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राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

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६८ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास ढोढरख्याखेड़ा (जिसको अब कल्याणपुरा कहते हैं) की तथा कांठल के भाई उदयसिंह के पुत्र विजयसिंह को खेरोट की जागीरें देकर अपना सरदार बनाया¹। वागड़ के स्वामी महारावल उदयसिंह ने अपने दो पुत्रों में से ज्येष्ठ पुत्र पृथ्वीराज को डूंगरपुर का राज्य दिया था और छोटे पुत्र जगमाल को (जिसकी माता पर महारावल का अधिक प्रेम [हाशिया: बांसवाड़ा के स्वामी] था) वागड़ का पूर्वी भाग देकर अपनी विद्यमानता [हाशिया: 'प्रतापसिंह की तरफ़ रहकर] में ही उसको बांसवाड़ा का पृथक् राजा बना दिया [हाशिया: डूंगरपुर के महारावल] था। वि० सं० १५८४ (ई० स० १५२८) केः खानवे [हाशिया: आसकरण से युद्ध करना] के युद्ध में उदयसिंह का परलोकवास होने पर उन दोनों भाइयों में विरोध हो गया और कई लड़ाइयां हुईं। फिर गुजरात के सुलतान बहादुरशाह ने मही नदी का पूर्वी भाग जगमाल के और पश्चिमी भाग पृथ्वीराज के रख- कर यह बखेड़ा तय करा दिया। जगमाल की मृत्यु पर उसका दूसरा पुत्र जयसिंह बांसवाड़े का स्वामी हुआ और ज्येष्ठ पुत्र किशनसिंह तथा उसके वंशज राज्य से वंचित रहे। जयसिंह का देहांत होने पर बांसवाड़े की गद्दी पर प्रतापसिंह बैठा। उसके समय में डूंगरपुर और बांसवाड़ा के बीच फिर विरोध की अग्नि भड़क उठी तथा डूंगरपुर के स्वामी महारावल आसकरण ने बांसवाड़े पर अधिकार कर लिया²। 'हरिभूषण महाकाव्य' का कर्त्ता कवि गंगाराम लिखता है— “महारावत प्रतापसिंह और महारावत विक्रमसिंह धर्म-बंधु (पगड़ी बदल भाई) थे। इसलिए प्रतापसिंह पर विपत्ति देख विक्रमसिंह ने उसकी सहायतार्थ प्रस्थान किया। इस युद्ध में वागड़ के अधिकांश चौहान सरदार आसकरण की तरफ़ थे, जिनसे मही नदी के तट पर विक्रमसिंह


(१) प्रतापगढ़ राज्य की एक पुरानी ख्यात; पृ० ३। ढोढरख्याखेड़ा का नाम पीछे से ठाकुर कल्याणसिंह के नाम पर कल्याणपुरा रक्खा गया। (२) देखो मेरा राजपूताने का इतिहास; जिल्द ३, भाग १ (डूंगरपुर राज्य का इतिहास), पृ० ६७-८ तथा भाग २ (बांसवाड़ा राज्य का इतिहास), पृ० ७५-६।