राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें११४ 'प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास शक्तावत जोधसिंह के साथ होनेवाले युद्ध में भानुसिंह के मारे जाने का स्पष्ट उल्लेख है । जीरण में उस (भानुसिंह) की स्मारक छत्री बनी हुई है। उसके लेख में भी शक्तावत जोधसिंह के साथ होनेवाले युद्ध में उसके मारे जाने का उल्लेख है। अतएव भानुसिंह का उसी युद्ध में मारा जाना अधिक माननीय है। प्राचीन परंपरा का अनुयायी होने से गंगाराम ने अपने काव्य में दुःखान्त प्रसङ्ग को जान-बूझकर छोड़ दिया है और देवलिया के स्वामी वाघसिंह, भानुसिंह तथा जसवंतसिंह (जो युद्ध करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए) के देहांत पर मौन साध लिया है। इसी प्रकार उसने वहां के अन्य नरेशों की भी मृत्यु-वार्ता का उल्लेख नहीं किया, जिससे कहा जा सकता है कि उसने अपने इस काव्य को सुखान्त बनाने का ही लक्ष्य रखा हो । 'वीरविनोद' में भी इस युद्ध का वर्णन है, परंतु वहां इस घटना का कोई समय नहीं दिया है, परन्तु महारावत भानुसिंह की छत्री के लेख में वि० सं० १६५४ (ई० स० १५६७) के मार्गशीर्ष² में उसका शक्तावत जोधसिंह (१) द्वितीय भाग, पृ० १०५६ । (२) ०००मा(महा) राजा धी(धि) राज मा(म) हारावतजी श्री भानाजी देवल्य राजा(जां)रा०००००मुना पदराया०००००जोध (ध)सीघ (सिंह) जी सग०००००या दसोर (मंदसोर)००००० रजवाड़ दली (दिल्ली) तप (पे) पातसा००००० अकबरजी उदेपुर तप (पे) राणा ०००००००अमरसीघ(सिंह) जी समत (सम्वत्) १६ सौ ५४ सा के (शाके) १५१ [६] परवतमानमती अग०००००००दीतवार००० । मूल लेख की छाप से । मेवाड़ का महाराणा अमरसिंह (वीरशिरोमणि महाराणा प्रतापसिंह का ज्येष्ठ पुत्र), महाराणा प्रताप का परलोकवास होने पर वि० सं० १६५३ माघ सुदि ११ को राजगद्दी पर बैठा था। समयक्रम पर विचार करने से यह घटना महाराणा अमरसिंह- (प्रथम) के प्रारंभिक समय की हो सकती है।