राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६०. प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास विक्रमसिंह (बीका) रायसिंह का परलोकवास होने पर वि० सं० १६०६ (ई० स० १५५२) के लगभग उसका ज्येष्ठ कुंवर विक्रमसिंह, जिसको बीका भी कहते हैं, [राज्य-प्राप्ति] कांठल एवं मेवाड़ में अपने पिता की संपत्ति सादड़ी आदि का अधिकारी हुआ१ । उसका जन्म वि० सं० १५८२ ( ई० स० १५२५ ) में होना माना जाता है२ । ऊपर महारावत रायसिंह के प्रसङ्ग में बतलाया गया है कि धाय पन्ना- द्वारा बाल्यावस्था में महाराणा उदयसिंह, विक्रमादित्य की मृत्यु हो जाने पर, [सादड़ी की जागीर छूट जाने पर विक्रमसिंह का कांठल में जाना] रायसिंह के पास पहुंचाया गया था; परंतु उसने बनवीर के भय से उस समय विशेष सहायता न दी और उसको डूंगरपुर पहुंचा दिया । इसके पीछे कुंभलगढ़ में सरदारों के जा मिलने पर महाराणा, बनवीर को निकालने में समर्थ हुआ और वि० सं० १५९७ ( ई० स० १५४० ) में चित्तौड़ की तरफ़ बढ़ा । उस समय रायसिंह भी उक्त महाराणा की सहायतार्थ अपनी सेना- सहित सम्मिलित हुआ था । चित्तौड़गढ़ पर अपनी सत्ता दृढ़ हो जाने के उपरांत महाराणा ने रायसिंह की इस सेवा को विस्मरण कर दिया और ( १ ) प्रतापगढ़ राज्य की एक पुरानी ख्यात; पृ० २ । प्रतापगढ़ राज्य के बड़वे की ख्यात; पृ० २ । ( २ ) प्रतापगढ़ के पहले के राजाओं के जन्म-संवत् अब तक नहीं मिले हैं । ऊपर विक्रमसिंह का जो जन्म-संवत् दिया गया है, वह पंडित जगन्नाथ शास्त्री की भेजी हुई एक याददाश्त के आधार पर है । उसमें तिथि और वार नहीं दिया है और न उस- ( विक्रमसिंह ) की कोई जन्म-कुंडली देखने में आई है । ऐसी दशा में उसका जन्म-संवत् १५८२ ठीक है अथवा नहीं, यह निश्चयपूर्वक नहीं कहा जा सकता । इसकी पुष्टि में जब तक कोई दूसरा प्रमाण न मिले, तब तक इसे आनुमानिक ही मानना पड़ेगा । विक्रमसिंह प्रतापगढ़ के राजवंश के मूलपुरुष क्षेमकर्ण का पांचवां वंशधर था । क्षेमकर्ण और रायसिंह ( विक्रमसिंह के पिता ) तक के समयक्रम पर विचार करने से तो विक्रमसिंह का जन्म-संवत् १५८२ होना संभव जान पड़ता है ।