राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमहारावत भानुसिंह. ११५ के साथ होनेवाले युद्ध में काम आना लिखा है। ऐसी दशा में महारावत भानुसिंह का परलोकवास वि० सं० १६५४ के मार्गशीर्ष (ई० स० १५६७ नवंबर अथवा दिसंबर) मास में होना ठीक जान पड़ता है। इसके विरुद्ध ख्यातों तथा प्रतापगढ़ राज्य के गैज़ेटियर में उसका देहांत वि० सं० १६६० (ई० स० १६०३) में होना लिखा है¹, जो स्वीकार करने के योग्य नहीं है; क्योंकि ख्यातों आदि के संवत् बहुधा कल्पित हैं और पीछे से सुनी-सुनाई बातों के आधार पर दिये गये हैं। सर जॉन मालकम अपनी 'रिपोर्ट ऑन दि प्रॉविन्स ऑव् मालवा एंड एड्ज्वॉइनिंग डिस्ट्रिक्ट्स' (कलकत्ता गवर्नमेंट ऑव् इंडिया सेंट्रल पब्लि- केशन ब्रांच-पृ० २२४) में लिखता है कि प्रतापगढ़ राज्य के संस्थापक जीजा रावल का (जिसको शाहजहां के समय में मालवे के मुसलमान अफ़- सरों की सिफ़ारिश से जागीर मिली थी) पुत्र भीमा रावल मंदसोर के आमिलदार की सहायतार्थ लड़कर मारा गया। वहीं उसने टिप्पण में सादड़ी के सरदार सूरजमल के मांडू के सुलतान अलाउद्दीन के पास जाने और फिर उसके पुत्र वाघ रावल के चित्तौड़ की रक्षार्थ काम आने एवं उस (वाघ रावल) के पुत्र वायसिंह के पुनः सादड़ी लौट जाने और उसके पुत्र का नाम जीजा रावल होने का उल्लेख किया है। ये सब कथन इतिहास की कसौटी पर निर्मूल ठहरते हैं। मांडू में अलाउद्दीन नाम का कोई सुलतान नहीं हुआ। सूरजमल ने मेवाड़ के विरुद्ध मांडू (मालवा) के सुलतान नासिरुद्दीन की सहायता कर महाराणा रायमल और उसके कुंवर पृथ्वीराज से युद्ध किया था, जिसका वर्णन ऊपर (पृ० ६२-५ में) किया गया है। प्रतापगढ़ के राजाओं की उपाधि 'रावल' न होकर 'रावत' है एवं वहां 'वायसिंह', 'जीज़ा' और 'भीमा' नाम के (१) प्रतापगढ़ राज्य के बड़वे की ख्यात; पृ० ३। प्रतापगढ़ राज्य की एक पुरानी ख्यात; पृ० ५। कैप्टेन सी० ई० येट; गैज़ेटियर ऑव् प्रतापगढ़; पृ० ७६। मेजर के० डी० अर्सकिन; गैज़ेटियर ऑव् प्रतापगढ़; पृ० १६८। वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० १०५६।