भारतकोश
राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

पृष्ठ 132, कुल 534 में से

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महारावत रायसिंह ८६ उदयकरण, आसकरण और पूरणमल तथा एक पुत्री किशनकुंवरी हुई१ । 'हरिभूषण महाकाव्य' से पाया जाता है कि रायसिंह अपने पूर्वजों के समान वीर, नीतिनिपुण और कवियों का सम्मान करनेवाला था । उसकी प्रजा सम्पन्न थी । उसने कई तालाब और उद्यान बनवाये थे । चारण कवियों का उसके यहां बड़ा प्रभाव था और वह उनको दान देने में न अघाता था२ । उस ( रायसिंह )का कोई शिलालेख अथवा दानपत्र नहीं मिला है, अतएव उसके इतिहास पर अधिक प्रकाश डालना कठिन ही नहीं एक प्रकार से असंभव है । मिलता है और यह भी लिखा है कि वि० सं० १६०७ (ई० स० १५५०) में महाराणा उदयसिंह के समय सादड़ी की जागीर छूट गई थी, परंतु अधिकांश स्थलों पर सादड़ी की जागीर रायसिंह के पुत्र विक्रमसिंह( बीका ) के समय छूटना लिखा मिलता है, जिससे उस ( विक्रमसिंह )के प्रसङ्ग में इस घटना को विस्तृत रूप से लिखा जायगा । ( १ ) प्रतापगढ़ राज्य के बड़वे की ख्यात; पृ० . २ । ( २ ) वैरीवीरवनिताकुचान्तरे स्वेददुर्धनपटीरकर्दमम् । साध्वसानलशिखाप्रतापिते यन्निशम्य मिलितारिसूदनम्॥ २४॥ येन भूतलमियं महीभृता सर्वतो गतदरिद्रलेशकम् । पूरितं सकलद्रव्यसम्पदा स्वर्गपत्तनमिव व्यशोभत ॥ २५ ॥ वाटिकाः कति महीभृता स्वयं कारिताः कति सरोवराण्यपि । धर्मराज इव भूतले बभौ याचमानजनदानतत्परः ॥ २६ ॥ यः कवीश्वरप्रभावशुम्वदो लोकलोचनसुखाकरो बभौ । न्यूनदानमपि लक्षसंख्यया येन दत्तमिह भूतले सदा ॥२७॥ चारणैरतितरां निषेवितः संस्तुतः कविजनैः समन्ततः । रञ्जयन्निजगुणैः कवीश्वरान् भासमान इह भानुवद्वभौ ॥२८॥ सर्ग ५ । १२

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