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राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

पृष्ठ 162, कुल 534 में से

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महारावत सिंहा ११६ मुगल बादशाहत की अधीनता स्वीकार न करने से मेवाड़ के महाराणाओं से बादशाह अकबर असंतुष्ट रहा और उनपर शाही सेना के महाराणा अमरसिंह का आक्रमण जारी थे, ऐसे समय में भानुसिंह के महारावत के लिए टीका मक्खनखां की सहायतार्थ काम आने से विरोध भेजना बढ़ने की संभावना देख महाराणा अमरसिंह ने उस- ( भानुसिंह )के भाई सिंहा को गद्दीनशीनी का टीका भेज आश्वासन के रूप में कहलाया कि भानुसिंह और जोधसिंह दोनों हमारे भाई ही मरे हैं। अब जोधसिंह के पुत्र नाहर और भाखरसी का जिन गांवों पर अधिकार है उनमें किसी प्रकार का दखल न देना¹। इसपर सिंहा ने अपनी स्थिति पर विचार कर महाराणा की बात मान ली और जोधसिंह के पुत्रों से कोई छेड़-छाड़ न की। बादशाह अकबर ने उधर का अच्छा बंदोवस्त करने के लिए जीरण और नीमच की जागीर रामपुरा के सीसोदिया राव दुर्गा को, जो शाही सेवक बन गया था, प्रदान कर दी²। उसका महाराणा से भी मेल था, इसलिए उसने महाराणा को कुछ गांव देकर उसका समाधान कर दिया। तदनन्तर भानुसिंह के मंदसोर के शाही सेनाध्यक्ष मक्खनखां की सहायतार्थ मारे जाने से बादशाह जहांगीर के समय इस सेवा के पुरस्कार में महारावत सिंहा देवलिया-राज्य का सारा राज्य-कार्य करता था, सरदारों आदि को मिलाकर वहां का स्वामी बन बैठा। जब सिंहा को भानुसिंह की मृत्यु और सांवळदास की राज्य-प्राप्ति का समाचार मिला तो वह परिस्थिति को अपने विरुद्ध देख कुछ समय के लिए चुप हो बैठा। फिर उसने धमोतर के सरदार को अपनी ओर मिलाकर कुछ समय बाद एक दिन छल से देवलिया में प्रवेश किया और वहां अधिकार कर लिया। फिर उसके पक्षवाले सरदारों ने सांवळदास को मार डाला और उसके वंशजों से भांतला की जागीर छीन ली। संभव है कि सांवळदास ने सिंहा की अविद्यमानता का अवसर पाकर देवलिया का राजा बनने की चेष्टा की हो और उसी में उसका प्राणांत हुआ हो। जब तक इस विषय का कोई अन्य प्रमाण न मिले इस संबंध में अधिक प्रकाश नहीं पड़ सकता, क्योंकि ख्यातों में इसका कहीं उल्लेख नहीं मिलता है। ( १ ) मुंहणोत नैणसी की ख्यात; प्रथम भाग, पृ० ६५-६ । ( २ ) वही; पृ० ६५-६ ।