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राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

पृष्ठ 138, कुल 534 में से

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महारावत विक्रमसिंह ६५ थी कि शेरशाह का झगड़ा खड़ा हो जाने से हुमायूं ‧ विक्रमसिंह का सुहागपुरा को बंगाल में जाना पड़ा। उस समय (वि० सं० खेरोट, कोटड़ी, नीनोर, दलोट १५६२ = ई० स० १५३५. में) मालवे के ख़िलजी वंश और पलथाना पर अधिकार ‧ के सुलतान का गुलाम मल्लूखां, हुमायूं के अमीरों करना को निकालकर क़ादिर के नाम से वहां का सुल- तान बन गया¹। शेरशाह ने दिल्ली की सलतनत दृढ़ करने के उपरांत मालवे की तरफ़ बढ़कर हि० स० ६४६ (वि० सं० १६०० = ई० स० १५४३) में मल्लूखां को वहां से निकाल दिया और अपनी तरफ़ से शुजाखां (सजा- वलखां) को वहां का हाकिम नियत किया, जो शेरशाह सूर के वंशज मुहम्मदशाह सूर के समय स्वतंत्र होकर वहां का सुलतान बन बैठा²। मालवे में होनेवाले इन परिवर्त्तनों से विक्रमसिंह ने बड़ा लाभ उठाया और अपनी सत्ता कांठल पर सुदृढ़ कर ली। कांठल के निवासी मीणे बड़े निर्भय और स्वेच्छाचारी थे। वे मालवे के अतिरिक्त दूर-दूर तक लूट-खसोट ‧किया करते थे। इस कारण मालवे के मुसलमान हाकिमों को विक्रमसिंह- द्वारा कांठल पर सुदृढ़ अधिकार होकर उपद्रवी मीणों का दमन होने में ‧लाभ था । इन शक्तिशाली मीणों के पृथक्-पृथक् दल थे, जिनको विजय करने और अधीन रखने में बड़ी सेना की आवश्यकता थी, परंतु उधर की आय इतनी अधिक नहीं होने से मालवे के मुसलमान हाकिम सर्वदा उदासीन रहते थे, अतएव विक्रमसिंह के कांठल के मीणों को दबाने से वे उसके विरोधी नहीं हुए। फिर उसने अपने बाहुबल से थोड़े समय में ही उपद्रवी मीणों के कई मुखियों को मारकर वहां पर अपनी प्रभुता स्थापित की, जिससे शांति स्थापित होकर लूट-खसोट कम हो गई। विक्रमसिंह- द्वारा मीणों को दबाने का मालवे के मुसलमान हाकिमों पर अच्छा प्रभाव ःपड़ा और उसने भी उनसे मैत्री स्थापित कर उनको अपना सहायक बना (१) नागरी प्रचारिणी (त्रैमासिक) पत्रिका, काशी (नवीन संस्करण); भाग ३, पृ० १७० । (२) वही; पृ० १७० ।

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