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राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

पृष्ठ 149, कुल 534 में से

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पृष्ठ 149

१०६ | प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास था। अपनी पितृभूमि मेवाड़ की ओर स्वभावतः ममता होने के कारण, महारावत की महाराणा प्रतापसिंह की तरफ़ सहानुभूति अवश्य थी, परंतु शाही सेना की प्रबलता से वह प्रत्यक्ष रूप से महाराणा की सहायता न कर सकता था, तो भी वह इस अवसर पर दुहरी नीति रखकर इधर महाराणा और उधर बादशाह को प्रसन्न रखने की चेष्टा करता था, जिससे उसके राज्य की हानि न हो। शाही अधिकारियों से मेल-मिलाप रख अपने राज्य की उन्नति करने की उसकी तीव्र इच्छा थी, परंतु स्वयं शाही दरबार में न जाने से वह अपने राज्य की कुछ भी वृद्धि न कर सका। महारावत तेजसिंह के समय का अधिक वृत्तांत नहीं मिलता है। प्रतापगढ़ राज्य की ख्यातों में लिखा है कि वि० सं० १६४८ (ई० स० महारावल का पंवार हर- / राव आदि से युद्ध करना | १५८७) में उसका हथनारा के पंवार महीड़ा हरराव से युद्ध हुआ था¹ तथा उन्हीं दिनों उसका हतुण्या की मगरी नामक स्थान पर भी युद्ध हुआ, जिसमें उस (तेजसिंह) का सरदार खान² काम आया³। पंवार हरराव और सोनगरा नाहर का अधिक पता नहीं चलता। संभव है कि वे देवलिया के आस-पास के कोई ज़मींदार हों और अपना इलाक़ा छिन जाने के कारण देवलिया इलाक़े में उपद्रव करते हों। ख्यातों में महारावत तेजसिंह का देहांत वि० सं० १६५० (ई० स० १५६३) में होना लिखा मिलता है। 'वीरविनोद' में उसका मारा जाना महारावत का देहांत | लिखा है⁴, जिसका अभिप्राय किसी युद्ध में अथवा किसी व्यक्ति द्वारा मारा जाना हो सकता है, परन्तु (१) प्रतापगढ़ राज्य की एक पुरानी ख्यात; पृ० ४। (२) खान, महारावत बाघसिंह का पुत्र था (देखो ऊपर पृ० ८४ टि० १)। (३) प्रतापगढ़ राज्य के बड़वे की ख्यात; पृ० ३। (४) वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० १०५६।