑव् प्रतापगढ़; पृ० ७६ । मेजर के० डी० अर्सकिन; गैज़ेटियर ऑव् प्रतापगढ़; पृ० १६७ ।
ने केवल दस वर्ष ही सलतनत का उपभोग किया और वि० सं० १६१२ (ई० स० १५५५) में सूर वंश के अंतिम बादशाह सिकंदरशाह से दिल्ली की सलतनत पीछे बादशाह हुमायूं ने छीन ली, किन्तु उसी वर्ष मस्जिद की सीढ़ी से गिर जाने के कारण हुमायूं की मृत्यु हो गई और उस(हुमायूं)- का पुत्र अकबर तेरह वर्ष की आयु में दिल्ली का स्वामी हुआ। उस समय मेवात (अलवर इलाक़ा) पर शेरशाह के गुलाम सेनापति हाजीखां का अधिकार था। वहां से उसको निकालने के लिए वादशाह ने पीरमुहम्मद संरवानी (नासिरुल्मुल्क) को ससैन्य रवाना किया। पीरमुहम्मद के पहुंचने पर हाजीखां भागकर अजमेर¹ चला गया, जहां उस समय (१) महाराणा विक्रमादित्य के समय गुजरात के सुलतान बहादुरशाह की चित्तौड़ पर चढ़ाई होने पर अजमेर पर भी गुजराती सलतनत का अधिकार हो गया था, परंतु वहां उसका अधिकार थोड़े समय तक ही रहा। बहादुरशाह की पराजय के पीछे दिल्ली के मुग़ल बादशाह हुमायूं के समय शेरखां पठान ने विद्रोह कर दिल्ली पर अधिकार कर लिया और अपना नाम शेरशाह रखा। इस अव्यवस्था से लाभ उठा मेड़ते के राव वीरमदेव ने अजमेर पर अधिकार कर लिया, परंतु वह अपना अधिकार वहां थोड़े दिन ही रख सका और जोधपुर के राव मालदेव ने उससे अजमेर छीन लिया। वि० सं० १६०० (ई० स० १५४३) में शेरशाह सूर की मालदेव पर चढ़ाई हुई, उस समय अजमेर राठोड़ों के हाथ से निकल गया। फिर शेरशाह सूर के पुत्र सलीमशाह सूर (इस्लामशाह) की मृत्यु के पीछे राव मालदेव ने पुनः वहां पर अधिकार करने के लिए अपनी सेना भेजी। इसपर शाही सेवकों ने, जो अजमेर में नियत थे, वि० सं० १६१० (ई० स० १५५३) में महाराणा उदयसिंह को चित्तौड़ से बुलाया। महाराणा ने वहां से राठोड़ों की सेना को हटाकर अपना अधिकार जमा लिया। हाजीखां से महाराणा की वि० सं० १६१३ (ई० स० १५५७) में हार हो जाने पर उसको अजमेर से निकालने के लिए बादशाह अकबर ने सेना भेजी, जिसने उसको निकालकर वहां अपना अधिकार स्थिर किया। लगभग १३२ वर्षों तक अजमेर पर मुग़ल सलतनत का अधिकार रहा। मुग़लों के शासनकाल में यह एक प्रधान सूवा था और राजपूताना के उदयपुर, जयपुर, जोधपुर आदि राज्य इस सूबे के अन्तर्गत थे। मुग़ल वादशाहत की अवनति के दिनों में
महारावत विक्रमसिंह ६३ महाराणा उदयसिंह का अधिकार था । महाराणा ने उस (हाजीखां) को वहां से अन्यत्र चले जाने के लिए कहलाया । इसपर हाजीखां ने अपना दूत भेज महाराणा से. निवेदन कराया कि मैं तो आपका सहारा समझ यहां आकर ठहरा हूं, परंतु जोधपुर का राव मालदेव मुझे लूटना चाहता है, इसलिए आप मेरी सहायता करें। राव मालदेव के समय शेरशाह सूर-द्वारा मारवाड़ पर चढ़ाई होकर जोधपुर कुछ समय के लिए उक्त राव के अधिकार- से निकल गया था, इस कारण मालदेव का सूर-खानदान तथा उसके आश्रितों से वैर होना स्वाभाविक था। हाजीखां के पास अतुल संपत्ति थी; अतएव राव मालदेव ने शेरशाह-द्वारा होनेवाली हानि का बदला लेने के लिए यह अवसर उपयुक्त समझा और हाजीखां के अजमेर पहुंचने पर उसने अपने सरदार पृथ्वीराज जैतावत ( बगड़ीवालों का पूर्वज ) की अध्यक्षता में अपनी सेना रवाना की । अकेले हाजीखां की राठोड़ों से सामना करने की सामर्थ्य न थी, इसलिए महाराणा की सहायता उसको अपेक्षित थी । महाराणा उदयसिंह और राव मालदेव के बीच अनबन थी; दूसरे हाजीखां ने उसको सहायता देने के एवज़ में चालीस मन सोना और कुछ हाथी भी देने का इक़रार किया था । फलतः वि० सं० १६१३ ( ई० स० १५५६ ) में हाजीखां की सहायतार्थ महाराणा स्वयं अपने कई बड़े सरदारों एवं डूंगरपुर के महारावल आसकरण, बांसवाड़ा के स्वामी जोधपुर के महाराजा अजीतसिंह और अभयसिंह ने यहां पर अधिकार जमाने का उद्योग किया । उसमें अभयसिंह सफल हुआ; परंतु फिर उससे जयपुर के महाराजा सवाई जयसिंह ने अजमेर ले लिया । जयसिंह की मृत्यु के बाद राठोड़ों ने पुनः वहां अधिकार किया, किंतु ग्वालियर के सिंधिया जय आपा को जोधपुर के महाराजा विजयसिंह ने वि० सं० १८१२ ( ई० स० १७५५ ) में छल से मरवा डाला। इसपर जनकूजी सिंधिया ने अपनी विशाल सेना के साथ मारवाड़ पर चढ़ाई की । तब विजयसिंह ने कई लाख रुपये सेना-व्यय के और अजमेर का ज़िला जनकूजी को देकर अपना पिंड छुड़ाया । फिर दौलतराव सिंधिया से वि० सं० १८७५ ( ई० स० १८१८ ) के लगभग अंग्रेज़ सरकार ने यह प्रांत ले लिया ।