भारतकोश
राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

पृष्ठ 148, कुल 534 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 148

महारावत तेजसिंह १०५ महाराणा प्रतापसिंह (प्रथम) हुआ, जो दृढ़-प्रतिज्ञ और स्वतंत्रताभिमानी था। उस (महाराणा प्रतापसिंह) ने मुगलों की अधीनता कभी स्वीकार न करने की प्रतिज्ञा की। वि० सं० १६३० (ई० स० १५७३) में बादशाह ने आंबेर के कुंवर मानसिंह को मेवाड़ आदि के राजाओं को समझाकर शाही अधीनता में लाने के लिए भेजा। मानसिंह के डूंगरपुर होकर मेवाड़ में पहुंचने का समाचार पाकर महाराणा उसके स्वागतार्थ गोगूंदा से उदयसागर गया और उसने रीति के अनुसार कुंवर की पहुनाई की, परंतु भोजन के समय वह स्वयं शरीक न हुआ, जिससे कुंवर मानसिंह बिना भोजन किये ही महाराणा से अप्रसन्न होकर चला गया। अपने प्रधान सेनापति का अपमान होना बादशाह अकबर को बहुत ही अनुचित जान पड़ा। अतएव उसने महाराणा की धृष्टता का दंड देने के लिए वि० सं० १६३३ (ई० स० १५७६) में कुंवर मानसिंह की अध्यक्षता में अपनी सेना रवाना की। मेवाड़ में नाथद्वारे से कुछ दूर खमणोर गांव के पास हल्दीघाटी में महाराणा ने शाही सेना का धीरतापूर्वक मुक़ाबला किया, जिसमें दोनों पक्षों के बड़े-बड़े वीर काम आये। सन्ध्या होने पर महाराणा वहां से कोल्यारी गांव में चला गया और शाही सेना गोगूंदे में पहुंची। इस युद्ध में महारावत तेजसिंह ने अपने पितृव्य कांधल को महाराणा के पक्ष में लड़ने के लिए भेजा था, जो वीरतापूर्वक लड़ता हुआ मारा गया¹। मालवे पर मुग़ल बादशाह अकबर का अधिकार हो जाने के पीछे देवलिया-राज्य भी मुग़ल साम्राज्य के अन्तर्गत हो गया और वहां के स्वामी प्रतापगढ़ राज्य की की मालवा सूबे के सरदारों में गणना होने लगी, तत्कालीन स्थिति परंतु उस समय तक महारावत का शाही दरबार से सीधा संबंध नहीं जुड़ा था। उन दिनों मेवाड़ के महाराणा प्रतापसिंह और सम्राट् अकबर की सेना के बीच युद्ध चल रहा ( १ ) वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० १०५६ । १४