राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
DevanagariHindipublished534 पृष्ठ
पृष्ठ 147, कुल 534 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 147
चौथा अध्याय महारावत तेजसिंह से प्रतापसिंह तक 〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰 तेजसिंह रावत विक्रमसिंह का देहांत होने पर उसका ज्येष्ठ पुत्र तेजसिंह [राज्य-प्राप्ति] वि० सं० १६२१ (ई० स० १५६४) के लगभग देवलिया का स्वामी हुआ¹। दिल्ली पर अपनी हुकूमत दृढ़ करने के पीछे मुग़ल बादशाह अकबर ने मालवा में सेना भेज उसे अपने अधिकार में कर लिया। इसके साथ ही [हल्दी घाटी के युद्ध में महारावत के काका कांधल का महाराणा के पक्ष में लड़कर काम आना] उसने राजपूताना के नरेशों को अपने अधीन बनाने का प्रयत्न आरंभ किया, जिसमें वह कुछ सफल भी हुआ। राजपूताना के नरेशों में उस समय मेवाड़ का स्वामी महाराणा उदयसिंह प्रमुख था। इसलिए बादशाह ने वि० सं० १६२४ (ई० स० १५६८) में चित्तोड़ पर चढ़ाई कर बहुत दिनों तक युद्ध करने के पश्चात् वहां अधिकार कर लिया। चित्तोड़ पर शाही सेना का आक्रमण होने के पूर्व ही महाराणा उदयसिंह दुर्ग-रक्षा का भार अपने सामन्तों को देकर पश्चिमी पहाड़ों में जा रहा था। इसके बाद वह चार वर्ष तक जीवित रहा। उसका उत्तराधिकारी
(१) देखो ऊपर पृ० १०१। मुंहणोत नैणसी अपनी ख्यात में विक्रमसिंह के पीछे उसके पुत्र भाना (भानुसिंह) का गद्दी बैठना लिखता है, जो ठीक नहीं है। विक्रमसिंह का पुत्र तेजसिंह था और तेजसिंह का पुत्र भानुसिंह था, जिसका हमने यथा- प्रसङ्ग उल्लेख किया है। स्वयं तेजसिंह के तीन दानपत्र प्राप्त हो चुके हैं तथा अन्यत्र भी उसका वर्णन मिलता है, जिससे स्पष्ट है कि विक्रमसिंह के पीछे वह देवलिया का स्वामी हुआ था।