राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें११८ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास बैठता है, तब चारण और भाट उस (बड़े भाई) को पिता के स्थान पर मानकर गद्दी बैठनेवाले छोटे भाई को आशीष देते हैं । इसी क्रम से प्रतापगढ़ राज्य के बड़वे की ख्यात में सिंहा को भानुसिंह का पुत्र लिखा गया हो तो कोई आश्चर्य नहीं है । महारावत भानुसिंह का भी और कोई वृत्तांत नहीं मिला, जिससे उसके जीवन पर विशेष प्रकाश पड़े । उसके संबंध का जो वृत्तांत ऊपर महारावत भानुसिंह का व्यक्तित्व लिखा गया है, उससे तो यही प्रकट होता है कि वीर और दानी होने के साथ ही वह अदूरदर्शी था । वह कुछ ही वर्ष राज्य करने के उपरांत मारा गया । मेजर के० डी० अर्सकिन ने उसके समय में शाही अफ़सर महावतखां के देवलिया में जाकर रहने का उल्लेख किया है१, परंतु घटनाक्रम पर विचार करने से यह कथन ठीक नहीं जंचता; क्योंकि भानुसिंह, मुग़ल सम्राट् अकबर का समकालीन था और उसके जीवनकाल में ही वह मारा गया । फ़ारसी तवारीखों में बादशाह अकबर के समय महावतखां नाम के किसी सेनापति के विद्रोही होने का उल्लेख नहीं है । जहांगीर के पिछले समय में उसके प्रसिद्ध सेनाध्यक्ष महावतखां ने बादशाह से विद्रोहाचरण किया था, जिसका हम महारावत सिंहा के प्रसङ्ग में वर्णन करेंगे । सिंहा महारावत भानुसिंह का देहांत होने पर वि० सं० १६५४ (ई० स० १५६७) में उसका छोटा भाई सिंहा देवलिया के राज्य-प्राप्ति राज्य-सिंहासन पर बैठा२ । (१) मेजर के० डी० अर्सकिन; गैज़ेटियर ऑव प्रतापगढ़; पृ० १६८ । (२) ऐसी भी जनश्रुति है कि जब भानुसिंह, जोधसिंह से युद्ध करता हुआ जीरण के पास काम आया, उस समय उसका छोटा भाई सिंहा अपने ननिहाल में था । उसकी अनुपस्थिति का अवसर पाकर महारावत विक्रमसिंह (बीका) का पौत्र और कृष्णदास (किशनदास) का पुत्र सांवळदास, जिसके झांतला की जागीर थी और जो