राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंने केवल दस वर्ष ही सलतनत का उपभोग किया और वि० सं० १६१२ (ई० स० १५५५) में सूर वंश के अंतिम बादशाह सिकंदरशाह से दिल्ली की सलतनत पीछे बादशाह हुमायूं ने छीन ली, किन्तु उसी वर्ष मस्जिद की सीढ़ी से गिर जाने के कारण हुमायूं की मृत्यु हो गई और उस(हुमायूं)- का पुत्र अकबर तेरह वर्ष की आयु में दिल्ली का स्वामी हुआ। उस समय मेवात (अलवर इलाक़ा) पर शेरशाह के गुलाम सेनापति हाजीखां का अधिकार था। वहां से उसको निकालने के लिए वादशाह ने पीरमुहम्मद संरवानी (नासिरुल्मुल्क) को ससैन्य रवाना किया। पीरमुहम्मद के पहुंचने पर हाजीखां भागकर अजमेर¹ चला गया, जहां उस समय (१) महाराणा विक्रमादित्य के समय गुजरात के सुलतान बहादुरशाह की चित्तौड़ पर चढ़ाई होने पर अजमेर पर भी गुजराती सलतनत का अधिकार हो गया था, परंतु वहां उसका अधिकार थोड़े समय तक ही रहा। बहादुरशाह की पराजय के पीछे दिल्ली के मुग़ल बादशाह हुमायूं के समय शेरखां पठान ने विद्रोह कर दिल्ली पर अधिकार कर लिया और अपना नाम शेरशाह रखा। इस अव्यवस्था से लाभ उठा मेड़ते के राव वीरमदेव ने अजमेर पर अधिकार कर लिया, परंतु वह अपना अधिकार वहां थोड़े दिन ही रख सका और जोधपुर के राव मालदेव ने उससे अजमेर छीन लिया। वि० सं० १६०० (ई० स० १५४३) में शेरशाह सूर की मालदेव पर चढ़ाई हुई, उस समय अजमेर राठोड़ों के हाथ से निकल गया। फिर शेरशाह सूर के पुत्र सलीमशाह सूर (इस्लामशाह) की मृत्यु के पीछे राव मालदेव ने पुनः वहां पर अधिकार करने के लिए अपनी सेना भेजी। इसपर शाही सेवकों ने, जो अजमेर में नियत थे, वि० सं० १६१० (ई० स० १५५३) में महाराणा उदयसिंह को चित्तौड़ से बुलाया। महाराणा ने वहां से राठोड़ों की सेना को हटाकर अपना अधिकार जमा लिया। हाजीखां से महाराणा की वि० सं० १६१३ (ई० स० १५५७) में हार हो जाने पर उसको अजमेर से निकालने के लिए बादशाह अकबर ने सेना भेजी, जिसने उसको निकालकर वहां अपना अधिकार स्थिर किया। लगभग १३२ वर्षों तक अजमेर पर मुग़ल सलतनत का अधिकार रहा। मुग़लों के शासनकाल में यह एक प्रधान सूवा था और राजपूताना के उदयपुर, जयपुर, जोधपुर आदि राज्य इस सूबे के अन्तर्गत थे। मुग़ल वादशाहत की अवनति के दिनों में