भारतकोश
राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

पृष्ठ 140, कुल 534 में से

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पृष्ठ 140

जाने पर उसके नाम से देवलिया क़सबा बसाने का वर्णन किया है¹ । मुंहणोत नैणसी रावत विक्रमसिंह के प्रसङ्ग में लिखता है—"उस- (विक्रमसिंह)को राणा उदयसिंह ने अपने देश से निकाल दिया, तब वह गांव बड़ेरी में आसारण नामक मेरों की दादी के पास गया । उस बड़ेरी (वृद्धा) का मेर बड़ा आदर करते थे। पहले तो मेरों ने उसे वहां न ठहरने दिया, परंतु जब उसने सौगंध-शपथ खाकर उनको विश्वास दिलाया, तब वह रहने पाया । अन्त में होली के दिन वीका(विक्रमसिंह) ने दग़ा कर सब मेरों को मार डाला और देवलिया लिया । आसारण के वंशजों के पास अब तक एक गांव जागीर में है और उनका बड़ा भरोसा है²।″ नैणसी की ख्यात प्रतापगढ़ राज्य की ख्यातों की अपेक्षा प्राचीनता की दृष्टि से विशेष महत्व रखती है । ऐसी दशा में अन्य ख्यातों आदि का सारा कथन कपोल-कल्पित ठहरता है । जैसा कि ऊपर (पृ० १७ में) बतलाया गया है देवलिया पर महारावत सूरजमल के समय ही अधिकार हो गया था । संभव है कि बाघसिंह और रायसिंह का उस ओर अधिक ध्यान न रहने से वहां के आदिम निवासी मीणे उच्छृंखल हो गये हों, जिनको विक्रमसिंह ने, दबाकर अधीन किया हो । विक्रमसिंह के कांठल और उसके समीपवर्ती इलाक़ों पर अधिकार करने के समय उसका पितृव्य कांधल (सैंसमल का पुत्र), जिसको मेवाड़- कांधल को धमोतर, राज्य की तरफ़ से नींबाहेड़ा की जागीर थी, अपनी सुरताणसिंह को ढोढरयाखेड़ा जागीर छोड़कर उसके साथ चला गया । इसी और विजयसिंह को खैरोट प्रकार सुरताणसिंह(रणमल का पुत्र और सूरजमल की जागीर देना का पौत्र) ने मेवाड़ में प्राप्त करजू की जागीर छोड़कर उसको सहायता दी । इसके एवज़ में विक्रमसिंह ने अपने राज्य की स्थिति सुदृढ़ हो जाने पर कांधल को धमोतर की, सुरताणसिंह को


(१) कैप्टेन सी० ई० येट; गैज़ेटियर ऑव् प्रतापगढ़ (ई० स० १८८०); पृ० ७६ । मेजर के० डी० अर्सकिन; गैज़ेटियर ऑव् प्रतापगढ़; पृ० २२२ । (२) मुंहणोत नैणसी की ख्यात; प्रथम भाग, पृ० ६४-५ । १३