राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२० प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास
को कुंडाल का परगना जागीर में प्राप्त हुआ¹। बादशाह अकबर की महाराणा प्रतापसिंह को अधीन बनाने की कामना सफल नहीं हुई। फिर उक्त महाराणा के देहांत के पीछे उसके [मार्जिन: बसाइ और अरखोद परगने का फ़रमान कुंवर कर्ण-सिंह के नाम होना] उत्तराधिकारी महाराणा अमरसिंह (प्रथम) पर वि० सं० १६५७ (ई० स० १६००) में बादशाह ने अपने शाहज़ादे सलीम (जहांगीर) को भेजा; किंतु वह असफल होकर लौटा। तदनन्तर वि० सं० १६६० (ई० स० १६०३) में बादशाह ने पुनः शाहज़ादे को मेवाड़ पर सेना लेकर जाने की आज्ञा दी, किन्तु पहली बार के आक्रमण की कठिनाइयों का स्मरण कर वह किनारा कर गया। वि० सं० १६६२ (ई० स० १६०५) में बादशाह अकबर की मृत्यु हुई और उसके स्थान पर शाहज़ादा सलीम बादशाह हुआ। उसने अपने पिता के मेवाड़ की स्वाधीनता नष्ट करने के संकल्प को पूरा करने की इच्छा से उसी वर्ष अपने शाहज़ादे परवेज़ की अधीनता में एक बड़ी सेना उधर रवाना की। महाराणा ने शाही सेना का बड़ी वीरता से मुक़ाबला किया, जिससे शाहज़ादा परास्त होकर लौटा। बादशाह ने अपनी सेना के असफल होकर लौटने पर कई बार मेवाड़ पर सेनाएं भेजीं, परंतु महाराणा इससे निराश न हुआ और लड़ता ही रहा। अंत में बादशाह ने वि० सं० १६७० (ई० स० १६१३) में शाहज़ादे
(१) प्रतापगढ़ राज्य की एक प्राचीन ख्यात; पृ० ६। सर जॉन मालकम ने 'रिपोर्ट ऑन दि प्रोविंस ऑव् मालवा एंड एड्जॉइनिंग डिस्ट्रिक्ट्स (पृ० २२४)' में लिखा है कि इस घटना के बदले में बादशाह की तरफ़ से १२ गांव उस(भानुसिंह)के पुत्र जसवंतसिंह को दिये गये। सर जॉन मालकम के उपर्युक्त लेख से ख्यात के कथन की बहुत कुछ पुष्टि होती है, परंतु वहां जसवंतसिंह को भीमा(भानुसिंह)का पुत्र बतलाया है, जो ठीक नहीं है। भीमा (भानुसिंह) निःसंतान मरा था और उसके पीछे उसका भाई सिंहा देवलिया का स्वामी हुआ, जिसका पुत्र जसवंतसिंह था, यह निश्चित है। महारावत सिंहा बादशाह जहांगीर का समकालीन था। अतएव उपर्युक्त कुंडाल की जागीर अर्थात् १२ गांव, जिनका सर मालकम ने उल्लेख किया है, बादशाह जहांगीर- द्वारा महारावत सिंहा को मिलना ही संभव है।