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राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

चौथा अध्याय महारावत तेजसिंह से प्रतापसिंह तक 〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰 तेजसिंह रावत विक्रमसिंह का देहांत होने पर उसका ज्येष्ठ पुत्र तेजसिंह [राज्य-प्राप्ति] वि० सं० १६२१ (ई० स० १५६४) के लगभग देवलिया का स्वामी हुआ¹। दिल्ली पर अपनी हुकूमत दृढ़ करने के पीछे मुग़ल बादशाह अकबर ने मालवा में सेना भेज उसे अपने अधिकार में कर लिया। इसके साथ ही [हल्दी घाटी के युद्ध में महारावत के काका कांधल का महाराणा के पक्ष में लड़कर काम आना] उसने राजपूताना के नरेशों को अपने अधीन बनाने का प्रयत्न आरंभ किया, जिसमें वह कुछ सफल भी हुआ। राजपूताना के नरेशों में उस समय मेवाड़ का स्वामी महाराणा उदयसिंह प्रमुख था। इसलिए बादशाह ने वि० सं० १६२४ (ई० स० १५६८) में चित्तोड़ पर चढ़ाई कर बहुत दिनों तक युद्ध करने के पश्चात् वहां अधिकार कर लिया। चित्तोड़ पर शाही सेना का आक्रमण होने के पूर्व ही महाराणा उदयसिंह दुर्ग-रक्षा का भार अपने सामन्तों को देकर पश्चिमी पहाड़ों में जा रहा था। इसके बाद वह चार वर्ष तक जीवित रहा। उसका उत्तराधिकारी

(१) देखो ऊपर पृ० १०१। मुंहणोत नैणसी अपनी ख्यात में विक्रमसिंह के पीछे उसके पुत्र भाना (भानुसिंह) का गद्दी बैठना लिखता है, जो ठीक नहीं है। विक्रमसिंह का पुत्र तेजसिंह था और तेजसिंह का पुत्र भानुसिंह था, जिसका हमने यथा- प्रसङ्ग उल्लेख किया है। स्वयं तेजसिंह के तीन दानपत्र प्राप्त हो चुके हैं तथा अन्यत्र भी उसका वर्णन मिलता है, जिससे स्पष्ट है कि विक्रमसिंह के पीछे वह देवलिया का स्वामी हुआ था।

महारावत तेजसिंह १०५ महाराणा प्रतापसिंह (प्रथम) हुआ, जो दृढ़-प्रतिज्ञ और स्वतंत्रताभिमानी था। उस (महाराणा प्रतापसिंह) ने मुगलों की अधीनता कभी स्वीकार न करने की प्रतिज्ञा की। वि० सं० १६३० (ई० स० १५७३) में बादशाह ने आंबेर के कुंवर मानसिंह को मेवाड़ आदि के राजाओं को समझाकर शाही अधीनता में लाने के लिए भेजा। मानसिंह के डूंगरपुर होकर मेवाड़ में पहुंचने का समाचार पाकर महाराणा उसके स्वागतार्थ गोगूंदा से उदयसागर गया और उसने रीति के अनुसार कुंवर की पहुनाई की, परंतु भोजन के समय वह स्वयं शरीक न हुआ, जिससे कुंवर मानसिंह बिना भोजन किये ही महाराणा से अप्रसन्न होकर चला गया। अपने प्रधान सेनापति का अपमान होना बादशाह अकबर को बहुत ही अनुचित जान पड़ा। अतएव उसने महाराणा की धृष्टता का दंड देने के लिए वि० सं० १६३३ (ई० स० १५७६) में कुंवर मानसिंह की अध्यक्षता में अपनी सेना रवाना की। मेवाड़ में नाथद्वारे से कुछ दूर खमणोर गांव के पास हल्दीघाटी में महाराणा ने शाही सेना का धीरतापूर्वक मुक़ाबला किया, जिसमें दोनों पक्षों के बड़े-बड़े वीर काम आये। सन्ध्या होने पर महाराणा वहां से कोल्यारी गांव में चला गया और शाही सेना गोगूंदे में पहुंची। इस युद्ध में महारावत तेजसिंह ने अपने पितृव्य कांधल को महाराणा के पक्ष में लड़ने के लिए भेजा था, जो वीरतापूर्वक लड़ता हुआ मारा गया¹। मालवे पर मुग़ल बादशाह अकबर का अधिकार हो जाने के पीछे देवलिया-राज्य भी मुग़ल साम्राज्य के अन्तर्गत हो गया और वहां के स्वामी प्रतापगढ़ राज्य की की मालवा सूबे के सरदारों में गणना होने लगी, तत्कालीन स्थिति परंतु उस समय तक महारावत का शाही दरबार से सीधा संबंध नहीं जुड़ा था। उन दिनों मेवाड़ के महाराणा प्रतापसिंह और सम्राट् अकबर की सेना के बीच युद्ध चल रहा ( १ ) वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० १०५६ । १४

१०६ | प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास था। अपनी पितृभूमि मेवाड़ की ओर स्वभावतः ममता होने के कारण, महारावत की महाराणा प्रतापसिंह की तरफ़ सहानुभूति अवश्य थी, परंतु शाही सेना की प्रबलता से वह प्रत्यक्ष रूप से महाराणा की सहायता न कर सकता था, तो भी वह इस अवसर पर दुहरी नीति रखकर इधर महाराणा और उधर बादशाह को प्रसन्न रखने की चेष्टा करता था, जिससे उसके राज्य की हानि न हो। शाही अधिकारियों से मेल-मिलाप रख अपने राज्य की उन्नति करने की उसकी तीव्र इच्छा थी, परंतु स्वयं शाही दरबार में न जाने से वह अपने राज्य की कुछ भी वृद्धि न कर सका। महारावत तेजसिंह के समय का अधिक वृत्तांत नहीं मिलता है। प्रतापगढ़ राज्य की ख्यातों में लिखा है कि वि० सं० १६४८ (ई० स० महारावल का पंवार हर- / राव आदि से युद्ध करना | १५८७) में उसका हथनारा के पंवार महीड़ा हरराव से युद्ध हुआ था¹ तथा उन्हीं दिनों उसका हतुण्या की मगरी नामक स्थान पर भी युद्ध हुआ, जिसमें उस (तेजसिंह) का सरदार खान² काम आया³। पंवार हरराव और सोनगरा नाहर का अधिक पता नहीं चलता। संभव है कि वे देवलिया के आस-पास के कोई ज़मींदार हों और अपना इलाक़ा छिन जाने के कारण देवलिया इलाक़े में उपद्रव करते हों। ख्यातों में महारावत तेजसिंह का देहांत वि० सं० १६५० (ई० स० १५६३) में होना लिखा मिलता है। 'वीरविनोद' में उसका मारा जाना महारावत का देहांत | लिखा है⁴, जिसका अभिप्राय किसी युद्ध में अथवा किसी व्यक्ति द्वारा मारा जाना हो सकता है, परन्तु (१) प्रतापगढ़ राज्य की एक पुरानी ख्यात; पृ० ४। (२) खान, महारावत बाघसिंह का पुत्र था (देखो ऊपर पृ० ८४ टि० १)। (३) प्रतापगढ़ राज्य के बड़वे की ख्यात; पृ० ३। (४) वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० १०५६।

महारावत तेजसिंह १०७ ख्यातों में उसका मृत्यु-विषयक कोई वृत्तांत नहीं मिलता । महारावत तेजसिंह के छः राणियां थीं । उसके भानुसिंह ( भाना ) और सिंहा नामक दो कुंवर हुए¹ । उसके समय के दो ताम्रपत्रों की हमारे [ पार्श्व टिप्पणी: महारावत की राणियां और संतति आदि ] पास छापें आई हैं, जिनका समय क्रमशः वि० सं० १६२१ भाद्रपद सुदि ११ ( ई० स० १५६४ ता० १८ अगस्त )² तथा वि० सं० १६३६ आषाढ वदि ४ ( ई० स० १५७६ ता० १२ जून )³ है । उसने देवलिया में वि० सं० १६३५


( १ ) प्रतापगढ़ राज्य के बड़वे की ख्यात; पृ० ३ । अन्य राज्यों की बड़वे भाटों की ख्यातों की भांति प्रतापगढ़ राज्य के बड़वे की ख्यात भी कल्पित नामों से शून्य नहीं है। उसमें दिये हुए राणियों, कुंवरों तथा कुंवरियों के नाम अन्य ख्यातों से नहीं मिलते । इसलिए सत्यासत्य का निर्णय करने में बड़ी कठिनाई होती है। उदाहरण के लिए महारावत तेजसिंह की राणियों के नामों में बड़वे की ख्यात में जो नाम दिये हैं, वे हमारे पास प्रतापगढ़ राज्य की आई हुई अन्य ख्यात के नामों से नहीं मिलते एवं उसमें उक्त महारावत के पांच राणियां तथा कुंवर भानुसिंह और सिंहा के अतिरिक्त मनभावती नामक कुंवरी भी होना लिखा है, जिसका बड़वे की ख्यात में उल्लेख नहीं है। ( २ ) दमाखेड़ी गांव का ब्राह्मण दामा के नाम का ताम्रपत्र । अवतरण के लिए देखो ऊपर पृ० १०० टिप्पण संख्या ३ । ( ३ ) मा ( म ) हाराज श्री रावत तेजसी ( तेजसिंह ) जी वचनातु (त्) म ( मेह ) ता माहव न ( ने ) गम ( गाम ) १ पट्टा करे दीधु वाणी सवत ( संवत् ) १६३६ वर्षे अषाढ ( आषाढ ) वद ४.... । मूल ताम्रपत्र की छाप से ।

प्रतापगढ़ के राजाओं के प्राप्त शिलालेखों, ताम्रपत्रों आदि में सबसे पुराने उप- र्युक्त दोनों ताम्रपत्र हैं, जिनमें तेजसिंह की उपाधि 'रावत' और 'महाराज रावत' लिखी है। उसके उत्तराधिकारियों के भी कई लेखों में केवल 'रावत' और 'महाराज रावत' लिखा मिलता है, जिससे पाया जाता है कि उस समय वहां के राजाओं की सम्मान- सूचक उपाधि लिखने का कोई क्रम न था और लेखक जिस प्रकार चाहते लिखते थे।

१०८ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास (ई० स० १५७८) में तेजसागर तालाब बनवाया। 'हरिभूषण महाकाव्य' में उसके संबंध में लिखा है कि वह वीर, उदार, और गुणग्राहक राजा था। उसके शत्रु उससे सदा डरते थे। वह विद्वानों का सत्संग करता था और उसकी राजधानी देवलिया समृद्ध थी¹। ( १ ) बभूव वीकात्मजतत्प्रतापः श्रीतेजसिंहः प्रतिभूपशल्यः । पवित्रकीर्तिर्महनीयमूर्तिः क्षत्राम्बुजानामिव चण्डभानुः ॥ २२ ॥ भूमण्डलं तेन भृशं चकासे पुरन्दरेणेव पुरं सुराणाम् । आनीरधि प्रोत्कटतेजसेव महीभृता तेन वृतं समन्तात् ॥ २३ ॥ अनेकभूपोत्तममौलिहीरनीराजितं पादयुगं विरेजे । प्रतापशंसिस्वभुजायुगस्य युगान्तचण्डांशुसमस्य तस्य ॥ २४ ॥ अनेकवैरिव्रजसुन्दरीभिः संस्तूयमानो विनयेन वीरः । आक्रम्य सिंहासनमुग्रमूर्तिः स्थितः प्रतापानलतापतारिः ॥ २५ ॥ दन्ताग्रदत्तस्वकराङ्गुलीभिः सालस्यविन्दुस्रवदीक्षणाभिः । क्लेशात्प्रहारे स्वशिरोऽङ्गुलीनां प्रस्फोटनैम्लानमुखाम्बुजाभिः ॥२६॥ अहो भवन्तं करुणा न बाधते प्रसाद एषो विधिदुर्लिपीनाम् । धम्मिल्लचूड़ाश्रुतिभूषणानिमित्थं वमौ त्वं शरणं कृपालो ॥ २७ ॥ बबाध नालस्यमहो महीशं न चाधयस्तं परि पीडयन्ति । बुधैर्नैकैः स निनाय कालमखेदितः खेदितवैरिवर्गः ॥ २८ ॥ चन्द्रः कलङ्की स कलङ्कहीनः क्षारः समुद्रो मधुराकृतिः सः । स्थिरः सुराणां विटपी चलः सः कष्टोपमेयः स बभूव भूपः॥ २९॥ वित्ते हि चित्तं न कदापि दत्तं लुब्धो गुणानां गुणदत्तदृष्टिः । यस्तेजसिंहः कलिकल्पवृक्षो नापूरयद् दृष्टिगतं न कं कम् ॥ ३० ॥ सर्ग ६ । काव्य की सुंदरता बढ़ाने के लिए कवि प्रायः अलंकारों का अत्यधिक प्रयोग

महारावत भानुसिंह १०६ भानुसिंह ˙महारावत भानुसिंह, जिसको 'भाना' अथवा 'भवानीसिंह' भी कहते राज्य-प्राप्ति थे, विक्रम संवत् १६५० (ई० स० १५६३ ) में देवलिया की गद्दी पर बैठा । ग्वालियर राज्य के जीरण और नीमच के परगने, जो इस समय मालवे में हैं, पहले मेवाड़ राज्य के अन्तर्गत थे । महाराणा उदयसिंह और प्रतापसिंह के राज्य-काल में शाही सेना की चढ़ाइयों भानुसिंह और शक्तावत के समय वे महाराणा के हाथ से निकल गये और जोधसिंह सीसोदिया के बीच विरोध होना उनपर वादशाही अधिकार हो गया । वहां के शाही थानों पर बादशाह की तरफ़ से सय्यद लोग नियत हुए । महाराणा प्रतापसिंह की तरफ़ से रावत गोविन्ददास खंगारोत ( बेगमवालों का पूर्वज ) नउवे वाघरेड़े ( वाठरडे ? ) के थाने पर नियत था । वह सय्यदों से लड़कर मारा गया । वि० सं० १६४३ ( ई० स० १५८६ ) में उक्त महाराणा ने चित्तौड़गढ़ और मांडलगढ़ को छोड़कर सारे मेवाड़ पर बलपूर्वक अधिकार कर लिया । उस (प्रतापसिंह )- के पिछले समय में मेवाड़ पर बादशाही सेना का आक्रमण न हुआ, जिससे उसे अपने देश की स्थिति सुधारने का अवसर मिला और उसने विपत्ति के समय अपना साथ देनेवाले सरदारों आदि की सेवाओं के एवज़ में करते हैं, जिससे काल पाकर वास्तविकता केवल कवि-कल्पना ही मान ली जाती है । ऐतिहासिक अंश अल्प होने पर भी वे घटनाओं को अपनी रचना में तिल का ताड़ बना कर दिखलाते हैं। कवि गंगाराम ने भी 'हरिभूषणमहाकाव्य' में ऐसा ही किया है, अतएव उक्त काव्य में महारावत तेजसिंह के विषय का जो वर्णन है, वह अति- शयोक्तिपूर्ण है और समय को देखते हुए महारावत तेजसिंह के समय के इतिहास के विपरीत है।

११० प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास

उन्हें नये सिरे से जागीरें दीं। वि० सं० १६५३ (ई० स० १५६७) में उसका परलोकवास होने पर उसका पुत्र अमरसिंह (प्रथम) मेवाड़ का स्वामी हुआ। महाराणा उदयसिंह के पौत्र और शक्तिसिंह के पुत्र जोधसिंह¹ ने उन दिनों महाराणा की आज्ञानुसार मोखम, कराड़िया, कुंडल की सादड़ी (छोटी सादड़ी) और जीरण के कुछ गांव ठेके पर लेकर अपने भाई बाघसिंह के साथ वहां रहना आरंभ किया²। फिर महाराणा ने उसको नीमच और जीरण का पट्टा कर दिया³। जोधसिंह वीर-प्रकृति का पुरुष था। क्रमशः अपना बल बढ़ाकर उसने देवलिया के गांवों को लूटना आरंभ किया और नीमच से भी वह चौथ मांगने लगा⁴। इससे देवलिया के स्वामी भानुसिंह को भय हुआ कि वह देवलिया पर भी कभी दांत लगावेगा। निदान उसने जीरण के शाही फ़ौजदार को बहकाया कि जोधसिंह और बाघसिंह को तुम यहां क्यों रहने देते हो ? वे बड़े आपत्तिकारक हैं और तुमको मार डालेंगे⁵। भानुसिंह के शाही अफ़सरों से मेल-मिलाप रखने की नीति से जोधसिंह पहले से ही असंतुष्ट था। भानुसिंह-द्वारा मंदसोर के शाही फ़ौज- [पार्श्व टिप्पणी: महारावत भानुसिंह और शक्तावत जोधसिंह के बीच युद्ध होना] दार के अपने विरुद्ध भड़काये जाने की ख़बर पाकर वह क्रुद्ध हो गया और उसकी उस(भानुसिंह) से पूरी शत्रुता हो गई। मंदसोर के शाही फ़ौजदार ने, जो सय्यद था, जोधसिंह के विरुद्ध महाराणा अमरसिंह से शिकायत की, परंतु वहां जोधसिंह का प्रबल प्रभाव होने से उसके विरुद्ध होनेवाली शिकायतों

(१) इसके वंशधर कणगेटी (मेवाड़ !) के सरदार हैं। (२) मुंहणोत नैणसी की ख्यात; प्रथम भाग, पृ० ६५। (३) वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० १०५६। (४) मुंहणोत नैणसी की ख्यात; प्रथम भाग, पृ० ६५। (५) वही; पृ० ६५।

की सुनवाई नहीं हुई¹। इसी बीच भानुसिंह भी महाराणा के पास पहुंचा और वहां एक दिन उसके तथा जोधसिंह के बीच दरबार में ही कहा-सुनी हो गई। महाराणा के समझाने से उस समय तो बात दब गई और भानुसिंह वहां से देवलिया² तथा जोधसिंह अपने निवासस्थान को लौट गया। इस घटना के कुछ ही दिनों बाद जब जोधसिंह के उपद्रव में कमी न दीख पड़ी तब भानुसिंह मंदसोर के शाही फ़ौजदार मक्खनखां से मिला और दोनों ने अपनी सम्मिलित सेना-द्वारा जोधसिंह को दंड देना निश्चित किया। एक दिन वे दोनों पंद्रह सौ सवारों की भीड़-भाड़ के साथ जोधसिंह पर चढ़ गये। जोधसिंह भी अपने सौ सवारों और दो सौ पैदलों के साथ उनके सामने जा डटा । चीताखेड़े से कुछ दूरी पर एक वट वृक्ष के पास दोनों दलों में लड़ाई हुई, जिसमें सय्यद मक्खन और महारावत भानुसिंह जोधसिंह के हाथ से मारे गये, साथ ही जोधसिंह भी जीवित न बचा³। 'हरिभूषण महाकाव्य' का कर्त्ता कवि गंगाराम अपने ग्रन्थ में महारावत तेजसिंह के पीछे सिंहा के देवलिया का स्वामी होने और सिंहा की तरफ़ से उसके पितृव्य भानुसिंह के मक्खन की सहायतार्थ शक्तावत जोधसिंह से युद्ध करने का वर्णन करते हुए जोधसिंह और माखन (मक्खनखां)


(१) मुंहणोत नैणसी की ख्यात; प्रथम भाग, पृ० ६५ । (२) वीरविनोद; द्वितीय भाग; पृ० १०५६ । (३) मुंहणोत नैणसी की ख्यात; प्रथम भाग, पृ० ६५। वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० १०५६ । कैप्टेन सी० ई० येट; गैज़ेटियर ऑव् प्रतापगढ़; पृ० ७६ । के० डी० अर्सकिन; गैज़ेटियर ऑव् प्रतापगढ़; पृ० १६८ । प्रतापगढ़ राज्य के बड़वे की ख्यात (पृ० ३) में उस (भानुसिंह) का उदयपुर के महाराणा संग्रामसिंह (दूसरा) के समय रणवीर (रणबाजख़ां) के साथ की लड़ाई में मारे जाने का उल्लेख है, जो बिल्कुल ग़लत है। उदयपुर का महाराणा संग्रामसिंह (दूसरा) इस घटना के लगभग सौ वर्ष पीछे वि० सं० १७६७ (ई० स० १७१०) में वहां का स्वामी हुआ था।

११२ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास के वीर गति प्राप्त करने का उल्लेख करता है'; किंतु भानुसिंह के विषय में उसने मौन धारण कर लिया है। ख्यातें और प्रायः सब ही इतिहासवेत्ता तेजसिंह के भानुसिंह और सिंहा नामक पुत्र होना बतलाकर भानुसिंह ( १) पुरा दशपुराधीशः खानो माखनभूपतिः । चित्रकूटधिनाथेन युयोध यवनेश्वरः ॥ २ ॥ मिलिता हिन्दवः सर्वे युद्धाय समुपस्थिताः । तान् विलोक्य तुरुष्केशः सिंहं चानुससार सः ॥३॥ तत्पितृव्यो महावीरो भानुसिंहो ययौ रणे । राणासेनाधिपं दृष्ट्वा योधशक्तावतं पुरः ॥ ४ ॥ बभूव तुमुलं तत्र तयोरन्योन्यमाहवम् । देवदानवगन्धर्वमुनिविस्मयकारकम् ॥ ५ ॥ खङ्गान्निष्क्रासयामासुः केऽपि चर्मधरा भटाः । विस्फारं धनुषां मध्ये कुर्वाणाः समराजिरे ॥ ६ ॥ विच्छिन्नबाहवः केऽपि परे मुद्गर-खण्डिताः । एकनेत्राश्चैकपादा विचेलुस्त्वपरे भृशम् ॥ ७ ॥ पठाणाः पतिताः सर्वे यवना अपि यापिताः । मुग्दलाः सादितास्तत्र हप्सिनो निहता रणे ॥ ८ ॥ मुमुचुः शक्तयः केऽपि मुशलान् लगुडोपलान् । निहता यवनाः सर्वे योधशक्तावतेन ते ॥ ६ ॥ तोबा तोबेति कुर्वाणा भानुसिंहमुपाययुः । मारयन्ति समुक्तेवेऽतिसहाये त्वयि तिष्ठति ॥ १० ॥ तेषामिति वचः श्रुत्वा खङ्गमाकृष्य निर्ययौ । योधमाकारयन्वीरो युगान्तदहनोपमः ॥ ११ ॥ रुधिरस्रावसञ्जाता वाहिन्यो वाहिता भृशम् । मुण्डकूर्मकवन्धोग्रमद्गुरासिझषाकुलाः ॥ १२ ॥

[Header] महारावत भानुसिंह ११३

, को तेजसिंह का उत्तराधिकारी बतलाते हैं। स्वयं भानुसिंह के वि० सं० १६५१ और १६५२ के ताम्रपत्र मिल चुके हैं। ऐसी अवस्था में गंगाराम का यह कथन कि तेजसिंह के पीछे सिंहा देवलिया का स्वामी हुआ तथा भानुसिंह, सिंहा का चाचा (तेजसिंह का भाई) था और वह सिंहा की तरफ़ से जोधसिंह से युद्ध करने गया, स्वीकार करने योग्य नहीं है। नैणसी की ख्यात में, जो प्राचीनता की दृष्टि से अधिक महत्वपूर्ण है, क्वापि बुम्बारवाः पेतुः क्वापि भीममहारवाः । करिणां गर्जितं क्वापि क्वापि ढक्काघनस्वनाः ॥ १३ ॥ इति घोरे रणे जाते योधशक्तावतः स्वयम् । युयोध भानुना वीरः सानुमानिव चञ्चलः ॥ १४ ॥ युध्यमानान् रणे दृष्ट्वा पातयामास तद्भटान् । मृगानां कुलमासाद्य समन्युरिव केसरी ॥ १५ ॥*** युध्यमानं रणे भानुं दृष्ट्वा योधः समागतः । परस्परमभूद् युद्धं दारुणं वीरयोस्तयोः ॥ २३ ॥ आदौबाणैस्ततः प्रासैरासिभिस्तदनन्तरम् । पश्चात् कटारकैर्युद्धं तयोरिव तयोरभूत ॥ २४ ॥ तच्छत्रं भानुना बाणैश्छिन्नं योधोऽपितद्ध्वजम् । उभौ चिच्छिदतुः सद्यः सस्वनं धनुषोर्गुणम् ॥ २५ ॥*** खड्गमाकृष्य चिच्छेद प्रासं भानुकरस्थितम् । सोऽपि खङ्गक्षतं तस्यायुपवीतोचितं ददौ ॥ २७ ॥ पश्चात्कटारिकाघातैः पातितः समराङ्गणे । योधशक्तावतो वीरो गतासुरगताभिधः ॥ २८ ॥ माखनः खनिमापन्नः शक्त्या योधेन संहतः । राहूरिव पपातोर्व्यां कृष्णेनेव पुरा रणे ॥ २६ ॥ सप्तम सर्ग ।

[Footer] १५

११४ 'प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास शक्तावत जोधसिंह के साथ होनेवाले युद्ध में भानुसिंह के मारे जाने का स्पष्ट उल्लेख है । जीरण में उस (भानुसिंह) की स्मारक छत्री बनी हुई है। उसके लेख में भी शक्तावत जोधसिंह के साथ होनेवाले युद्ध में उसके मारे जाने का उल्लेख है। अतएव भानुसिंह का उसी युद्ध में मारा जाना अधिक माननीय है। प्राचीन परंपरा का अनुयायी होने से गंगाराम ने अपने काव्य में दुःखान्त प्रसङ्ग को जान-बूझकर छोड़ दिया है और देवलिया के स्वामी वाघसिंह, भानुसिंह तथा जसवंतसिंह (जो युद्ध करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए) के देहांत पर मौन साध लिया है। इसी प्रकार उसने वहां के अन्य नरेशों की भी मृत्यु-वार्ता का उल्लेख नहीं किया, जिससे कहा जा सकता है कि उसने अपने इस काव्य को सुखान्त बनाने का ही लक्ष्य रखा हो । 'वीरविनोद' में भी इस युद्ध का वर्णन है, परंतु वहां इस घटना का कोई समय नहीं दिया है, परन्तु महारावत भानुसिंह की छत्री के लेख में वि० सं० १६५४ (ई० स० १५६७) के मार्गशीर्ष² में उसका शक्तावत जोधसिंह (१) द्वितीय भाग, पृ० १०५६ । (२) ०००मा(महा) राजा धी(धि) राज मा(म) हारावतजी श्री भानाजी देवल्य राजा(जां)रा०००००मुना पदराया०००००जोध (ध)सीघ (सिंह) जी सग०००००या दसोर (मंदसोर)००००० रजवाड़ दली (दिल्ली) तप (पे) पातसा००००० अकबरजी उदेपुर तप (पे) राणा ०००००००अमरसीघ(सिंह) जी समत (सम्वत्) १६ सौ ५४ सा के (शाके) १५१ [६] परवतमानमती अग०००००००दीतवार००० । मूल लेख की छाप से । मेवाड़ का महाराणा अमरसिंह (वीरशिरोमणि महाराणा प्रतापसिंह का ज्येष्ठ पुत्र), महाराणा प्रताप का परलोकवास होने पर वि० सं० १६५३ माघ सुदि ११ को राजगद्दी पर बैठा था। समयक्रम पर विचार करने से यह घटना महाराणा अमरसिंह- (प्रथम) के प्रारंभिक समय की हो सकती है।

महारावत भानुसिंह. ११५ के साथ होनेवाले युद्ध में काम आना लिखा है। ऐसी दशा में महारावत भानुसिंह का परलोकवास वि० सं० १६५४ के मार्गशीर्ष (ई० स० १५६७ नवंबर अथवा दिसंबर) मास में होना ठीक जान पड़ता है। इसके विरुद्ध ख्यातों तथा प्रतापगढ़ राज्य के गैज़ेटियर में उसका देहांत वि० सं० १६६० (ई० स० १६०३) में होना लिखा है¹, जो स्वीकार करने के योग्य नहीं है; क्योंकि ख्यातों आदि के संवत् बहुधा कल्पित हैं और पीछे से सुनी-सुनाई बातों के आधार पर दिये गये हैं। सर जॉन मालकम अपनी 'रिपोर्ट ऑन दि प्रॉविन्स ऑव् मालवा एंड एड्ज्वॉइनिंग डिस्ट्रिक्ट्स' (कलकत्ता गवर्नमेंट ऑव् इंडिया सेंट्रल पब्लि- केशन ब्रांच-पृ० २२४) में लिखता है कि प्रतापगढ़ राज्य के संस्थापक जीजा रावल का (जिसको शाहजहां के समय में मालवे के मुसलमान अफ़- सरों की सिफ़ारिश से जागीर मिली थी) पुत्र भीमा रावल मंदसोर के आमिलदार की सहायतार्थ लड़कर मारा गया। वहीं उसने टिप्पण में सादड़ी के सरदार सूरजमल के मांडू के सुलतान अलाउद्दीन के पास जाने और फिर उसके पुत्र वाघ रावल के चित्तौड़ की रक्षार्थ काम आने एवं उस (वाघ रावल) के पुत्र वायसिंह के पुनः सादड़ी लौट जाने और उसके पुत्र का नाम जीजा रावल होने का उल्लेख किया है। ये सब कथन इतिहास की कसौटी पर निर्मूल ठहरते हैं। मांडू में अलाउद्दीन नाम का कोई सुलतान नहीं हुआ। सूरजमल ने मेवाड़ के विरुद्ध मांडू (मालवा) के सुलतान नासिरुद्दीन की सहायता कर महाराणा रायमल और उसके कुंवर पृथ्वीराज से युद्ध किया था, जिसका वर्णन ऊपर (पृ० ६२-५ में) किया गया है। प्रतापगढ़ के राजाओं की उपाधि 'रावल' न होकर 'रावत' है एवं वहां 'वायसिंह', 'जीज़ा' और 'भीमा' नाम के (१) प्रतापगढ़ राज्य के बड़वे की ख्यात; पृ० ३। प्रतापगढ़ राज्य की एक पुरानी ख्यात; पृ० ५। कैप्टेन सी० ई० येट; गैज़ेटियर ऑव् प्रतापगढ़; पृ० ७६। मेजर के० डी० अर्सकिन; गैज़ेटियर ऑव् प्रतापगढ़; पृ० १६८। वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० १०५६।

१९६ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास कोई राजा नहीं हुए । चायसिंह रायसिंह का, जीजा चीका (विक्रमसिंह) का, और भीमा तथा भाना भानुसिंह के सूचक हो सकते हैं । इसी प्रकार मालकम का यह कथन कि भीमा अथवा भाना (भानुसिंह) बाघसिंह के पौत्र जीजा अर्थात् चीका (विक्रमसिंह) का पुत्र था निर्मूल है । उक्त रिपोर्ट में दिये हुए प्रतापगढ़ के राजाओं के नाम चायसिंह, जीजा और भीमा अशुद्ध हैं और उसमें दी हुई घटनाएं भी ठीक नहीं हैं । बाघसिंह अकबर की चित्तोड़ पर चढ़ाई होने के तीस वर्ष पूर्व बहादुरशाह की चित्तोड़ की चढ़ाई के समय मेवाड़वालों की तरफ़ से लड़कर मारा गया था । उक्त रिपोर्ट के अध्ययन करने से प्रकट होता है कि सर जॉन मालकम ने अपनी रिपोर्ट लिखते समय पूर्व-वृत्तांत लिखने में सत्यासत्य की अधिक खोज नहीं की । महारावत भानुसिंह के वि० सं० १६५१ और १६५२ के निम्नलिखित दो ताम्रपत्र मिले हैं- महारावत भानुसिंह के ताम्रपत्र (१) वि० सं० १६५१ मार्गशीर्ष वदि ५ (ई० स० १५६४ ता० २४ अक्टोबर) का जोशी श्रीकंठ के नाम का सेवली गांव का ताम्रपत्र, जिसमें उपर्युक्त गांव जोशी श्रीकंठ को कृष्णार्पण करने और ताम्रपत्र महारावत के कोठारी चाचा की आज्ञा से पंचोली केशवदास-द्वारा लिखे जाने का उल्लेख है१। (२) वि० सं० १६५२ आषाढ सुदि १ (ई० स० १५६५ ता० २८ जून) का जोशी नारायण के नाम का ताम्रपत्र, जिसमें महारावत तेजसिंह के अंतिम समय में अमलावदा गांव में संकल्प की हुई पैंतीस बीघा भूमि दान करने का उल्लेख है और दुआ देनेवाले का नाम कोठारी शामल (१) श्री महाराज श्री राउत श्री भवानीसिंघजी वचनातु जोसी सीरीकंठ है......... मौ० जौ सेवली अघाट करीदीघो......... संवतं १६५१ वरषे मागसर वदि ५......। मूल लेख छाप से ।

महारावत भानुसिंह ११७

एवं लेखक का नाम पंचोली नेता दिया है¹। बड़वे की ख्यात में महारावत भानुसिंह के केवल एक ही राणी लिखी है और उसका नाम भगवतकुंवरी देकर उसको ईडर के राव महारावत की राणियां नारायणदास की पुत्री लिखा है एवं उसका पुत्र सिंहा बतलाया है²; किंतु एक दूसरी पुरानी ख्यात में उसके दो राणियां एक चौहान वाला की पुत्री समुद्रकुंवरी और दूसरी सोलंकी माला की पुत्री मानकुंवरी होना लिखकर उक्त सोलंकिणी राणी के उदर से कमलकुंवरी और पेपकुंवरी नामक पुत्रियां होने का उल्लेख है³। ख्यातों की परस्पर विभिन्नता को देखते हुए इस संबंध में निश्चित रूप से कुछ नहीं कहा जा सकता, परंतु प्रतापगढ़ राज्य के बड़वे की ख्यात में दिया हुआ महारावत भानुसिंह के सिंहा नामक पुत्र होने का कथन ठीक नहीं है; क्योंकि उसमें ही महारावत तेजसिंह के प्रसङ्ग में सिंहा को तेज- सिंह का पुत्र बतलाया है, जिसका ऊपर उल्लेख किया गया है। मुंहणोत नैणसी की ख्यात में तथा अन्यत्र⁴ सिंहा को तेजसिंह का पुत्र लिखा है, जिससे स्पष्ट है कि सिंहा भानुसिंह का छोटा भाई था। वह महारावत भानुसिंह के पीछे देवलिया का स्वामी अर्थात् भानुसिंह का उत्तराधिकारी हुआ। राजपूताना के राज्यों में जब बड़े भाई के पीछे छोटा भाई गद्दी पर


(१) महाराज श्री रावत भानजी वचनातु जोसी नराणजी जोग आप्रच। भु वीगा ३५) आंके पैतीस रावस्तु श्री तेजसीजी रे आतर सभ्यरा उदक करी थी, ज्या गाम अमलावदा मांहे......उदक आघाट तांवापत्र करे दीधी...समत १६५२ वरषे आसड़सुद १...! ताम्रपत्र की छाप से। (२) प्रतापगढ़ राज्य के बड़वे की ख्यात; पृ० ३। (३) प्रतापगढ़ राज्य की एक पुरानी ख्यात; पृ० ५। (४) मुंहणोत नैणसी की ख्यात; प्रथम भाग, पृ० ६५। वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० १०५७।

११८ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास बैठता है, तब चारण और भाट उस (बड़े भाई) को पिता के स्थान पर मानकर गद्दी बैठनेवाले छोटे भाई को आशीष देते हैं । इसी क्रम से प्रतापगढ़ राज्य के बड़वे की ख्यात में सिंहा को भानुसिंह का पुत्र लिखा गया हो तो कोई आश्चर्य नहीं है । महारावत भानुसिंह का भी और कोई वृत्तांत नहीं मिला, जिससे उसके जीवन पर विशेष प्रकाश पड़े । उसके संबंध का जो वृत्तांत ऊपर महारावत भानुसिंह का व्यक्तित्व लिखा गया है, उससे तो यही प्रकट होता है कि वीर और दानी होने के साथ ही वह अदूरदर्शी था । वह कुछ ही वर्ष राज्य करने के उपरांत मारा गया । मेजर के० डी० अर्सकिन ने उसके समय में शाही अफ़सर महावतखां के देवलिया में जाकर रहने का उल्लेख किया है१, परंतु घटनाक्रम पर विचार करने से यह कथन ठीक नहीं जंचता; क्योंकि भानुसिंह, मुग़ल सम्राट् अकबर का समकालीन था और उसके जीवनकाल में ही वह मारा गया । फ़ारसी तवारीखों में बादशाह अकबर के समय महावतखां नाम के किसी सेनापति के विद्रोही होने का उल्लेख नहीं है । जहांगीर के पिछले समय में उसके प्रसिद्ध सेनाध्यक्ष महावतखां ने बादशाह से विद्रोहाचरण किया था, जिसका हम महारावत सिंहा के प्रसङ्ग में वर्णन करेंगे । सिंहा महारावत भानुसिंह का देहांत होने पर वि० सं० १६५४ (ई० स० १५६७) में उसका छोटा भाई सिंहा देवलिया के राज्य-प्राप्ति राज्य-सिंहासन पर बैठा२ । (१) मेजर के० डी० अर्सकिन; गैज़ेटियर ऑव प्रतापगढ़; पृ० १६८ । (२) ऐसी भी जनश्रुति है कि जब भानुसिंह, जोधसिंह से युद्ध करता हुआ जीरण के पास काम आया, उस समय उसका छोटा भाई सिंहा अपने ननिहाल में था । उसकी अनुपस्थिति का अवसर पाकर महारावत विक्रमसिंह (बीका) का पौत्र और कृष्णदास (किशनदास) का पुत्र सांवळदास, जिसके झांतला की जागीर थी और जो

महारावत सिंहा ११६ मुगल बादशाहत की अधीनता स्वीकार न करने से मेवाड़ के महाराणाओं से बादशाह अकबर असंतुष्ट रहा और उनपर शाही सेना के महाराणा अमरसिंह का आक्रमण जारी थे, ऐसे समय में भानुसिंह के महारावत के लिए टीका मक्खनखां की सहायतार्थ काम आने से विरोध भेजना बढ़ने की संभावना देख महाराणा अमरसिंह ने उस- ( भानुसिंह )के भाई सिंहा को गद्दीनशीनी का टीका भेज आश्वासन के रूप में कहलाया कि भानुसिंह और जोधसिंह दोनों हमारे भाई ही मरे हैं। अब जोधसिंह के पुत्र नाहर और भाखरसी का जिन गांवों पर अधिकार है उनमें किसी प्रकार का दखल न देना¹। इसपर सिंहा ने अपनी स्थिति पर विचार कर महाराणा की बात मान ली और जोधसिंह के पुत्रों से कोई छेड़-छाड़ न की। बादशाह अकबर ने उधर का अच्छा बंदोवस्त करने के लिए जीरण और नीमच की जागीर रामपुरा के सीसोदिया राव दुर्गा को, जो शाही सेवक बन गया था, प्रदान कर दी²। उसका महाराणा से भी मेल था, इसलिए उसने महाराणा को कुछ गांव देकर उसका समाधान कर दिया। तदनन्तर भानुसिंह के मंदसोर के शाही सेनाध्यक्ष मक्खनखां की सहायतार्थ मारे जाने से बादशाह जहांगीर के समय इस सेवा के पुरस्कार में महारावत सिंहा देवलिया-राज्य का सारा राज्य-कार्य करता था, सरदारों आदि को मिलाकर वहां का स्वामी बन बैठा। जब सिंहा को भानुसिंह की मृत्यु और सांवळदास की राज्य-प्राप्ति का समाचार मिला तो वह परिस्थिति को अपने विरुद्ध देख कुछ समय के लिए चुप हो बैठा। फिर उसने धमोतर के सरदार को अपनी ओर मिलाकर कुछ समय बाद एक दिन छल से देवलिया में प्रवेश किया और वहां अधिकार कर लिया। फिर उसके पक्षवाले सरदारों ने सांवळदास को मार डाला और उसके वंशजों से भांतला की जागीर छीन ली। संभव है कि सांवळदास ने सिंहा की अविद्यमानता का अवसर पाकर देवलिया का राजा बनने की चेष्टा की हो और उसी में उसका प्राणांत हुआ हो। जब तक इस विषय का कोई अन्य प्रमाण न मिले इस संबंध में अधिक प्रकाश नहीं पड़ सकता, क्योंकि ख्यातों में इसका कहीं उल्लेख नहीं मिलता है। ( १ ) मुंहणोत नैणसी की ख्यात; प्रथम भाग, पृ० ६५-६ । ( २ ) वही; पृ० ६५-६ ।

१२० प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास

को कुंडाल का परगना जागीर में प्राप्त हुआ¹। बादशाह अकबर की महाराणा प्रतापसिंह को अधीन बनाने की कामना सफल नहीं हुई। फिर उक्त महाराणा के देहांत के पीछे उसके [मार्जिन: बसाइ और अरखोद परगने का फ़रमान कुंवर कर्ण-सिंह के नाम होना] उत्तराधिकारी महाराणा अमरसिंह (प्रथम) पर वि० सं० १६५७ (ई० स० १६००) में बादशाह ने अपने शाहज़ादे सलीम (जहांगीर) को भेजा; किंतु वह असफल होकर लौटा। तदनन्तर वि० सं० १६६० (ई० स० १६०३) में बादशाह ने पुनः शाहज़ादे को मेवाड़ पर सेना लेकर जाने की आज्ञा दी, किन्तु पहली बार के आक्रमण की कठिनाइयों का स्मरण कर वह किनारा कर गया। वि० सं० १६६२ (ई० स० १६०५) में बादशाह अकबर की मृत्यु हुई और उसके स्थान पर शाहज़ादा सलीम बादशाह हुआ। उसने अपने पिता के मेवाड़ की स्वाधीनता नष्ट करने के संकल्प को पूरा करने की इच्छा से उसी वर्ष अपने शाहज़ादे परवेज़ की अधीनता में एक बड़ी सेना उधर रवाना की। महाराणा ने शाही सेना का बड़ी वीरता से मुक़ाबला किया, जिससे शाहज़ादा परास्त होकर लौटा। बादशाह ने अपनी सेना के असफल होकर लौटने पर कई बार मेवाड़ पर सेनाएं भेजीं, परंतु महाराणा इससे निराश न हुआ और लड़ता ही रहा। अंत में बादशाह ने वि० सं० १६७० (ई० स० १६१३) में शाहज़ादे

(१) प्रतापगढ़ राज्य की एक प्राचीन ख्यात; पृ० ६। सर जॉन मालकम ने 'रिपोर्ट ऑन दि प्रोविंस ऑव् मालवा एंड एड्जॉइनिंग डिस्ट्रिक्ट्स (पृ० २२४)' में लिखा है कि इस घटना के बदले में बादशाह की तरफ़ से १२ गांव उस(भानुसिंह)के पुत्र जसवंतसिंह को दिये गये। सर जॉन मालकम के उपर्युक्त लेख से ख्यात के कथन की बहुत कुछ पुष्टि होती है, परंतु वहां जसवंतसिंह को भीमा(भानुसिंह)का पुत्र बतलाया है, जो ठीक नहीं है। भीमा (भानुसिंह) निःसंतान मरा था और उसके पीछे उसका भाई सिंहा देवलिया का स्वामी हुआ, जिसका पुत्र जसवंतसिंह था, यह निश्चित है। महारावत सिंहा बादशाह जहांगीर का समकालीन था। अतएव उपर्युक्त कुंडाल की जागीर अर्थात् १२ गांव, जिनका सर मालकम ने उल्लेख किया है, बादशाह जहांगीर- द्वारा महारावत सिंहा को मिलना ही संभव है।

महारावत सिंहा १२१

खुर्रम (शाहजहां) को एक बड़ी सेना के साथ महाराणा पर रवाना किया। शाहज़ादे ने मेवाड़ में पहुंचकर चारों तरफ़ के नाके-घाटे बंद कर दिये और रसद का जाना भी रोक दिया। उसने मुख्य-मुख्य स्थलों पर सुदृढ़ थाने नियत कर महाराणा को घेर लिया, तो भी महाराणा ने शाही सेना से मुक़ाबला करना न छोड़ा। वह इस आपत्ति से बिलकुल न घबराया और यथा-साध्य लड़ता ही रहा। शाही सेना की लगातार चढ़ाइयों से महाराणा के सरदारों की संख्या घटती जाती थी और उन्हें भय होने लगा कि शाही सेना द्वारा घिरकर वे मारे जावेंगे तथा उनके बाल-बच्चे पकड़ लिये जावेंगे। इस डांवा-डोल स्थिति को देख सरदारों ने महाराणा के कुंवर कर्णसिंह की सलाह लेकर शाहज़ादे के पास संधि का प्रस्ताव भेजा, जिसके स्वीकार होने पर महाराणा के सामने यह बात प्रकट की गई। महाराणा को विवश होकर अपनी इच्छा के विरुद्ध यह बात स्वीकार करनी पड़ी और ज्येष्ठ राजकुमार को शाही दरबार में भेजने की मुख्य शर्त पर वि० सं० १६७१ (ई० स० १६१५) में संधि हो गई। फिर शाहज़ादा खुर्रम, कुंवर कर्णसिंह को लेकर बादशाह के पास गया, जिसने उसका बड़ा सम्मान किया और मेवाड़ से गये हुए इलाक़ों के अतिरिक्त रतलाम, वसाड़, अरणोद, डूंगरपुर, बांसवाड़ा आदि का फ़रमान भी ता० २२ रवीउस्सानी हि० स० १०२४ (वि० सं० १६७२ ज्येष्ठ वदि ६ = ई० स० १६१५ ता० ११ मई) को उक्त कुंवर के नाम कर दिया१। बादशाह जहांगीर के पिछले समय में उसका शाहज़ादा खुर्रम तो बाग़ी हो ही रहा था, परंतु कई कारणों से अपने प्रधान सेनापति महावतखां [महावतखां का देवलिया में जाकर रहना] पर भी बादशाह की नाराज़गी हो गई। उसका खज़ाना ज़ब्त कर लिया गया एवं खानखाना को अजमेर का सूबा जागीर में दिया जाकर वि० सं० १६८३

(१) मेरा उदयपुर राज्य का इतिहास; जि० १, पृ० ५०३। मूल फ़रमान के लिए देखो वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० २३६-४६। (२) मुंशी देवीप्रसाद; जहांगीरनामा; पृ० ५८८-६। १६

१२२ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास

(ई० स० १६२६) के लगभग वह महाबतखां को मारने के लिए नियुक्त किया गया। इसपर महाबतखां प्राण-रक्षा के लिए इधर-उधर भटकने लगा। उसके उदयपुर-राज्य के पहाड़ों में होकर देवलिया पहुंचने पर महारावत सिंहा ने उसको सम्मान-पूर्वक अपने यहां रक्खा¹ और प्रसिद्ध है कि देवलिया से विदा होते समय उसने महारावत को इस सौजन्य के बदले में एक अंगूठी भेंट की², जिसका मूल्य साठ हज़ार रुपये के लगभग था। फ़ारसी तवारीखों से यह ज्ञात नहीं होता कि महाबतखां बादशाह की अप्रसन्नता होने पर कहां-कहां रहा था, परंतु उसका राजपीपला के मार्ग से दक्षिण में जाने का 'हिस्ट्री ऑव् जहांगीर'³ और 'जहांगीरनामे'⁴ में भी उल्लेख मिलता है। इससे अनुमान होता है कि वह मालवे की तरफ़ होता हुआ ही दक्षिण में शाहज़ादे खुर्रम के पास गया था। देवलिया मालवे से मिला हुआ है। पहाड़ी प्रांत होने से वह सुरक्षित स्थान समझा जाता है तथा उत्तर से दक्षिण की तरफ़ जाते समय मार्ग में पड़ता है। इसलिए पहाड़ी मार्ग से होते हुए उसका देवलिया की तरफ़ जाना और वहां महारावत का आश्रय पाना संभव है। पहाड़ी प्रदेश होने तथा वहां का जलवायु ख़राब होने से मुसलमानी सेना का उस ओर कम ही जाना होता था। महाबतखां का देवलिया में रहने का कथन महारावत प्रतापसिंह के समय बनी हुई 'प्रतापप्रशस्ति' (खंडित काव्य) में भी है, जो इस घटना के


(१) वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० १०५७। 'वीरविनोद' में महाबतखां का महारावत जसवंतसिंह के समय देवलिया में रहने का उल्लेख है, जो ठीक नहीं है। महाबतखां वि० सं० १६८३ में विद्रोही हुआ था। उस समय महारावत सिंहा विद्यमान था, जैसा कि ग़यासपुर की बणजारों की बावड़ी के शिलालेख से प्रकट है। महारावत सिंहा बादशाह जहांगीर का समकालीन था, इसलिए उसके समय में ही महाबतखां का देवलिया में रहना संभव है। (२) वीरविनोद (द्वितीय भाग, पृ० २८६) में भी महाबतखां-द्वारा अंगूठी देने का उल्लेख है। (३) डॉक्टर बेनीप्रसाद-कृत; पृ० ४३०। (४) मुंशी देवीप्रसाद; जहांगीरनामा; पृ० ५६६।

महारावत सिंहा १२३ लगभग पचास वर्ष पीछे की बनी हुई है। ऐसी स्थिति में महारावत सिंहा के समय ही महाबतखां का देवलिया में रहने का कथन विश्वसनीय है¹ । इसके विरुद्ध मेजर के० डी० अर्सकिन-कृत 'गेज़ैटियर ऑव् प्रतापगढ़' में महाबतखां का महारावत भानुसिंह के समय देवलिया में रहने का उल्लेख है, जो ठीक नहीं है, जैसा कि ऊपर लिखा गया है² । 'वीरविनोद' में महारावत सिंहा का वि० सं० १६७६ ( ई० स० १६२२ ) में देहांत होना लिखा है³; किन्तु गयासपुर की बावड़ी के वि० सं० महारावत सिंहा का १६८४ वैशाख सुदि ३⁴ ( ई० स० १६२७ ता० ८ परलोकवास अप्रेल ) के शिलालेख से उसका उक्त संवत् तक विद्यमान होना पाया जाता है । उदयपुर के महाराणा राजसिंह के बनवाये हुए राजसमुद्र तालाब के 'राजप्रशस्ति'-नामक बृहत् काव्य और 'अमरकाव्य' में महाराणा जगतसिंह ( प्रथम ) के प्रसङ्ग में उक्त ( १ ) श्रीमत्सूरुकुले प्रतापनृपतिर्दाता न चित्रं पुरा श्रीसिंहप्रपितामहेन शरणं संरक्षितं साहृतः । श्रेष्ठो मोवतखान एव वसुधानाथान्नबापप्रभोः । शाजानात्सुखमापतुष्टिमधिकां कीर्तिं पृथिव्यां नृपः ॥ ८ ॥ प्रताप-प्रशस्ति ( खंडित काव्य ) । उपर्युक्त श्लोक में उल्लिखित 'मोवतखान नबाप', 'महाबतखां' का और 'शाजान', 'बादशाह शाहजहां' का सूचक है । ( २ ) देखो ऊपर पृ० ११८ । ( ३ ) वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० १०५७ । ( ४ ) ......सवत ( संवत् ) १६८४ वर्षे वेसष ( बैशाख ) सुदि ३ राउत श्रीसिंघा अद्येह श्रीग्यासपा(पु )रग्रामे............तीर्थे वावयं । राउत सेघो (सिंघा) विजयराज्ये आभ्यन्तर वणजारा जातीय नायक गिरो...... ॥ मूल शिलालेख की नक़ल से ।