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राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

८८ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास सब सरदारों ने मिलकर कुंभलगढ़ में ही वि० सं० १५६४ (ई० स० १५३७) में उदयसिंह को गद्दी पर बिठालाने का दस्तूर किया। उस समय उदयसिंह की आयु लगभग पंद्रह-सोलह वर्ष की हो चुकी थी, इसलिए सरदारों ने पाली के सोनगरे अखैराज की पुत्री के साथ उसका विवाह भी कर दिया। तदनंतर चित्तौड़ से वनवीर को निकालने के लिए सलाह कर सेना एकत्रित करने की आयोजना की गई। महाराणा के इस विचार की ख़बर फैलते ही चारों तरफ़ से सैनिक आने लगे और उसके कुटुंबियों के अतिरिक्त प्रजा भी उसको देखने के लिए आतुर हो उठी। कुछ ही समय में ईडर का राव भारमल, बूंदी का हाड़ा राव सुलतान, डूंगरपुर का कुंवर आसकरण, बांसवाड़े का महारावल जगमाल एवं महारावत रायसिंह आदि अपने राजपूतों को लेकर उदयसिंह की सहायतार्थ जा पहुंचे¹। उधर वनवीर भी यह समाचार पाकर अपनी सेना-सहित मुक़ाबले के लिए गया। माहोली (मावली) के पास दोनों सेनाओं में युद्ध हुआ जिसमें महाराणा की विजय हुई। अनन्तर ताणा-नामक स्थान पर अधिकार कर महाराणा चालीस हज़ार सेना के साथ चित्तौड़ पहुंचा, परंतु साथ में, तोपखाना न था। इसलिए घेरा डालने पर भी क़िले पर अधिकार करने में कठिनाइयां होने लगीं। तब महाराणा के प्रधान आशाशाह देपुरा ने वनवीर के प्रधान चील मेहता को मिलाकर रात्रि में दुर्ग के द्वार खुलवा दिये, जिससे महाराणा की सेना ने भीतर प्रवेश कर वि० सं० १५६७ (ई० स० १५४०) में वहां अधिकार कर लिया। महारावत रायसिंह के समय का शेष इतिहास भी उसके पूर्वजों के इतिहास के समान अंधकार में विलीन है। प्रतापगढ़ राज्य के बड़वे की रायसिंह का देहांत और ख्यात तथा अन्य ख्यातों में लिखा है कि रायसिंह उसकी संतति का वि० सं० १६०६ (ई० स० १५५२) में देहांत हुआ²। उसके चार कुंवर-विक्रमसिंह (वीका), (१) वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० ६३ । (२) एक ख्यात में रायसिंह का साटोले के खेड़े में देहांत होने का उल्लेख

महारावत रायसिंह ८६ उदयकरण, आसकरण और पूरणमल तथा एक पुत्री किशनकुंवरी हुई१ । 'हरिभूषण महाकाव्य' से पाया जाता है कि रायसिंह अपने पूर्वजों के समान वीर, नीतिनिपुण और कवियों का सम्मान करनेवाला था । उसकी प्रजा सम्पन्न थी । उसने कई तालाब और उद्यान बनवाये थे । चारण कवियों का उसके यहां बड़ा प्रभाव था और वह उनको दान देने में न अघाता था२ । उस ( रायसिंह )का कोई शिलालेख अथवा दानपत्र नहीं मिला है, अतएव उसके इतिहास पर अधिक प्रकाश डालना कठिन ही नहीं एक प्रकार से असंभव है । मिलता है और यह भी लिखा है कि वि० सं० १६०७ (ई० स० १५५०) में महाराणा उदयसिंह के समय सादड़ी की जागीर छूट गई थी, परंतु अधिकांश स्थलों पर सादड़ी की जागीर रायसिंह के पुत्र विक्रमसिंह( बीका ) के समय छूटना लिखा मिलता है, जिससे उस ( विक्रमसिंह )के प्रसङ्ग में इस घटना को विस्तृत रूप से लिखा जायगा । ( १ ) प्रतापगढ़ राज्य के बड़वे की ख्यात; पृ० . २ । ( २ ) वैरीवीरवनिताकुचान्तरे स्वेददुर्धनपटीरकर्दमम् । साध्वसानलशिखाप्रतापिते यन्निशम्य मिलितारिसूदनम्॥ २४॥ येन भूतलमियं महीभृता सर्वतो गतदरिद्रलेशकम् । पूरितं सकलद्रव्यसम्पदा स्वर्गपत्तनमिव व्यशोभत ॥ २५ ॥ वाटिकाः कति महीभृता स्वयं कारिताः कति सरोवराण्यपि । धर्मराज इव भूतले बभौ याचमानजनदानतत्परः ॥ २६ ॥ यः कवीश्वरप्रभावशुम्वदो लोकलोचनसुखाकरो बभौ । न्यूनदानमपि लक्षसंख्यया येन दत्तमिह भूतले सदा ॥२७॥ चारणैरतितरां निषेवितः संस्तुतः कविजनैः समन्ततः । रञ्जयन्निजगुणैः कवीश्वरान् भासमान इह भानुवद्वभौ ॥२८॥ सर्ग ५ । १२

६०. प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास विक्रमसिंह (बीका) रायसिंह का परलोकवास होने पर वि० सं० १६०६ (ई० स० १५५२) के लगभग उसका ज्येष्ठ कुंवर विक्रमसिंह, जिसको बीका भी कहते हैं, [राज्य-प्राप्ति] कांठल एवं मेवाड़ में अपने पिता की संपत्ति सादड़ी आदि का अधिकारी हुआ१ । उसका जन्म वि० सं० १५८२ ( ई० स० १५२५ ) में होना माना जाता है२ । ऊपर महारावत रायसिंह के प्रसङ्ग में बतलाया गया है कि धाय पन्ना- द्वारा बाल्यावस्था में महाराणा उदयसिंह, विक्रमादित्य की मृत्यु हो जाने पर, [सादड़ी की जागीर छूट जाने पर विक्रमसिंह का कांठल में जाना] रायसिंह के पास पहुंचाया गया था; परंतु उसने बनवीर के भय से उस समय विशेष सहायता न दी और उसको डूंगरपुर पहुंचा दिया । इसके पीछे कुंभलगढ़ में सरदारों के जा मिलने पर महाराणा, बनवीर को निकालने में समर्थ हुआ और वि० सं० १५९७ ( ई० स० १५४० ) में चित्तौड़ की तरफ़ बढ़ा । उस समय रायसिंह भी उक्त महाराणा की सहायतार्थ अपनी सेना- सहित सम्मिलित हुआ था । चित्तौड़गढ़ पर अपनी सत्ता दृढ़ हो जाने के उपरांत महाराणा ने रायसिंह की इस सेवा को विस्मरण कर दिया और ( १ ) प्रतापगढ़ राज्य की एक पुरानी ख्यात; पृ० २ । प्रतापगढ़ राज्य के बड़वे की ख्यात; पृ० २ । ( २ ) प्रतापगढ़ के पहले के राजाओं के जन्म-संवत् अब तक नहीं मिले हैं । ऊपर विक्रमसिंह का जो जन्म-संवत् दिया गया है, वह पंडित जगन्नाथ शास्त्री की भेजी हुई एक याददाश्त के आधार पर है । उसमें तिथि और वार नहीं दिया है और न उस- ( विक्रमसिंह ) की कोई जन्म-कुंडली देखने में आई है । ऐसी दशा में उसका जन्म-संवत् १५८२ ठीक है अथवा नहीं, यह निश्चयपूर्वक नहीं कहा जा सकता । इसकी पुष्टि में जब तक कोई दूसरा प्रमाण न मिले, तब तक इसे आनुमानिक ही मानना पड़ेगा । विक्रमसिंह प्रतापगढ़ के राजवंश के मूलपुरुष क्षेमकर्ण का पांचवां वंशधर था । क्षेमकर्ण और रायसिंह ( विक्रमसिंह के पिता ) तक के समयक्रम पर विचार करने से तो विक्रमसिंह का जन्म-संवत् १५८२ होना संभव जान पड़ता है ।

महारावत विक्रमसिंह ६१ अपनी बाल्यावस्था के समय उस ( रायसिंह ) के द्वारा सहायता न मिलने की बात को स्मरण कर वह उससे अप्रसन्न रहने लगा। संयोगवश रायसिंह का देहांत हो गया। तब विक्रमसिंह के सादड़ी आदि का स्वामी होने पर महाराणा उससे छेड़-छाड़ करने लगा और सादड़ी आदि की जागीर उसने राज्य- में मिला ली। महाराणा उदयसिंह अपने भाई विक्रमादित्य की अपेक्षा अच्छा शासक था। राजपूताना के कई नरेश उसको अपना नेता मानते थे एवं उसने मेवाड़ के अतीत गौरव को थोड़ा-बहुत चमका दिया था। ऐसी अवस्था में उदयसिंह से मुक़ाबला करने में विक्रमसिंह को हानि की ही संभावना थी, अतएव उसने बलपूर्वक सादड़ी की जागीर अपने अधिकार में रखना श्रेयस्कर न समझा और महाराणा के सादड़ी की जागीर ले लेने पर वह वि० सं० १६१० ( ई० स० १५५३ ) के लगभग मेवाड़ का सदा के लिए परित्याग कर¹, स्वाधीनतापूर्वक जीवन व्यतीत- करने की भावना से अपने पितामह सूरजमल-द्वारा जीते हुए कांठल प्रदेश में चला गया तथा वहां की स्थिति को सुदृढ़ कर रायासपुर में रहने लगा² । दिल्ली के मुग़ल बादशाह हुमायूं ने गुजरात के सुलतान बहादुरशाह को हराकर मालवा तथा गुजरात विजय कर लिया, परंतु उन्हीं दिनों उस- [हाशिया: हाजीख़ां की सहायतार्थ महाराणा के साथ कुंवर तेजसिंह को भेजना] ( हुमायूं ) के सरदार शेरखां ने बंगाल में विद्रोह कर दिया। इसपर हुमायूं ने मालवे की ओर से उधर प्रस्थान किया। वहां उसने विद्रोह को दबाने की चेष्टा की, पर उसमें सफलता नहीं हुई और शेरखां ने हुमायूं को परास्त कर दिल्ली की सलतनत पर अधिकार कर लिया तथा शेरशाह नाम से अपने को दिल्ली का स्वामी घोषित किया। वह केवल छः वर्ष ही राज्य करने पाया था कि उसका देहांत हो गया। उसके पीछे उसके वंशजों ( १ ) कैप्टेन सी० ई० येट; गैज़ेटियर ऑव् प्रतापगढ़; पृ० ७६ । मेजर के० डी० अर्सकिन; गैज़ेटियर ऑव् प्रतापगढ़ स्टेट; पृ० १६७ । ( २ ) कैप्टेन सी० ई० येट; गैज़ेटियर ऑव् प्रतापगढ़; पृ० ७६ । मेजर के० डी० अर्सकिन; गैज़ेटियर ऑव् प्रतापगढ़; पृ० १६७ ।

ने केवल दस वर्ष ही सलतनत का उपभोग किया और वि० सं० १६१२ (ई० स० १५५५) में सूर वंश के अंतिम बादशाह सिकंदरशाह से दिल्ली की सलतनत पीछे बादशाह हुमायूं ने छीन ली, किन्तु उसी वर्ष मस्जिद की सीढ़ी से गिर जाने के कारण हुमायूं की मृत्यु हो गई और उस(हुमायूं)- का पुत्र अकबर तेरह वर्ष की आयु में दिल्ली का स्वामी हुआ। उस समय मेवात (अलवर इलाक़ा) पर शेरशाह के गुलाम सेनापति हाजीखां का अधिकार था। वहां से उसको निकालने के लिए वादशाह ने पीरमुहम्मद संरवानी (नासिरुल्मुल्क) को ससैन्य रवाना किया। पीरमुहम्मद के पहुंचने पर हाजीखां भागकर अजमेर¹ चला गया, जहां उस समय (१) महाराणा विक्रमादित्य के समय गुजरात के सुलतान बहादुरशाह की चित्तौड़ पर चढ़ाई होने पर अजमेर पर भी गुजराती सलतनत का अधिकार हो गया था, परंतु वहां उसका अधिकार थोड़े समय तक ही रहा। बहादुरशाह की पराजय के पीछे दिल्ली के मुग़ल बादशाह हुमायूं के समय शेरखां पठान ने विद्रोह कर दिल्ली पर अधिकार कर लिया और अपना नाम शेरशाह रखा। इस अव्यवस्था से लाभ उठा मेड़ते के राव वीरमदेव ने अजमेर पर अधिकार कर लिया, परंतु वह अपना अधिकार वहां थोड़े दिन ही रख सका और जोधपुर के राव मालदेव ने उससे अजमेर छीन लिया। वि० सं० १६०० (ई० स० १५४३) में शेरशाह सूर की मालदेव पर चढ़ाई हुई, उस समय अजमेर राठोड़ों के हाथ से निकल गया। फिर शेरशाह सूर के पुत्र सलीमशाह सूर (इस्लामशाह) की मृत्यु के पीछे राव मालदेव ने पुनः वहां पर अधिकार करने के लिए अपनी सेना भेजी। इसपर शाही सेवकों ने, जो अजमेर में नियत थे, वि० सं० १६१० (ई० स० १५५३) में महाराणा उदयसिंह को चित्तौड़ से बुलाया। महाराणा ने वहां से राठोड़ों की सेना को हटाकर अपना अधिकार जमा लिया। हाजीखां से महाराणा की वि० सं० १६१३ (ई० स० १५५७) में हार हो जाने पर उसको अजमेर से निकालने के लिए बादशाह अकबर ने सेना भेजी, जिसने उसको निकालकर वहां अपना अधिकार स्थिर किया। लगभग १३२ वर्षों तक अजमेर पर मुग़ल सलतनत का अधिकार रहा। मुग़लों के शासनकाल में यह एक प्रधान सूवा था और राजपूताना के उदयपुर, जयपुर, जोधपुर आदि राज्य इस सूबे के अन्तर्गत थे। मुग़ल वादशाहत की अवनति के दिनों में

महारावत विक्रमसिंह ६३ महाराणा उदयसिंह का अधिकार था । महाराणा ने उस (हाजीखां) को वहां से अन्यत्र चले जाने के लिए कहलाया । इसपर हाजीखां ने अपना दूत भेज महाराणा से. निवेदन कराया कि मैं तो आपका सहारा समझ यहां आकर ठहरा हूं, परंतु जोधपुर का राव मालदेव मुझे लूटना चाहता है, इसलिए आप मेरी सहायता करें। राव मालदेव के समय शेरशाह सूर-द्वारा मारवाड़ पर चढ़ाई होकर जोधपुर कुछ समय के लिए उक्त राव के अधिकार- से निकल गया था, इस कारण मालदेव का सूर-खानदान तथा उसके आश्रितों से वैर होना स्वाभाविक था। हाजीखां के पास अतुल संपत्ति थी; अतएव राव मालदेव ने शेरशाह-द्वारा होनेवाली हानि का बदला लेने के लिए यह अवसर उपयुक्त समझा और हाजीखां के अजमेर पहुंचने पर उसने अपने सरदार पृथ्वीराज जैतावत ( बगड़ीवालों का पूर्वज ) की अध्यक्षता में अपनी सेना रवाना की । अकेले हाजीखां की राठोड़ों से सामना करने की सामर्थ्य न थी, इसलिए महाराणा की सहायता उसको अपेक्षित थी । महाराणा उदयसिंह और राव मालदेव के बीच अनबन थी; दूसरे हाजीखां ने उसको सहायता देने के एवज़ में चालीस मन सोना और कुछ हाथी भी देने का इक़रार किया था । फलतः वि० सं० १६१३ ( ई० स० १५५६ ) में हाजीखां की सहायतार्थ महाराणा स्वयं अपने कई बड़े सरदारों एवं डूंगरपुर के महारावल आसकरण, बांसवाड़ा के स्वामी जोधपुर के महाराजा अजीतसिंह और अभयसिंह ने यहां पर अधिकार जमाने का उद्योग किया । उसमें अभयसिंह सफल हुआ; परंतु फिर उससे जयपुर के महाराजा सवाई जयसिंह ने अजमेर ले लिया । जयसिंह की मृत्यु के बाद राठोड़ों ने पुनः वहां अधिकार किया, किंतु ग्वालियर के सिंधिया जय आपा को जोधपुर के महाराजा विजयसिंह ने वि० सं० १८१२ ( ई० स० १७५५ ) में छल से मरवा डाला। इसपर जनकूजी सिंधिया ने अपनी विशाल सेना के साथ मारवाड़ पर चढ़ाई की । तब विजयसिंह ने कई लाख रुपये सेना-व्यय के और अजमेर का ज़िला जनकूजी को देकर अपना पिंड छुड़ाया । फिर दौलतराव सिंधिया से वि० सं० १८७५ ( ई० स० १८१८ ) के लगभग अंग्रेज़ सरकार ने यह प्रांत ले लिया ।

९४ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास प्रतापसिंह, बूंदी के राव सुरजन हाड़ा, रामपुरा के राव दुर्गा, राव जयमल मेड़तिया (मेड़ते का) आदि के साथ मालदेव की सेना के मुक़ाबले के लिए रवाना हुआ। महाराणा की इस बड़ी सेना में देवलिया के स्वामी विक्रमसिंह का कुंवर तेजसिंह भी अपनी सेना-सहित सम्मिलित हो गया था। इस अवसर पर बीकानेर के स्वामी राव कल्याणमल ने भी (जिसका हाजीखां से मेल और मालदेव से वैर था) अपनी सेना उस- (हाजीखां) की सहायतार्थ रवाना की, जिससे हाजीखां का बल बढ़ गया। महाराणा और हाजीखां के सम्मिलित कटक और बीकानेर की सैनिक- सहायता को देख जोधपुर के सरदारों ने अपने सेनापति पृथ्वीराज को समझाया कि राव मालदेव के अच्छे-अच्छे सरदार पहले ही काम आ गये हैं। यदि हम भी मारे गये तो राव का बल घट जायगा; क्योंकि हाजीखां के सहायकों की संख्या बहुत अधिक है और उससे सामना करने में बड़ी कठिनाई होगी इसलिए इस समय लौट जाना ही उचित होगा। इसपर वस्तु-स्थिति अपने अनुकूल न देख पृथ्वीराज बिना लड़े ही मारवाड़ की सेना-सहित लौट गया²। गुजरात के सुलतान बहादुरशाह के आक्रमण के पीछे मालवे पर दिल्ली की सलतनत का अधिकार हो गया; परंतु वह स्थिर भी न होने पाई (१) कविराजा बांकीदास-कृत 'ऐतिहासिक बातें' (संख्या १२६६) और मुंशी देवीप्रसाद-रचित 'महाराणा उदयसिंहजी का जीवनचरित्र' (पृ० ६५) में इस घटना के वर्णन में तेजसिंह को देवलिया का रावत लिखा है; परंतु वह वि० सं० १६१३ (ई० स० १५५६) में रावत नहीं हो सकता, क्योंकि उस समय उसका पिता विद्यमान था, जैसा कि आगे के वर्णन से स्पष्ट होगा। (२) जोधपुर राज्य की ख्यात (जि० १, पृ० ७४) में लिखा है कि वि० सं० १६११ में राव मालदेव ने मेड़ते पर चढ़ाई की, उस समय पृथ्वीराज मारा गया; परंतु इसके विरुद्ध नैणसी की ख्यात (भाग १, पृ० ५८-६) में यह लिखा है कि वह वि० सं० १६१३ में हाजीखां के विरुद्ध राव मालदेव की तरफ़ से अजमेर में सेना लेकर गया था, परन्तु महाराणा के हाजीखां की सहायतार्थ आ जाने पर लौट गया। अनन्तर मेड़ते में राव जयमल से युद्ध करता हुआ वह काम आया।

महारावत विक्रमसिंह ६५ थी कि शेरशाह का झगड़ा खड़ा हो जाने से हुमायूं ‧ विक्रमसिंह का सुहागपुरा को बंगाल में जाना पड़ा। उस समय (वि० सं० खेरोट, कोटड़ी, नीनोर, दलोट १५६२ = ई० स० १५३५. में) मालवे के ख़िलजी वंश और पलथाना पर अधिकार ‧ के सुलतान का गुलाम मल्लूखां, हुमायूं के अमीरों करना को निकालकर क़ादिर के नाम से वहां का सुल- तान बन गया¹। शेरशाह ने दिल्ली की सलतनत दृढ़ करने के उपरांत मालवे की तरफ़ बढ़कर हि० स० ६४६ (वि० सं० १६०० = ई० स० १५४३) में मल्लूखां को वहां से निकाल दिया और अपनी तरफ़ से शुजाखां (सजा- वलखां) को वहां का हाकिम नियत किया, जो शेरशाह सूर के वंशज मुहम्मदशाह सूर के समय स्वतंत्र होकर वहां का सुलतान बन बैठा²। मालवे में होनेवाले इन परिवर्त्तनों से विक्रमसिंह ने बड़ा लाभ उठाया और अपनी सत्ता कांठल पर सुदृढ़ कर ली। कांठल के निवासी मीणे बड़े निर्भय और स्वेच्छाचारी थे। वे मालवे के अतिरिक्त दूर-दूर तक लूट-खसोट ‧किया करते थे। इस कारण मालवे के मुसलमान हाकिमों को विक्रमसिंह- द्वारा कांठल पर सुदृढ़ अधिकार होकर उपद्रवी मीणों का दमन होने में ‧लाभ था । इन शक्तिशाली मीणों के पृथक्-पृथक् दल थे, जिनको विजय करने और अधीन रखने में बड़ी सेना की आवश्यकता थी, परंतु उधर की आय इतनी अधिक नहीं होने से मालवे के मुसलमान हाकिम सर्वदा उदासीन रहते थे, अतएव विक्रमसिंह के कांठल के मीणों को दबाने से वे उसके विरोधी नहीं हुए। फिर उसने अपने बाहुबल से थोड़े समय में ही उपद्रवी मीणों के कई मुखियों को मारकर वहां पर अपनी प्रभुता स्थापित की, जिससे शांति स्थापित होकर लूट-खसोट कम हो गई। विक्रमसिंह- द्वारा मीणों को दबाने का मालवे के मुसलमान हाकिमों पर अच्छा प्रभाव ःपड़ा और उसने भी उनसे मैत्री स्थापित कर उनको अपना सहायक बना (१) नागरी प्रचारिणी (त्रैमासिक) पत्रिका, काशी (नवीन संस्करण); भाग ३, पृ० १७० । (२) वही; पृ० १७० ।

६६ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास

लिया । इससे उसको वहां अपना क्षेत्र विस्तीर्ण करने का अच्छा अवसर मिल गया। उसने देवलिया से दक्षिण और दक्षिण-पूर्व में गयासपुर के निकट बसनेवाले राजपूतों को भी, जो मीणाओं के साथ लूट-खसोट में भाग लिया करते थे, दबाकर सोनगरे चौहानों से सुहागपुरा तथा जलखेड़िया, राठोड़ों से खरोट, डोडियों से कोटड़ी, प्रतिहारों से नीनोर एवं दलोट तथा मुसल- मानों से पलथाना छीन लिये¹। सुहागपुरा के इलाक़े पर अधिकार करने के समय सैंसमल (सूरजमल का कुंवर) के चार पुत्र अक्षयराज, पीथा, देवीसिंह और उदयसिंह काम आये²। तदनन्तर उसने वि० सं० १६१७ (ई० स० १५६०) के लगभग देवलिया में रहना स्थिर किया³। ख्यातों तथा 'वीरविनोद' में लिखा है कि विक्रमसिंह ने भामरख्या मीणा को मारकर देवलिया की भूमि पर अधिकार किया और उसकी [हाशिया: ख्यातें और देवी मीणी की] स्त्री देवी उसके साथ सती होने लगी, तब उसने [हाशिया: स्मृति में देवलिया बसाने] उसकी स्मृति को जीवित रखने के लिए उसके [हाशिया: की कथा] नाम पर देवलिया क़सबा बसाकर वहां अपनी राजधानी नियत की⁴। प्रतापगढ़ राज्य के गैज़े- टियरों में भी ऐसा ही वृत्तांत है, परंतु वहां भामरख्या मीणा की मृत्यु पर देवी मीणी के सती होने का कुछ भी उल्लेख नहीं कर देवी मीणी के मारे


(१) कैप्टेन सी० ई० येट; गैज़ेटियर ऑफ़ प्रतापगढ़ (ई० स० १८८०); पृ० ७६। मेजर के० डी० अर्सकिन; गैज़ेटियर ऑफ़ प्रतापगढ़; पृ० १६७। वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० १०५६। प्रतापगढ़ राज्य की एक पुरानी ख्यात; पृ० ३। (२) प्रतापगढ़ राज्य की एक पुरानी ख्यात; पृ० ३। (३) कैप्टेन सी० ई० येट; गैज़ेटियर ऑफ़ प्रतापगढ़ (ई० स० १८८०); पृ० ७६। मेजर के० डी० अर्सकिन; गैज़ेटियर ऑफ़ प्रतापगढ़ पृ० १६८। वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० १०५५। प्रतापगढ़ राज्य की एक पुरानी ख्यात; पृ० ३। (४) प्रतापगढ़ राज्य की एक पुरानी ख्यात; पृ० २। वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० १०५५।

जाने पर उसके नाम से देवलिया क़सबा बसाने का वर्णन किया है¹ । मुंहणोत नैणसी रावत विक्रमसिंह के प्रसङ्ग में लिखता है—"उस- (विक्रमसिंह)को राणा उदयसिंह ने अपने देश से निकाल दिया, तब वह गांव बड़ेरी में आसारण नामक मेरों की दादी के पास गया । उस बड़ेरी (वृद्धा) का मेर बड़ा आदर करते थे। पहले तो मेरों ने उसे वहां न ठहरने दिया, परंतु जब उसने सौगंध-शपथ खाकर उनको विश्वास दिलाया, तब वह रहने पाया । अन्त में होली के दिन वीका(विक्रमसिंह) ने दग़ा कर सब मेरों को मार डाला और देवलिया लिया । आसारण के वंशजों के पास अब तक एक गांव जागीर में है और उनका बड़ा भरोसा है²।″ नैणसी की ख्यात प्रतापगढ़ राज्य की ख्यातों की अपेक्षा प्राचीनता की दृष्टि से विशेष महत्व रखती है । ऐसी दशा में अन्य ख्यातों आदि का सारा कथन कपोल-कल्पित ठहरता है । जैसा कि ऊपर (पृ० १७ में) बतलाया गया है देवलिया पर महारावत सूरजमल के समय ही अधिकार हो गया था । संभव है कि बाघसिंह और रायसिंह का उस ओर अधिक ध्यान न रहने से वहां के आदिम निवासी मीणे उच्छृंखल हो गये हों, जिनको विक्रमसिंह ने, दबाकर अधीन किया हो । विक्रमसिंह के कांठल और उसके समीपवर्ती इलाक़ों पर अधिकार करने के समय उसका पितृव्य कांधल (सैंसमल का पुत्र), जिसको मेवाड़- कांधल को धमोतर, राज्य की तरफ़ से नींबाहेड़ा की जागीर थी, अपनी सुरताणसिंह को ढोढरयाखेड़ा जागीर छोड़कर उसके साथ चला गया । इसी और विजयसिंह को खैरोट प्रकार सुरताणसिंह(रणमल का पुत्र और सूरजमल की जागीर देना का पौत्र) ने मेवाड़ में प्राप्त करजू की जागीर छोड़कर उसको सहायता दी । इसके एवज़ में विक्रमसिंह ने अपने राज्य की स्थिति सुदृढ़ हो जाने पर कांधल को धमोतर की, सुरताणसिंह को


(१) कैप्टेन सी० ई० येट; गैज़ेटियर ऑव् प्रतापगढ़ (ई० स० १८८०); पृ० ७६ । मेजर के० डी० अर्सकिन; गैज़ेटियर ऑव् प्रतापगढ़; पृ० २२२ । (२) मुंहणोत नैणसी की ख्यात; प्रथम भाग, पृ० ६४-५ । १३

६८ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास ढोढरख्याखेड़ा (जिसको अब कल्याणपुरा कहते हैं) की तथा कांठल के भाई उदयसिंह के पुत्र विजयसिंह को खेरोट की जागीरें देकर अपना सरदार बनाया¹। वागड़ के स्वामी महारावल उदयसिंह ने अपने दो पुत्रों में से ज्येष्ठ पुत्र पृथ्वीराज को डूंगरपुर का राज्य दिया था और छोटे पुत्र जगमाल को (जिसकी माता पर महारावल का अधिक प्रेम [हाशिया: बांसवाड़ा के स्वामी] था) वागड़ का पूर्वी भाग देकर अपनी विद्यमानता [हाशिया: 'प्रतापसिंह की तरफ़ रहकर] में ही उसको बांसवाड़ा का पृथक् राजा बना दिया [हाशिया: डूंगरपुर के महारावल] था। वि० सं० १५८४ (ई० स० १५२८) केः खानवे [हाशिया: आसकरण से युद्ध करना] के युद्ध में उदयसिंह का परलोकवास होने पर उन दोनों भाइयों में विरोध हो गया और कई लड़ाइयां हुईं। फिर गुजरात के सुलतान बहादुरशाह ने मही नदी का पूर्वी भाग जगमाल के और पश्चिमी भाग पृथ्वीराज के रख- कर यह बखेड़ा तय करा दिया। जगमाल की मृत्यु पर उसका दूसरा पुत्र जयसिंह बांसवाड़े का स्वामी हुआ और ज्येष्ठ पुत्र किशनसिंह तथा उसके वंशज राज्य से वंचित रहे। जयसिंह का देहांत होने पर बांसवाड़े की गद्दी पर प्रतापसिंह बैठा। उसके समय में डूंगरपुर और बांसवाड़ा के बीच फिर विरोध की अग्नि भड़क उठी तथा डूंगरपुर के स्वामी महारावल आसकरण ने बांसवाड़े पर अधिकार कर लिया²। 'हरिभूषण महाकाव्य' का कर्त्ता कवि गंगाराम लिखता है— “महारावत प्रतापसिंह और महारावत विक्रमसिंह धर्म-बंधु (पगड़ी बदल भाई) थे। इसलिए प्रतापसिंह पर विपत्ति देख विक्रमसिंह ने उसकी सहायतार्थ प्रस्थान किया। इस युद्ध में वागड़ के अधिकांश चौहान सरदार आसकरण की तरफ़ थे, जिनसे मही नदी के तट पर विक्रमसिंह


(१) प्रतापगढ़ राज्य की एक पुरानी ख्यात; पृ० ३। ढोढरख्याखेड़ा का नाम पीछे से ठाकुर कल्याणसिंह के नाम पर कल्याणपुरा रक्खा गया। (२) देखो मेरा राजपूताने का इतिहास; जिल्द ३, भाग १ (डूंगरपुर राज्य का इतिहास), पृ० ६७-८ तथा भाग २ (बांसवाड़ा राज्य का इतिहास), पृ० ७५-६।

महारावत विक्रमसिंह ६६ की सेना का मुक़ाबला हुआ । चौहानों ने बड़ी वीरता से युद्ध कर मही नदी को मृत्यु-क्षेत्र बनाया और अंत में उसने महारावल आसकरण से बांसवाड़ा छुड़ाकर प्रतापसिंह को दे दिया'।” (१) अभूदथ क्षत्रकुलाभिमानी बीकाभिधेयः किल तस्य सूनुः । यत्खड्गधाराऽभिहतोऽरिवर्गो महीतटे खेलति भूतवर्गैः ॥ १ ॥ पुराऽऽसकर्णः किल रावलोऽभूत्प्रतापसिंहेन युयोध यत्र । वंशालयाधीश्र्वरधर्मबन्धुः समागतो देवगिरेर्महीशः ॥ ३ ॥ महाहवं तत्र तयोर्बभूव महीतटेषु प्रसभं समेषु । परस्परं प्रासफलैः प्रजघ्नुश्चौहानभूपा रणगीतगीताः ॥ ४ ॥ समुच्छलत्कच्छतुरङ्गमस्थः स्फुरत्स्फुलिङ्गावलिखड्गघातैः । त्रुट्यत्तनुत्रान् लसदश्ववारान् रणेऽरिवीरानकरोत्स वीकः ॥ ५ ॥ भिन्नाः पतन्तः करवालिकामिः समुच्छलद्रक्तचलत्प्रवाहाः । चौहान बेहोल (?) गणारणेऽस्मिन्नन्योन्यमेषां घटितं प्रचक्रुः ॥ ७ ॥ तीरेषु मह्याः पतिताः कबन्धाभीमा विरेजुः करवालहस्ताः । सुखं शयानाः किल नीरमध्याद्विनिर्गता मद्गुरबालकाः किम् ॥ १२ ॥ रणस्थलीभूपतिरासकर्णस्तत्याज बीकाभुजदण्डभीरुः । चलत्किरीटः स्फुरदश्ववारश्चौहानवर्गोऽभिमुखी बभूव ॥ १४ ॥ जघ्नुः शितैः प्रासफलैः सखेटाश्चौहानभूपा रणरङ्गमत्ताः । समुल्लसद्बाहुकरालखड्गाः सुशोणनेत्रा धृतवर्मदेहाः ॥ १५ ॥ सन्त्रासयन्यः किल दिग्गजालीर्दम्मामकानां ध्वनिभिः प्रवृद्धैः । चौहानभूपैश्चतुरङ्गसैन्यो वीकानरेन्द्रोऽपि युयोध भूयः ॥ १६ ॥ क्षेत्रं प्रतापाय ददौ प्रतप्तो वीकाभुजादण्डलसत्प्रतापैः । इत्युक्तवान् सन्निहितः स्ववर्गो मह्याः परं पारमुपाससाद ॥ २० ॥

१०० प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास इस घटना का वृत्तांत संक्षेप से हमने डूंगरपुर और बांसवाड़ा राज्य के इतिहासों में दिया है। डूंगरपुर, बांसवाड़ा और प्रतापगढ़ राज्य की ख्यातों में इस घटना का कुछ भी वर्णन नहीं है। अनुमान होता है कि जब प्रतापसिंह के समय महारावल आसकरण ने किशनसिंह तथा उसके वंशजों को बांसवाड़ा राज्य दिलाने का उद्योग किया, तब उस (आसकरण)- के विरुद्ध विक्रमसिंह को प्रतापसिंह का पक्ष लेकर युद्ध करना पड़ा हो। 'हरिभूषण महाकाव्य' में इस संबंध में विस्तृत वर्णन है, जो अलंकारिक ढंग से है और काव्यों में प्रायः अतिशयोक्ति भी पाई जाती है। इस दृष्टि से वह इस दोष से वंचित नहीं हो सकता, परंतु फिर भी वह इस युद्ध के प्रसंग में बहुत कुछ प्रकाश डालता है, जिसका ख्यातों में अभाव है। उससे महारावत विक्रमसिंह की वीरता, रण-कुशलता एवं मित्र-वत्सलता का यथेष्ट परिचय मिलता है। वहां इस घटना का कोई संवत् नहीं दिया है। ऐसी दशा में आसकरण और विक्रमसिंह के बीच यह युद्ध किस समय हुआ इसके विषय में निश्चित् रूप से कुछ नहीं कहा जा सकता; परंतु आसकरण का राज्य-समय वि० सं० १६०७-१६३६१ (ई० स० १५५१-१५८०) तक तथा प्रतापसिंह का राज्य-समय वि० सं० १६०७-१६३६२ (ई० स० १५५०-१५७६) तक निश्चित् है और विक्रमसिंह की गद्दीनशीनी वि० सं० १६०६ (ई० स० १५५२) तथा देहांत दामाखेड़ी गांव के उस(विक्रमसिंह) के पुत्र तेजसिंह के वि० सं० १६२१ भाद्रपद सुदि ११ (ई० स० १५६४ ता० १८ अगस्त) के ताम्रपत्र३ से वि० सं० १६२० (ई० स० १५६३) के आस-पास होना पाया महान् प्रतापस्य जयस्तदाऽऽसीद्भूतसुरेभ्यो जयपुष्पवृष्टिः । सुखं स वंशल्यमध्यवर्ती निर्विघ्नमन्तःपुरमन्दिरेषु ॥ २१ ॥ सर्ग ६ । (१) देखो मेरा राजपूताने का इतिहास; जि० ३, भाग १ (डूंगरपुर राज्य का इतिहास), पृ० ६६ । (२) वही; भाग २ (बांसवाड़ा राज्य का इतिहास), पृ० ८१ । (३) ......श्रीमहारावतजी श्रीतेजसीं(सिं)घजी वचनातु आगे

महारावत विक्रमसिंह जाता है। यही संवत् बड़वे की ख्यात में भी दिया है। अनुमानतः आसकरण और विक्रमसिंह के बीच यह युद्ध वि० सं० १६२० ( ई० स० १५६३ ) के पूर्व किसी समय हुआ होगा । ख्यातों में विक्रमसिंह के देहांत के विषय में मत-भेद है । कोई उसका देहांत वि० सं० १६३३ ( ई० स० १५७६ ) में और कोई वि० सं० १६३५ विक्रमसिंह का देहांत ( ई० स० १५७८ ) में होना बतलाती है, परंतु दोनों कथन विश्वसनीय नहीं है; क्योंकि उसके उत्तराधिकारी तेजसिंह के वि० सं० १६२१ भाद्रपद सुदि ११ ( ई० स० १५६४ ता० १८ अगस्त ) के ताम्रपत्र में पुरोहित दामा को सूर्य-ग्रहण' के अवसर पर दामाखेड़ी गांव दान देने का उल्लेख है, जिससे उसका देहा- वसान वि० सं० १६२० ( ई० स० १५६३ ) के लगभग होना संभव है । भरामण परोत दामा जोग्य अत् थने श्रीक्रस्नार्पण सुरज परव महे गाम दमाखेड़ी नीम सीम सुंदा जीमाहे जमीन वीगा ११०० अग्योरेसे या चंद्रार्क यावत उदक अघाट कर सारी लागत वलगत टंकी टुसी सहीत नीरदोस करे आपी जणीरी मारा वंसरो थई ने चोलण करेगा नहीं । चोलण करे जणी ने चीतोड़ भागा नु पाप छे । स्वदत्तां परदत्तां वा यो हरते वसुंधरां (ष)ष्टी वर्स(र्ष) सह(सह)त्राणी(स्राणि) विष्ठाया(यां) जाञ(य)ते कृमी(मि) दुवे श्रीमख......समत १६२१ रा वर्से भादवा सुदि ११ दीने श्ररिस्तु ॥ मूल ताम्रपत्र की छाप से । ( १ ) उपर्युक्त ताम्रपत्र में दामाखेड़ी गांव सूर्यग्रहण पर पुरोहित दामा को दान करने का उल्लेख है । ग्रहणों का मिलान करने पर वि० सं० १६२१ आषाढ वदि ३० ( ई० स० १५६४ ता० ८ जून ) गुरुवार को सूर्यग्रहण होना पाया जाता है। जैसा कि प्रायः देखा जाता है, ग्रहण के अवसर पर दान का संकल्प तो कर दिया जाता है, परन्तु यथावकाश सनद पीछे से करादी जाती है। संभव है इस ताम्रपत्र में भी ऐसा ही हुआ हो।

१०२ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास प्रतापगढ़ राज्य के बड़वे की ख्यात से ज्ञात होता है कि उस- (विक्रमसिंह) के चार राणियां थीं¹, किंतु एक दूसरी ख्यात में उसके विक्रमसिंह की राणियां पांच राणियां होना लिखा है² । उसके चार पुत्र और संतति तेजसिंह, सुरजन³, शार्दूलसिंह⁴ एवं किशनदास⁵ और किशनकुंवरी नामक पुत्री हुई⁶ । रावत विक्रमसिंह वीर, मित्रवत्सल और स्वतंत्रताभिमानी राजा था । उसको पराधीन रहकर जीवन व्यतीत करना असह्य था । इसलिए विक्रमसिंह का व्यक्तित्व उसने मेवाड़ के बाहर जाकर अपने बाहुबल से कांठल के मीणों एवं अन्य लड़ाकू जातियों पर विजय प्राप्तकर अपनी भावी संतान के लिए एक स्वतंत्र राज्य क़ायम किया, ( १ ) प्रतापगढ़ राज्य के बड़वे की ख्यात; पृ० २-३ । इस ख्यात में विक्रमसिंह के पुत्रों के नाम तेजसिंह, शार्दूलसिंह, सुरजन, केशवदास और किशनसिंह तथा पुत्रियों के नाम वल्लभकुंवरी और लालकुंवरी दिये हैं । ( २ ) प्रतापगढ़ राज्य की एक पुरानी ख्यात; पृ० ४ । ( ३ ) सुरजन के वंशज प्रतापगढ़ राज्य के प्रथम वर्ग के सरदारों में रायपुर के सरदार हैं । उसके पुत्र रामदास को रायपुर की जागीर मिलकर उसका पृथक् ठिकाना क़ायम हुआ । ( ४ ) प्रतापगढ़ राज्य से प्राप्त एक पुरानी ख्यात में शार्दूलसिंह को सीधपुरा. और वैरा गांव महारावत विक्रमसिंह-द्वारा मिलने का उल्लेख है । ( ५ ) प्रतापगढ़ राज्य से मिली हुई एक पुरानी ख्यात में महारावत विक्रमसिंह का किशनदास को भांतला की जागीर देने का उल्लेख है एवं उसके लिए ख्यातों में लिखा है कि वह (किशनदास) महाराणा प्रतापसिंह के समय किसी युद्ध में काम आया और इस सेवा के बदले में महाराणा ने किशनसिंह के पुत्र को जीरण के पास अगरान गांव दिया, जो इस समय ग्वालियर राज्य के अन्तर्गत है । ( ६ ) प्रतापगढ़ राज्य की एक पुरानी ख्यात; पृ० ६ । इस ख्यात में केशवदास का नाम विक्रमसिंह के पुत्रों में है एवं वल्लभकुंवरी और लालकुंवरी के नाम पुत्रियों में नहीं हैं । 'वीरविनोद' (द्वितीय भाग, पृ० १०५६) में भी उस (विक्रमसिंह) के पुत्रों के नाम सही होने में बड़वा-भाटों के कथन पर कुछ संदेह प्रकट किया है ।

महारावत विक्रमसिंह १०३ जिसका सूत्रपात सूरजमल के समय में ही हो चुका था। वह समय के अनुसार आचरण करता था। मालवे के मुसलमान हाकिमों के साथ उसने मित्रता का व्यवहार रखा, जिससे उसको अपना राज्य स्थिर करने में कुछ बाधा नहीं हुई। बांसवाड़ा राज्य पर डूंगरपुर के स्वामी आसकरण ने अधिकार किया, उस समय उसने आसकरण से विरोध कर बांसवाड़ा पुनः प्रतापसिंह को दिलाया। वह स्वभाव का उदार और विनम्र था। ख्यातों में लिखा है कि उसने वगवा गांव वसाया और रायासपुर में प्राकार बनवाया। वगवा गांव में उसने छत्री, तालाव, बावड़ी और बाग बनवाये।

चौथा अध्याय महारावत तेजसिंह से प्रतापसिंह तक 〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰 तेजसिंह रावत विक्रमसिंह का देहांत होने पर उसका ज्येष्ठ पुत्र तेजसिंह [राज्य-प्राप्ति] वि० सं० १६२१ (ई० स० १५६४) के लगभग देवलिया का स्वामी हुआ¹। दिल्ली पर अपनी हुकूमत दृढ़ करने के पीछे मुग़ल बादशाह अकबर ने मालवा में सेना भेज उसे अपने अधिकार में कर लिया। इसके साथ ही [हल्दी घाटी के युद्ध में महारावत के काका कांधल का महाराणा के पक्ष में लड़कर काम आना] उसने राजपूताना के नरेशों को अपने अधीन बनाने का प्रयत्न आरंभ किया, जिसमें वह कुछ सफल भी हुआ। राजपूताना के नरेशों में उस समय मेवाड़ का स्वामी महाराणा उदयसिंह प्रमुख था। इसलिए बादशाह ने वि० सं० १६२४ (ई० स० १५६८) में चित्तोड़ पर चढ़ाई कर बहुत दिनों तक युद्ध करने के पश्चात् वहां अधिकार कर लिया। चित्तोड़ पर शाही सेना का आक्रमण होने के पूर्व ही महाराणा उदयसिंह दुर्ग-रक्षा का भार अपने सामन्तों को देकर पश्चिमी पहाड़ों में जा रहा था। इसके बाद वह चार वर्ष तक जीवित रहा। उसका उत्तराधिकारी

(१) देखो ऊपर पृ० १०१। मुंहणोत नैणसी अपनी ख्यात में विक्रमसिंह के पीछे उसके पुत्र भाना (भानुसिंह) का गद्दी बैठना लिखता है, जो ठीक नहीं है। विक्रमसिंह का पुत्र तेजसिंह था और तेजसिंह का पुत्र भानुसिंह था, जिसका हमने यथा- प्रसङ्ग उल्लेख किया है। स्वयं तेजसिंह के तीन दानपत्र प्राप्त हो चुके हैं तथा अन्यत्र भी उसका वर्णन मिलता है, जिससे स्पष्ट है कि विक्रमसिंह के पीछे वह देवलिया का स्वामी हुआ था।

महारावत तेजसिंह १०५ महाराणा प्रतापसिंह (प्रथम) हुआ, जो दृढ़-प्रतिज्ञ और स्वतंत्रताभिमानी था। उस (महाराणा प्रतापसिंह) ने मुगलों की अधीनता कभी स्वीकार न करने की प्रतिज्ञा की। वि० सं० १६३० (ई० स० १५७३) में बादशाह ने आंबेर के कुंवर मानसिंह को मेवाड़ आदि के राजाओं को समझाकर शाही अधीनता में लाने के लिए भेजा। मानसिंह के डूंगरपुर होकर मेवाड़ में पहुंचने का समाचार पाकर महाराणा उसके स्वागतार्थ गोगूंदा से उदयसागर गया और उसने रीति के अनुसार कुंवर की पहुनाई की, परंतु भोजन के समय वह स्वयं शरीक न हुआ, जिससे कुंवर मानसिंह बिना भोजन किये ही महाराणा से अप्रसन्न होकर चला गया। अपने प्रधान सेनापति का अपमान होना बादशाह अकबर को बहुत ही अनुचित जान पड़ा। अतएव उसने महाराणा की धृष्टता का दंड देने के लिए वि० सं० १६३३ (ई० स० १५७६) में कुंवर मानसिंह की अध्यक्षता में अपनी सेना रवाना की। मेवाड़ में नाथद्वारे से कुछ दूर खमणोर गांव के पास हल्दीघाटी में महाराणा ने शाही सेना का धीरतापूर्वक मुक़ाबला किया, जिसमें दोनों पक्षों के बड़े-बड़े वीर काम आये। सन्ध्या होने पर महाराणा वहां से कोल्यारी गांव में चला गया और शाही सेना गोगूंदे में पहुंची। इस युद्ध में महारावत तेजसिंह ने अपने पितृव्य कांधल को महाराणा के पक्ष में लड़ने के लिए भेजा था, जो वीरतापूर्वक लड़ता हुआ मारा गया¹। मालवे पर मुग़ल बादशाह अकबर का अधिकार हो जाने के पीछे देवलिया-राज्य भी मुग़ल साम्राज्य के अन्तर्गत हो गया और वहां के स्वामी प्रतापगढ़ राज्य की की मालवा सूबे के सरदारों में गणना होने लगी, तत्कालीन स्थिति परंतु उस समय तक महारावत का शाही दरबार से सीधा संबंध नहीं जुड़ा था। उन दिनों मेवाड़ के महाराणा प्रतापसिंह और सम्राट् अकबर की सेना के बीच युद्ध चल रहा ( १ ) वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० १०५६ । १४

१०६ | प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास था। अपनी पितृभूमि मेवाड़ की ओर स्वभावतः ममता होने के कारण, महारावत की महाराणा प्रतापसिंह की तरफ़ सहानुभूति अवश्य थी, परंतु शाही सेना की प्रबलता से वह प्रत्यक्ष रूप से महाराणा की सहायता न कर सकता था, तो भी वह इस अवसर पर दुहरी नीति रखकर इधर महाराणा और उधर बादशाह को प्रसन्न रखने की चेष्टा करता था, जिससे उसके राज्य की हानि न हो। शाही अधिकारियों से मेल-मिलाप रख अपने राज्य की उन्नति करने की उसकी तीव्र इच्छा थी, परंतु स्वयं शाही दरबार में न जाने से वह अपने राज्य की कुछ भी वृद्धि न कर सका। महारावत तेजसिंह के समय का अधिक वृत्तांत नहीं मिलता है। प्रतापगढ़ राज्य की ख्यातों में लिखा है कि वि० सं० १६४८ (ई० स० महारावल का पंवार हर- / राव आदि से युद्ध करना | १५८७) में उसका हथनारा के पंवार महीड़ा हरराव से युद्ध हुआ था¹ तथा उन्हीं दिनों उसका हतुण्या की मगरी नामक स्थान पर भी युद्ध हुआ, जिसमें उस (तेजसिंह) का सरदार खान² काम आया³। पंवार हरराव और सोनगरा नाहर का अधिक पता नहीं चलता। संभव है कि वे देवलिया के आस-पास के कोई ज़मींदार हों और अपना इलाक़ा छिन जाने के कारण देवलिया इलाक़े में उपद्रव करते हों। ख्यातों में महारावत तेजसिंह का देहांत वि० सं० १६५० (ई० स० १५६३) में होना लिखा मिलता है। 'वीरविनोद' में उसका मारा जाना महारावत का देहांत | लिखा है⁴, जिसका अभिप्राय किसी युद्ध में अथवा किसी व्यक्ति द्वारा मारा जाना हो सकता है, परन्तु (१) प्रतापगढ़ राज्य की एक पुरानी ख्यात; पृ० ४। (२) खान, महारावत बाघसिंह का पुत्र था (देखो ऊपर पृ० ८४ टि० १)। (३) प्रतापगढ़ राज्य के बड़वे की ख्यात; पृ० ३। (४) वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० १०५६।

महारावत तेजसिंह १०७ ख्यातों में उसका मृत्यु-विषयक कोई वृत्तांत नहीं मिलता । महारावत तेजसिंह के छः राणियां थीं । उसके भानुसिंह ( भाना ) और सिंहा नामक दो कुंवर हुए¹ । उसके समय के दो ताम्रपत्रों की हमारे [ पार्श्व टिप्पणी: महारावत की राणियां और संतति आदि ] पास छापें आई हैं, जिनका समय क्रमशः वि० सं० १६२१ भाद्रपद सुदि ११ ( ई० स० १५६४ ता० १८ अगस्त )² तथा वि० सं० १६३६ आषाढ वदि ४ ( ई० स० १५७६ ता० १२ जून )³ है । उसने देवलिया में वि० सं० १६३५


( १ ) प्रतापगढ़ राज्य के बड़वे की ख्यात; पृ० ३ । अन्य राज्यों की बड़वे भाटों की ख्यातों की भांति प्रतापगढ़ राज्य के बड़वे की ख्यात भी कल्पित नामों से शून्य नहीं है। उसमें दिये हुए राणियों, कुंवरों तथा कुंवरियों के नाम अन्य ख्यातों से नहीं मिलते । इसलिए सत्यासत्य का निर्णय करने में बड़ी कठिनाई होती है। उदाहरण के लिए महारावत तेजसिंह की राणियों के नामों में बड़वे की ख्यात में जो नाम दिये हैं, वे हमारे पास प्रतापगढ़ राज्य की आई हुई अन्य ख्यात के नामों से नहीं मिलते एवं उसमें उक्त महारावत के पांच राणियां तथा कुंवर भानुसिंह और सिंहा के अतिरिक्त मनभावती नामक कुंवरी भी होना लिखा है, जिसका बड़वे की ख्यात में उल्लेख नहीं है। ( २ ) दमाखेड़ी गांव का ब्राह्मण दामा के नाम का ताम्रपत्र । अवतरण के लिए देखो ऊपर पृ० १०० टिप्पण संख्या ३ । ( ३ ) मा ( म ) हाराज श्री रावत तेजसी ( तेजसिंह ) जी वचनातु (त्) म ( मेह ) ता माहव न ( ने ) गम ( गाम ) १ पट्टा करे दीधु वाणी सवत ( संवत् ) १६३६ वर्षे अषाढ ( आषाढ ) वद ४.... । मूल ताम्रपत्र की छाप से ।

प्रतापगढ़ के राजाओं के प्राप्त शिलालेखों, ताम्रपत्रों आदि में सबसे पुराने उप- र्युक्त दोनों ताम्रपत्र हैं, जिनमें तेजसिंह की उपाधि 'रावत' और 'महाराज रावत' लिखी है। उसके उत्तराधिकारियों के भी कई लेखों में केवल 'रावत' और 'महाराज रावत' लिखा मिलता है, जिससे पाया जाता है कि उस समय वहां के राजाओं की सम्मान- सूचक उपाधि लिखने का कोई क्रम न था और लेखक जिस प्रकार चाहते लिखते थे।