राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२२ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास
(ई० स० १६२६) के लगभग वह महाबतखां को मारने के लिए नियुक्त किया गया। इसपर महाबतखां प्राण-रक्षा के लिए इधर-उधर भटकने लगा। उसके उदयपुर-राज्य के पहाड़ों में होकर देवलिया पहुंचने पर महारावत सिंहा ने उसको सम्मान-पूर्वक अपने यहां रक्खा¹ और प्रसिद्ध है कि देवलिया से विदा होते समय उसने महारावत को इस सौजन्य के बदले में एक अंगूठी भेंट की², जिसका मूल्य साठ हज़ार रुपये के लगभग था। फ़ारसी तवारीखों से यह ज्ञात नहीं होता कि महाबतखां बादशाह की अप्रसन्नता होने पर कहां-कहां रहा था, परंतु उसका राजपीपला के मार्ग से दक्षिण में जाने का 'हिस्ट्री ऑव् जहांगीर'³ और 'जहांगीरनामे'⁴ में भी उल्लेख मिलता है। इससे अनुमान होता है कि वह मालवे की तरफ़ होता हुआ ही दक्षिण में शाहज़ादे खुर्रम के पास गया था। देवलिया मालवे से मिला हुआ है। पहाड़ी प्रांत होने से वह सुरक्षित स्थान समझा जाता है तथा उत्तर से दक्षिण की तरफ़ जाते समय मार्ग में पड़ता है। इसलिए पहाड़ी मार्ग से होते हुए उसका देवलिया की तरफ़ जाना और वहां महारावत का आश्रय पाना संभव है। पहाड़ी प्रदेश होने तथा वहां का जलवायु ख़राब होने से मुसलमानी सेना का उस ओर कम ही जाना होता था। महाबतखां का देवलिया में रहने का कथन महारावत प्रतापसिंह के समय बनी हुई 'प्रतापप्रशस्ति' (खंडित काव्य) में भी है, जो इस घटना के
(१) वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० १०५७। 'वीरविनोद' में महाबतखां का महारावत जसवंतसिंह के समय देवलिया में रहने का उल्लेख है, जो ठीक नहीं है। महाबतखां वि० सं० १६८३ में विद्रोही हुआ था। उस समय महारावत सिंहा विद्यमान था, जैसा कि ग़यासपुर की बणजारों की बावड़ी के शिलालेख से प्रकट है। महारावत सिंहा बादशाह जहांगीर का समकालीन था, इसलिए उसके समय में ही महाबतखां का देवलिया में रहना संभव है। (२) वीरविनोद (द्वितीय भाग, पृ० २८६) में भी महाबतखां-द्वारा अंगूठी देने का उल्लेख है। (३) डॉक्टर बेनीप्रसाद-कृत; पृ० ४३०। (४) मुंशी देवीप्रसाद; जहांगीरनामा; पृ० ५६६।