भारतकोश
राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

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महारावत सिंहा १२३ लगभग पचास वर्ष पीछे की बनी हुई है। ऐसी स्थिति में महारावत सिंहा के समय ही महाबतखां का देवलिया में रहने का कथन विश्वसनीय है¹ । इसके विरुद्ध मेजर के० डी० अर्सकिन-कृत 'गेज़ैटियर ऑव् प्रतापगढ़' में महाबतखां का महारावत भानुसिंह के समय देवलिया में रहने का उल्लेख है, जो ठीक नहीं है, जैसा कि ऊपर लिखा गया है² । 'वीरविनोद' में महारावत सिंहा का वि० सं० १६७६ ( ई० स० १६२२ ) में देहांत होना लिखा है³; किन्तु गयासपुर की बावड़ी के वि० सं० महारावत सिंहा का १६८४ वैशाख सुदि ३⁴ ( ई० स० १६२७ ता० ८ परलोकवास अप्रेल ) के शिलालेख से उसका उक्त संवत् तक विद्यमान होना पाया जाता है । उदयपुर के महाराणा राजसिंह के बनवाये हुए राजसमुद्र तालाब के 'राजप्रशस्ति'-नामक बृहत् काव्य और 'अमरकाव्य' में महाराणा जगतसिंह ( प्रथम ) के प्रसङ्ग में उक्त ( १ ) श्रीमत्सूरुकुले प्रतापनृपतिर्दाता न चित्रं पुरा श्रीसिंहप्रपितामहेन शरणं संरक्षितं साहृतः । श्रेष्ठो मोवतखान एव वसुधानाथान्नबापप्रभोः । शाजानात्सुखमापतुष्टिमधिकां कीर्तिं पृथिव्यां नृपः ॥ ८ ॥ प्रताप-प्रशस्ति ( खंडित काव्य ) । उपर्युक्त श्लोक में उल्लिखित 'मोवतखान नबाप', 'महाबतखां' का और 'शाजान', 'बादशाह शाहजहां' का सूचक है । ( २ ) देखो ऊपर पृ० ११८ । ( ३ ) वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० १०५७ । ( ४ ) ......सवत ( संवत् ) १६८४ वर्षे वेसष ( बैशाख ) सुदि ३ राउत श्रीसिंघा अद्येह श्रीग्यासपा(पु )रग्रामे............तीर्थे वावयं । राउत सेघो (सिंघा) विजयराज्ये आभ्यन्तर वणजारा जातीय नायक गिरो...... ॥ मूल शिलालेख की नक़ल से ।