राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमहारावत भानुसिंह ११७
एवं लेखक का नाम पंचोली नेता दिया है¹। बड़वे की ख्यात में महारावत भानुसिंह के केवल एक ही राणी लिखी है और उसका नाम भगवतकुंवरी देकर उसको ईडर के राव महारावत की राणियां नारायणदास की पुत्री लिखा है एवं उसका पुत्र सिंहा बतलाया है²; किंतु एक दूसरी पुरानी ख्यात में उसके दो राणियां एक चौहान वाला की पुत्री समुद्रकुंवरी और दूसरी सोलंकी माला की पुत्री मानकुंवरी होना लिखकर उक्त सोलंकिणी राणी के उदर से कमलकुंवरी और पेपकुंवरी नामक पुत्रियां होने का उल्लेख है³। ख्यातों की परस्पर विभिन्नता को देखते हुए इस संबंध में निश्चित रूप से कुछ नहीं कहा जा सकता, परंतु प्रतापगढ़ राज्य के बड़वे की ख्यात में दिया हुआ महारावत भानुसिंह के सिंहा नामक पुत्र होने का कथन ठीक नहीं है; क्योंकि उसमें ही महारावत तेजसिंह के प्रसङ्ग में सिंहा को तेज- सिंह का पुत्र बतलाया है, जिसका ऊपर उल्लेख किया गया है। मुंहणोत नैणसी की ख्यात में तथा अन्यत्र⁴ सिंहा को तेजसिंह का पुत्र लिखा है, जिससे स्पष्ट है कि सिंहा भानुसिंह का छोटा भाई था। वह महारावत भानुसिंह के पीछे देवलिया का स्वामी अर्थात् भानुसिंह का उत्तराधिकारी हुआ। राजपूताना के राज्यों में जब बड़े भाई के पीछे छोटा भाई गद्दी पर
(१) महाराज श्री रावत भानजी वचनातु जोसी नराणजी जोग आप्रच। भु वीगा ३५) आंके पैतीस रावस्तु श्री तेजसीजी रे आतर सभ्यरा उदक करी थी, ज्या गाम अमलावदा मांहे......उदक आघाट तांवापत्र करे दीधी...समत १६५२ वरषे आसड़सुद १...! ताम्रपत्र की छाप से। (२) प्रतापगढ़ राज्य के बड़वे की ख्यात; पृ० ३। (३) प्रतापगढ़ राज्य की एक पुरानी ख्यात; पृ० ५। (४) मुंहणोत नैणसी की ख्यात; प्रथम भाग, पृ० ६५। वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० १०५७।