राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
पृष्ठ 137, कुल 534 में से
संदर्भ में पढ़ें९४ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास प्रतापसिंह, बूंदी के राव सुरजन हाड़ा, रामपुरा के राव दुर्गा, राव जयमल मेड़तिया (मेड़ते का) आदि के साथ मालदेव की सेना के मुक़ाबले के लिए रवाना हुआ। महाराणा की इस बड़ी सेना में देवलिया के स्वामी विक्रमसिंह का कुंवर तेजसिंह भी अपनी सेना-सहित सम्मिलित हो गया था। इस अवसर पर बीकानेर के स्वामी राव कल्याणमल ने भी (जिसका हाजीखां से मेल और मालदेव से वैर था) अपनी सेना उस- (हाजीखां) की सहायतार्थ रवाना की, जिससे हाजीखां का बल बढ़ गया। महाराणा और हाजीखां के सम्मिलित कटक और बीकानेर की सैनिक- सहायता को देख जोधपुर के सरदारों ने अपने सेनापति पृथ्वीराज को समझाया कि राव मालदेव के अच्छे-अच्छे सरदार पहले ही काम आ गये हैं। यदि हम भी मारे गये तो राव का बल घट जायगा; क्योंकि हाजीखां के सहायकों की संख्या बहुत अधिक है और उससे सामना करने में बड़ी कठिनाई होगी इसलिए इस समय लौट जाना ही उचित होगा। इसपर वस्तु-स्थिति अपने अनुकूल न देख पृथ्वीराज बिना लड़े ही मारवाड़ की सेना-सहित लौट गया²। गुजरात के सुलतान बहादुरशाह के आक्रमण के पीछे मालवे पर दिल्ली की सलतनत का अधिकार हो गया; परंतु वह स्थिर भी न होने पाई (१) कविराजा बांकीदास-कृत 'ऐतिहासिक बातें' (संख्या १२६६) और मुंशी देवीप्रसाद-रचित 'महाराणा उदयसिंहजी का जीवनचरित्र' (पृ० ६५) में इस घटना के वर्णन में तेजसिंह को देवलिया का रावत लिखा है; परंतु वह वि० सं० १६१३ (ई० स० १५५६) में रावत नहीं हो सकता, क्योंकि उस समय उसका पिता विद्यमान था, जैसा कि आगे के वर्णन से स्पष्ट होगा। (२) जोधपुर राज्य की ख्यात (जि० १, पृ० ७४) में लिखा है कि वि० सं० १६११ में राव मालदेव ने मेड़ते पर चढ़ाई की, उस समय पृथ्वीराज मारा गया; परंतु इसके विरुद्ध नैणसी की ख्यात (भाग १, पृ० ५८-६) में यह लिखा है कि वह वि० सं० १६१३ में हाजीखां के विरुद्ध राव मालदेव की तरफ़ से अजमेर में सेना लेकर गया था, परन्तु महाराणा के हाजीखां की सहायतार्थ आ जाने पर लौट गया। अनन्तर मेड़ते में राव जयमल से युद्ध करता हुआ वह काम आया।