भारतकोश
राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

पृष्ठ 164, कुल 534 में से

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महारावत सिंहा १२१

खुर्रम (शाहजहां) को एक बड़ी सेना के साथ महाराणा पर रवाना किया। शाहज़ादे ने मेवाड़ में पहुंचकर चारों तरफ़ के नाके-घाटे बंद कर दिये और रसद का जाना भी रोक दिया। उसने मुख्य-मुख्य स्थलों पर सुदृढ़ थाने नियत कर महाराणा को घेर लिया, तो भी महाराणा ने शाही सेना से मुक़ाबला करना न छोड़ा। वह इस आपत्ति से बिलकुल न घबराया और यथा-साध्य लड़ता ही रहा। शाही सेना की लगातार चढ़ाइयों से महाराणा के सरदारों की संख्या घटती जाती थी और उन्हें भय होने लगा कि शाही सेना द्वारा घिरकर वे मारे जावेंगे तथा उनके बाल-बच्चे पकड़ लिये जावेंगे। इस डांवा-डोल स्थिति को देख सरदारों ने महाराणा के कुंवर कर्णसिंह की सलाह लेकर शाहज़ादे के पास संधि का प्रस्ताव भेजा, जिसके स्वीकार होने पर महाराणा के सामने यह बात प्रकट की गई। महाराणा को विवश होकर अपनी इच्छा के विरुद्ध यह बात स्वीकार करनी पड़ी और ज्येष्ठ राजकुमार को शाही दरबार में भेजने की मुख्य शर्त पर वि० सं० १६७१ (ई० स० १६१५) में संधि हो गई। फिर शाहज़ादा खुर्रम, कुंवर कर्णसिंह को लेकर बादशाह के पास गया, जिसने उसका बड़ा सम्मान किया और मेवाड़ से गये हुए इलाक़ों के अतिरिक्त रतलाम, वसाड़, अरणोद, डूंगरपुर, बांसवाड़ा आदि का फ़रमान भी ता० २२ रवीउस्सानी हि० स० १०२४ (वि० सं० १६७२ ज्येष्ठ वदि ६ = ई० स० १६१५ ता० ११ मई) को उक्त कुंवर के नाम कर दिया१। बादशाह जहांगीर के पिछले समय में उसका शाहज़ादा खुर्रम तो बाग़ी हो ही रहा था, परंतु कई कारणों से अपने प्रधान सेनापति महावतखां [महावतखां का देवलिया में जाकर रहना] पर भी बादशाह की नाराज़गी हो गई। उसका खज़ाना ज़ब्त कर लिया गया एवं खानखाना को अजमेर का सूबा जागीर में दिया जाकर वि० सं० १६८३

(१) मेरा उदयपुर राज्य का इतिहास; जि० १, पृ० ५०३। मूल फ़रमान के लिए देखो वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० २३६-४६। (२) मुंशी देवीप्रसाद; जहांगीरनामा; पृ० ५८८-६। १६