भारतकोश
राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

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६६ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास

लिया । इससे उसको वहां अपना क्षेत्र विस्तीर्ण करने का अच्छा अवसर मिल गया। उसने देवलिया से दक्षिण और दक्षिण-पूर्व में गयासपुर के निकट बसनेवाले राजपूतों को भी, जो मीणाओं के साथ लूट-खसोट में भाग लिया करते थे, दबाकर सोनगरे चौहानों से सुहागपुरा तथा जलखेड़िया, राठोड़ों से खरोट, डोडियों से कोटड़ी, प्रतिहारों से नीनोर एवं दलोट तथा मुसल- मानों से पलथाना छीन लिये¹। सुहागपुरा के इलाक़े पर अधिकार करने के समय सैंसमल (सूरजमल का कुंवर) के चार पुत्र अक्षयराज, पीथा, देवीसिंह और उदयसिंह काम आये²। तदनन्तर उसने वि० सं० १६१७ (ई० स० १५६०) के लगभग देवलिया में रहना स्थिर किया³। ख्यातों तथा 'वीरविनोद' में लिखा है कि विक्रमसिंह ने भामरख्या मीणा को मारकर देवलिया की भूमि पर अधिकार किया और उसकी [हाशिया: ख्यातें और देवी मीणी की] स्त्री देवी उसके साथ सती होने लगी, तब उसने [हाशिया: स्मृति में देवलिया बसाने] उसकी स्मृति को जीवित रखने के लिए उसके [हाशिया: की कथा] नाम पर देवलिया क़सबा बसाकर वहां अपनी राजधानी नियत की⁴। प्रतापगढ़ राज्य के गैज़े- टियरों में भी ऐसा ही वृत्तांत है, परंतु वहां भामरख्या मीणा की मृत्यु पर देवी मीणी के सती होने का कुछ भी उल्लेख नहीं कर देवी मीणी के मारे


(१) कैप्टेन सी० ई० येट; गैज़ेटियर ऑफ़ प्रतापगढ़ (ई० स० १८८०); पृ० ७६। मेजर के० डी० अर्सकिन; गैज़ेटियर ऑफ़ प्रतापगढ़; पृ० १६७। वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० १०५६। प्रतापगढ़ राज्य की एक पुरानी ख्यात; पृ० ३। (२) प्रतापगढ़ राज्य की एक पुरानी ख्यात; पृ० ३। (३) कैप्टेन सी० ई० येट; गैज़ेटियर ऑफ़ प्रतापगढ़ (ई० स० १८८०); पृ० ७६। मेजर के० डी० अर्सकिन; गैज़ेटियर ऑफ़ प्रतापगढ़ पृ० १६८। वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० १०५५। प्रतापगढ़ राज्य की एक पुरानी ख्यात; पृ० ३। (४) प्रतापगढ़ राज्य की एक पुरानी ख्यात; पृ० २। वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० १०५५।