राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८८ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास सब सरदारों ने मिलकर कुंभलगढ़ में ही वि० सं० १५६४ (ई० स० १५३७) में उदयसिंह को गद्दी पर बिठालाने का दस्तूर किया। उस समय उदयसिंह की आयु लगभग पंद्रह-सोलह वर्ष की हो चुकी थी, इसलिए सरदारों ने पाली के सोनगरे अखैराज की पुत्री के साथ उसका विवाह भी कर दिया। तदनंतर चित्तौड़ से वनवीर को निकालने के लिए सलाह कर सेना एकत्रित करने की आयोजना की गई। महाराणा के इस विचार की ख़बर फैलते ही चारों तरफ़ से सैनिक आने लगे और उसके कुटुंबियों के अतिरिक्त प्रजा भी उसको देखने के लिए आतुर हो उठी। कुछ ही समय में ईडर का राव भारमल, बूंदी का हाड़ा राव सुलतान, डूंगरपुर का कुंवर आसकरण, बांसवाड़े का महारावल जगमाल एवं महारावत रायसिंह आदि अपने राजपूतों को लेकर उदयसिंह की सहायतार्थ जा पहुंचे¹। उधर वनवीर भी यह समाचार पाकर अपनी सेना-सहित मुक़ाबले के लिए गया। माहोली (मावली) के पास दोनों सेनाओं में युद्ध हुआ जिसमें महाराणा की विजय हुई। अनन्तर ताणा-नामक स्थान पर अधिकार कर महाराणा चालीस हज़ार सेना के साथ चित्तौड़ पहुंचा, परंतु साथ में, तोपखाना न था। इसलिए घेरा डालने पर भी क़िले पर अधिकार करने में कठिनाइयां होने लगीं। तब महाराणा के प्रधान आशाशाह देपुरा ने वनवीर के प्रधान चील मेहता को मिलाकर रात्रि में दुर्ग के द्वार खुलवा दिये, जिससे महाराणा की सेना ने भीतर प्रवेश कर वि० सं० १५६७ (ई० स० १५४०) में वहां अधिकार कर लिया। महारावत रायसिंह के समय का शेष इतिहास भी उसके पूर्वजों के इतिहास के समान अंधकार में विलीन है। प्रतापगढ़ राज्य के बड़वे की रायसिंह का देहांत और ख्यात तथा अन्य ख्यातों में लिखा है कि रायसिंह उसकी संतति का वि० सं० १६०६ (ई० स० १५५२) में देहांत हुआ²। उसके चार कुंवर-विक्रमसिंह (वीका), (१) वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० ६३ । (२) एक ख्यात में रायसिंह का साटोले के खेड़े में देहांत होने का उल्लेख