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राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

पृष्ठ 150, कुल 534 में से

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पृष्ठ 150

महारावत तेजसिंह १०७ ख्यातों में उसका मृत्यु-विषयक कोई वृत्तांत नहीं मिलता । महारावत तेजसिंह के छः राणियां थीं । उसके भानुसिंह ( भाना ) और सिंहा नामक दो कुंवर हुए¹ । उसके समय के दो ताम्रपत्रों की हमारे [ पार्श्व टिप्पणी: महारावत की राणियां और संतति आदि ] पास छापें आई हैं, जिनका समय क्रमशः वि० सं० १६२१ भाद्रपद सुदि ११ ( ई० स० १५६४ ता० १८ अगस्त )² तथा वि० सं० १६३६ आषाढ वदि ४ ( ई० स० १५७६ ता० १२ जून )³ है । उसने देवलिया में वि० सं० १६३५


( १ ) प्रतापगढ़ राज्य के बड़वे की ख्यात; पृ० ३ । अन्य राज्यों की बड़वे भाटों की ख्यातों की भांति प्रतापगढ़ राज्य के बड़वे की ख्यात भी कल्पित नामों से शून्य नहीं है। उसमें दिये हुए राणियों, कुंवरों तथा कुंवरियों के नाम अन्य ख्यातों से नहीं मिलते । इसलिए सत्यासत्य का निर्णय करने में बड़ी कठिनाई होती है। उदाहरण के लिए महारावत तेजसिंह की राणियों के नामों में बड़वे की ख्यात में जो नाम दिये हैं, वे हमारे पास प्रतापगढ़ राज्य की आई हुई अन्य ख्यात के नामों से नहीं मिलते एवं उसमें उक्त महारावत के पांच राणियां तथा कुंवर भानुसिंह और सिंहा के अतिरिक्त मनभावती नामक कुंवरी भी होना लिखा है, जिसका बड़वे की ख्यात में उल्लेख नहीं है। ( २ ) दमाखेड़ी गांव का ब्राह्मण दामा के नाम का ताम्रपत्र । अवतरण के लिए देखो ऊपर पृ० १०० टिप्पण संख्या ३ । ( ३ ) मा ( म ) हाराज श्री रावत तेजसी ( तेजसिंह ) जी वचनातु (त्) म ( मेह ) ता माहव न ( ने ) गम ( गाम ) १ पट्टा करे दीधु वाणी सवत ( संवत् ) १६३६ वर्षे अषाढ ( आषाढ ) वद ४.... । मूल ताम्रपत्र की छाप से ।

प्रतापगढ़ के राजाओं के प्राप्त शिलालेखों, ताम्रपत्रों आदि में सबसे पुराने उप- र्युक्त दोनों ताम्रपत्र हैं, जिनमें तेजसिंह की उपाधि 'रावत' और 'महाराज रावत' लिखी है। उसके उत्तराधिकारियों के भी कई लेखों में केवल 'रावत' और 'महाराज रावत' लिखा मिलता है, जिससे पाया जाता है कि उस समय वहां के राजाओं की सम्मान- सूचक उपाधि लिखने का कोई क्रम न था और लेखक जिस प्रकार चाहते लिखते थे।