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राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

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१९६ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास कोई राजा नहीं हुए । चायसिंह रायसिंह का, जीजा चीका (विक्रमसिंह) का, और भीमा तथा भाना भानुसिंह के सूचक हो सकते हैं । इसी प्रकार मालकम का यह कथन कि भीमा अथवा भाना (भानुसिंह) बाघसिंह के पौत्र जीजा अर्थात् चीका (विक्रमसिंह) का पुत्र था निर्मूल है । उक्त रिपोर्ट में दिये हुए प्रतापगढ़ के राजाओं के नाम चायसिंह, जीजा और भीमा अशुद्ध हैं और उसमें दी हुई घटनाएं भी ठीक नहीं हैं । बाघसिंह अकबर की चित्तोड़ पर चढ़ाई होने के तीस वर्ष पूर्व बहादुरशाह की चित्तोड़ की चढ़ाई के समय मेवाड़वालों की तरफ़ से लड़कर मारा गया था । उक्त रिपोर्ट के अध्ययन करने से प्रकट होता है कि सर जॉन मालकम ने अपनी रिपोर्ट लिखते समय पूर्व-वृत्तांत लिखने में सत्यासत्य की अधिक खोज नहीं की । महारावत भानुसिंह के वि० सं० १६५१ और १६५२ के निम्नलिखित दो ताम्रपत्र मिले हैं- महारावत भानुसिंह के ताम्रपत्र (१) वि० सं० १६५१ मार्गशीर्ष वदि ५ (ई० स० १५६४ ता० २४ अक्टोबर) का जोशी श्रीकंठ के नाम का सेवली गांव का ताम्रपत्र, जिसमें उपर्युक्त गांव जोशी श्रीकंठ को कृष्णार्पण करने और ताम्रपत्र महारावत के कोठारी चाचा की आज्ञा से पंचोली केशवदास-द्वारा लिखे जाने का उल्लेख है१। (२) वि० सं० १६५२ आषाढ सुदि १ (ई० स० १५६५ ता० २८ जून) का जोशी नारायण के नाम का ताम्रपत्र, जिसमें महारावत तेजसिंह के अंतिम समय में अमलावदा गांव में संकल्प की हुई पैंतीस बीघा भूमि दान करने का उल्लेख है और दुआ देनेवाले का नाम कोठारी शामल (१) श्री महाराज श्री राउत श्री भवानीसिंघजी वचनातु जोसी सीरीकंठ है......... मौ० जौ सेवली अघाट करीदीघो......... संवतं १६५१ वरषे मागसर वदि ५......। मूल लेख छाप से ।