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राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

पृष्ठ 136, कुल 534 में से

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पृष्ठ 136

महारावत विक्रमसिंह ६३ महाराणा उदयसिंह का अधिकार था । महाराणा ने उस (हाजीखां) को वहां से अन्यत्र चले जाने के लिए कहलाया । इसपर हाजीखां ने अपना दूत भेज महाराणा से. निवेदन कराया कि मैं तो आपका सहारा समझ यहां आकर ठहरा हूं, परंतु जोधपुर का राव मालदेव मुझे लूटना चाहता है, इसलिए आप मेरी सहायता करें। राव मालदेव के समय शेरशाह सूर-द्वारा मारवाड़ पर चढ़ाई होकर जोधपुर कुछ समय के लिए उक्त राव के अधिकार- से निकल गया था, इस कारण मालदेव का सूर-खानदान तथा उसके आश्रितों से वैर होना स्वाभाविक था। हाजीखां के पास अतुल संपत्ति थी; अतएव राव मालदेव ने शेरशाह-द्वारा होनेवाली हानि का बदला लेने के लिए यह अवसर उपयुक्त समझा और हाजीखां के अजमेर पहुंचने पर उसने अपने सरदार पृथ्वीराज जैतावत ( बगड़ीवालों का पूर्वज ) की अध्यक्षता में अपनी सेना रवाना की । अकेले हाजीखां की राठोड़ों से सामना करने की सामर्थ्य न थी, इसलिए महाराणा की सहायता उसको अपेक्षित थी । महाराणा उदयसिंह और राव मालदेव के बीच अनबन थी; दूसरे हाजीखां ने उसको सहायता देने के एवज़ में चालीस मन सोना और कुछ हाथी भी देने का इक़रार किया था । फलतः वि० सं० १६१३ ( ई० स० १५५६ ) में हाजीखां की सहायतार्थ महाराणा स्वयं अपने कई बड़े सरदारों एवं डूंगरपुर के महारावल आसकरण, बांसवाड़ा के स्वामी जोधपुर के महाराजा अजीतसिंह और अभयसिंह ने यहां पर अधिकार जमाने का उद्योग किया । उसमें अभयसिंह सफल हुआ; परंतु फिर उससे जयपुर के महाराजा सवाई जयसिंह ने अजमेर ले लिया । जयसिंह की मृत्यु के बाद राठोड़ों ने पुनः वहां अधिकार किया, किंतु ग्वालियर के सिंधिया जय आपा को जोधपुर के महाराजा विजयसिंह ने वि० सं० १८१२ ( ई० स० १७५५ ) में छल से मरवा डाला। इसपर जनकूजी सिंधिया ने अपनी विशाल सेना के साथ मारवाड़ पर चढ़ाई की । तब विजयसिंह ने कई लाख रुपये सेना-व्यय के और अजमेर का ज़िला जनकूजी को देकर अपना पिंड छुड़ाया । फिर दौलतराव सिंधिया से वि० सं० १८७५ ( ई० स० १८१८ ) के लगभग अंग्रेज़ सरकार ने यह प्रांत ले लिया ।