राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमहारावत विक्रमसिंह ६१ अपनी बाल्यावस्था के समय उस ( रायसिंह ) के द्वारा सहायता न मिलने की बात को स्मरण कर वह उससे अप्रसन्न रहने लगा। संयोगवश रायसिंह का देहांत हो गया। तब विक्रमसिंह के सादड़ी आदि का स्वामी होने पर महाराणा उससे छेड़-छाड़ करने लगा और सादड़ी आदि की जागीर उसने राज्य- में मिला ली। महाराणा उदयसिंह अपने भाई विक्रमादित्य की अपेक्षा अच्छा शासक था। राजपूताना के कई नरेश उसको अपना नेता मानते थे एवं उसने मेवाड़ के अतीत गौरव को थोड़ा-बहुत चमका दिया था। ऐसी अवस्था में उदयसिंह से मुक़ाबला करने में विक्रमसिंह को हानि की ही संभावना थी, अतएव उसने बलपूर्वक सादड़ी की जागीर अपने अधिकार में रखना श्रेयस्कर न समझा और महाराणा के सादड़ी की जागीर ले लेने पर वह वि० सं० १६१० ( ई० स० १५५३ ) के लगभग मेवाड़ का सदा के लिए परित्याग कर¹, स्वाधीनतापूर्वक जीवन व्यतीत- करने की भावना से अपने पितामह सूरजमल-द्वारा जीते हुए कांठल प्रदेश में चला गया तथा वहां की स्थिति को सुदृढ़ कर रायासपुर में रहने लगा² । दिल्ली के मुग़ल बादशाह हुमायूं ने गुजरात के सुलतान बहादुरशाह को हराकर मालवा तथा गुजरात विजय कर लिया, परंतु उन्हीं दिनों उस- [हाशिया: हाजीख़ां की सहायतार्थ महाराणा के साथ कुंवर तेजसिंह को भेजना] ( हुमायूं ) के सरदार शेरखां ने बंगाल में विद्रोह कर दिया। इसपर हुमायूं ने मालवे की ओर से उधर प्रस्थान किया। वहां उसने विद्रोह को दबाने की चेष्टा की, पर उसमें सफलता नहीं हुई और शेरखां ने हुमायूं को परास्त कर दिल्ली की सलतनत पर अधिकार कर लिया तथा शेरशाह नाम से अपने को दिल्ली का स्वामी घोषित किया। वह केवल छः वर्ष ही राज्य करने पाया था कि उसका देहांत हो गया। उसके पीछे उसके वंशजों ( १ ) कैप्टेन सी० ई० येट; गैज़ेटियर ऑव् प्रतापगढ़; पृ० ७६ । मेजर के० डी० अर्सकिन; गैज़ेटियर ऑव् प्रतापगढ़ स्टेट; पृ० १६७ । ( २ ) कैप्टेन सी० ई० येट; गैज़ेटियर ऑव् प्रतापगढ़; पृ० ७६ । मेजर के० डी० अर्सकिन; गैज़ेटियर ऑव् प्रतापगढ़; पृ० १६७ ।